भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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१८२ चरकसंहिता [ अ० १२ के रोग भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी बढ़ते हैं, औषध कुछ काम नहीं करती । इन रोगियों का न तो अन्न खाना चाहिये और न पानी छूना चाहिये । गतायुष मनुष्य में समग्र गुणों से युक्त चिकित्सा के भी चारों चरण व्यर्थ होते हैं । जिस प्रकार गुण द्रव्य के आश्रय से रहते और प्रकट होते हैं, उसी प्रकार चिकित्सा का गुण आयुष्य के कारण से ही प्रकट होता है। वैद्य को चाहिये कि वह रोगी और स्वस्थ दोनों व्यक्तियों की आयु का परीक्षा करे । आयु का जानना ही आयुर्वेद का फल है, आत्मा ही आयुष्य का सहचारी है ॥२८॥ तत्र श्लोकः-क्रियापथमतिक्रान्ताः केवलं देहमाप्लुता । चिह्नं कुर्वन्ति यद्दोषस्तदरिष्टं निरुच्यते ॥ २६ ॥ जब सब दोष चिकित्सा कर्म के मार्ग को लांघ कर शरीर में व्याप्त होकर लक्षणों को प्रकट करते हैं, तब इन लक्षणों को 'अरिष्ट' कहते हैं ॥ २६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थानेऽणुज्ज्योतीय- मिन्द्रिय नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

द्वादशोऽध्यायः अथातो गोमयचूर्णीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'गोमयचूर्णीय' नामक इन्द्रिय स्थान का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते । सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥ ३ ॥ निकषन्निव यः पादौ च्युतांसः परिधावति । विकृत्या न स लोकेऽस्मिंश्चिरं वसति मानवः ॥ ४ ॥ यस्य स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरो भृशम् । आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति ॥ ५ ॥ यमुद्दिश्याऽऽतुरं वैद्यः संवर्तयितुमौषधम् । यतमानो न शक्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ६ ॥