भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 616 में से

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अ० ११] इन्द्रियस्थानम् १८१ के समीप और अगुलियों को रखकर फिर उनको खोजता, ऊपर को देखता, हैरान होता है, वह मानों काल के कारण अन्धा है। जो बिस्तर, आसन, अंग, लकड़ी अथवा भित्ति पर कुछ न होते हुए भी कुछ टटोलता रहता है, वह काल ( मृत्यु ) से प्रेरित होकर मोह में पड़कर ऐसा करता है। ( १६ ) जो हंसने का कारण न रहने पर भी हंसे, ओठों को चाटता रहे, हाथ पांव और श्वास ठंडे हों, और ऊर्ध्व श्वास चलता हो तो वह रोगी नहीं बचता । ( १७ ) अपने बान्धव या अन्य मनुष्य को समीप में खड़े, उसे बुलाते हुए को न देखे, न सुने वह बड़े भारी अन्धकार से घिरा होने के कारण देखता हुआ भी नहीं देखता ॥२१॥ अयोगमतियोगं वा शरीरे मतिमान् भिषक् । खादीना युगपद् दृष्ट्वा भेषज नावचारयेत् ॥ २२ ॥ अतिप्रवृद्धया रोगाणा मनसश्च बलक्षयात् । वासमुत्सृजति क्षिप्र शरीरी देहसंज्ञकम् ॥ २३ ॥ वर्णस्वराग्निवलं वागिन्द्रियमनोबलम् । हीयतेऽसुक्षये निद्रा नित्या भवति वा न वा ॥ २४ ॥ ( १८ ) आकाश, वायु, अग्नि जल और पृथ्वी इन भूतों का शरीर में अयोग या अतियोग दीखने लगे, तब वैद्य चिकित्सा नहीं करे । ( १९ ) रोग के बहुत बढ़ जाने से तथा मानसिक बल के क्षय होने से, मनुष्य उस शरीर के वासस्थान को शीघ्र छोड़ देता है, मर जाता है। ( २० ) मरणासन्न मनुष्य में वर्ण, स्वर, अग्नि, बल, वाणी, इन्द्रिय और मन का बल कम हो जाता है और रोगी को या तो नींद खूब आती है अथवा आती ही नहीं ॥ २२-२४ ॥ भिषग्भेषज-पानान्न गुरु-मित्र द्विषश्च ये । वशगाः सर्व एवैते बोद्धव्याः समवर्तिन ॥ २५ ॥ एतेषु रोगः क्रमते भेषजं प्रतिहन्यते । नैषामन्नानि भुञ्जीत न चोदकमपि स्पृशेन् ॥ २६ ॥ पादाः समेताश्चत्वार संपन्नाः साधकैर्गुणैः । व्यर्था गतायुषो द्रव्य विना नास्ति गुणोदयः ॥ २७ ॥ परीक्ष्यमायुर्भिषजा नीरुजस्याऽऽतुरस्य च । आयुर्ज्ञानफल 'कृत्स्नमायुर्न ह्यनुवर्तते ॥ २८ ॥ ( २१ ) वैद्य, औषध खान, पान, गुरु और मित्र से जो रोगी द्वेष करें तो समझना चाहिये कि ये यम के वश में हैं, वे मरनेवाले हैं। ऐसे रोगियों १. 'आयुर्वेदफल' इति च पाठः ।