चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ चरकसंहिता [ अ० १२ दूतारिष्ट-( १ ) वैद्यगत अरिष्ट लक्षण— इसके आगे दूताधिकार में मरणोन्मुख रोगियों के लक्षण कहते हैं, जिनको देख कर बुद्धिमान् वैद्य मरणोन्मुख रोगी को तत्काल निश्चय से पहिचान कर उनकी चिकित्सा न करे। ( १ ) यदि वैद्य के बाल खोले हुए, नग्न अवस्था में, रोते हुए अथवा अपवित्र अवस्था में, वैद्य को दूत बुलाने आवे तो वैद्य दूत को देख कर रोगी की मृत्यु बतलावे। ( २ ) वैद्य के सोते हुए जो दूत तोड़ फोड़ कर घर में आते हैं, इन दूतों के स्वामी को वैद्य देखने न जाये ( उनको मृतप्राय जाने)। ( ३ ) वैद्य यदि अग्नि में हवन कर रहा हो अथवा पितरों को पिण्डदान कर रहा हो, ऐसी अवस्था में जो दूत बुलाने आते हैं वे रोगी को मारने वाले होते हैं। [ यद्यपि दूत स्वयं रोगी की हितचिन्ता से आते हैं, वे स्वयं रोगी को नहीं मारते तो भी ऐसे दूत रोगी की मृत्यु की सूचना देते हैं, रोगी के मरण के पूर्व ऐसे दूतों के आने और दूतों के पूर्वभावी होने से उपचार ने कारणरूप मान लिया है ]। ( ४ ) वैद्य के अशुभ बातचीत करते हुए अथवा चिन्ता करते समय दूत द्वारा वैद्य को बुलाने वाले रोगी अति शीघ्र मरने वाले होते हैं। ( ५ ) वैद्य किसी मृत पुरुष के सम्बन्ध में या जली अथवा नष्ट वस्तु के विषय में या इसी प्रकार की किसी अशुभ घटना के विषय में बातचीत कर रहा हो, ऐसी अवस्था में जो दूत बुलाने आते हैं, वे मरणासन्न रोगियों के ही होते हैं। उनका रोगी मृत्यु के मुख में रहता है ॥ ९-१४ ॥ विकारसामान्यगुणे देशे कालेऽथवा भिषक् । दूतमभ्यागतं दृष्ट्वा नाऽऽतुरं तमुपाचरेत् ॥ १५ ॥ दीन-भीत-द्रुत-त्रस्त मलिनामसतीं स्त्रियम् । त्रीन् व्याकुलांश्च षण्ढांश्च दूतान्विद्यान्मुमूर्षताम् ॥ १६ ॥ ( २ ) देश काल गत अरिष्ट लक्षण— ( ६ ) रोग के समान गुणवाले देश या काल में यदि दूत आवे तो उस रोगी के पास दूत के बुलाने पर न जाये उनकी चिकित्सा न करे। [ रोग के समान गुणवाला देश जैसे रक्त-पित्त रोग में अग्नि के समीप स्थान हो, काल जैसे रक्त-पित्त का मध्याह्न काल है ]। ( ७ ) मलिन, असती ( वेश्या आदि ) स्त्री, दीनता से युक्त, भयभीत, भागती हुई, घबड़ाई हुई वा तीन मनुष्य एक साथ या एक के पीछे एक लगातार और नपुंसक दूत बुलाने आयें तो समझना चाहिये कि उनके रोगी मरना ही चाहते हैं ॥ १५-१६ ॥ अङ्गव्यसनिनं दूतं लिङ्गिनं व्याधितं तथा । संप्रेक्ष्य चोग्रकर्माणं न वैद्यो गन्तुमर्हति ॥ १७ ॥