भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८३ विज्ञातं बहुशः सिद्धं विधिवच्चावचारितम् । न सिध्यत्यौषधं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ ७ ॥ आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम् । यः फलं तस्य नाऽऽप्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ८ ॥ ( १ ) जिस रोगी के सिर पर गोमय ( गोवर ) के चूर्ण के समान भुर- भुरा चूर्ण उत्पन्न हो, रूक्षता आ जाये और शिर पर तेल या चिकनाई के साथ नीचे बह आवे, उसका जीवन एक मास तक ही होता है । ( २ ) जो मनुष्य पाव को जमीन पर घिस कर चलता है और विकृति के कारण जिसके कन्धे बैठ गये हों या जो कन्धों को आगे झुका कर ( छाता को अन्दर की ओर दवा कर ) दौड़ता है, वह मनुष्य देर तक इस लोक में नहीं रहता, वह शीघ्र मर जाता है। ( ३ ) जिस मनुष्य के स्नान करने के उपरान्त चन्दनादि के लेप करने पर भी पहिले छाती पर लगा लेप सूखता है और शेष अंगों पर लेप गीला रहता है वह पन्द्रह दिन भी नहीं जीता । ( ४ ) जिस रोगी को लक्ष्य कर वैद्य अति प्रयत्न करने पर भी औषध तैयार नहीं कर पाता उस रोगी का जीना बहुत कठिन है। ( ५ ) बहुत प्रकार से जानी हुई नियमपूर्वक रोगों पर सफलता पूर्वक प्रयोग की हुई, विधिपूर्वक दी हुई औषध भी जिस रोगी पर फल न देवे, सफल न हो, उस रोगी का बचना असम्भव है। ( ६ ) वैद्य द्वारा उत्तम रीति से बनाये भोजन का उपयोग करता हुआ भी जो रोगी उत्तम फल न पाये उस रोगी का जीवित रहना असम्भव है ॥ ३–८ ॥ दूताधिकारे वक्ष्यामो लक्षणानि मुमूर्षताम् । यानि दृष्ट्वा भिषक् प्राज्ञः प्रत्याख्यायादसशयम् ॥ ६ ॥ मुक्तकेशेऽथवा नग्ने रुदत्यप्रयतेऽथवा । भिषगभ्यागतं दृष्ट्वा दूतं मरणमादिशेत् ॥ १० ॥ सुप्ते भिषजि ये दूताश्छिन्दत्यपि च भिन्दति । आगच्छन्ति भिषक् तेषां न भर्तारमनुव्रजेत् ॥ ११ ॥ जुह्वत्यग्निं तथा पिण्डं पितृभ्यो निर्वपत्यपि । वैद्ये दूता य आयान्ति ते घ्नन्ति प्रजिघांसवः ॥ १२ ॥ कथयत्यप्रशस्तानि चिन्तयत्यथवा पुनः । वैद्ये दूता मनुष्याणामागच्छन्ति, मुमूर्षताम् ॥ १३ ॥ मृतदग्धविनष्टानि भजति व्याहरत्यपि । अप्रशस्तानि चान्यानि वैद्ये दूता मुमूर्षताम् ॥ १४ ॥