भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८७ इमामपि च बुध्येत गृहावस्थां मुमूर्षताम् ॥ ३२ ॥ प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृद्वीजफलसर्पिषाम् । वृषब्राह्मणरत्नान्नदेवतानां विनिर्गतिम् ॥ ३३ ॥ अग्निपूर्णानि पात्राणि भिन्नानि विशिखानि च । भिषग् मुमूर्षतां वेश्म प्रविशन्नेव पश्यति ॥ ३४ ॥ छिन्नभिन्नविदग्धानि भग्नानि मृदितानि च । दुर्बलानि च सेवन्ते मुमूर्षोर्वैश्मिका जनाः ॥ ३५ ॥ ( शयनं वसनं यानं गमनं भोजनं रुतम् । श्रूयतेऽमङ्गलं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ ३६ ॥ ) शयनं वसनं यानमन्यदपि परिच्छदम् । प्रेतवद्यस्य कुर्व्वन्ति सुहृदः प्रेत एव सः ॥ ३७ ॥ अन्नं व्यापद्यतेऽत्यर्थं ज्योतिश्चैवोवशाम्यति । निवाते सेन्धनं यस्य तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ ३८ ॥ आतुरस्य गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा । अतिमात्रममत्राणि दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ३९ ॥ निम्नलिखित लक्षणों से भी मरने वाले रोगी के घर की अवस्था का ज्ञान कर लेना चाहिये । ( १ ) घर में घुसने के समय पानी से भरे पात्र, आग, मिट्टी, बीज, फल, घी, बैल ( गाय ), ब्राह्मण, रत्न, अन्न या देवताओं की प्रतिमा आदि को यदि घर से बाहर कोई ले जा रहा हो, अग्नि से भरे पात्र अथवा टूटे और खाली पात्रों को वैद्य रोगी के घर में घुसते देखे तो अशुभ है । ( २ ) इसी प्रकार मिट्टी के टूटे-फूटे, जले बर्त्तन दिखाई दें, घर के आदमी निर्बल, तेजहीन दिखाई दें, तो रोगी नहीं बचता । ( ३ ) जिस रोगी का बिस्तर ( उत्तर को सिर, दक्षिण दिशा में पांव ) वस्त्र, यान अथवा अन्य सामान मृतक के समान किया जा रहा हो, तो उसे भी मृतक का भाई गिनना चाहिये । ( ४ ) जिस रोगी का आहार अत्यन्त बिगड़ा हुआ हो, और वायु के झोंके से रहित स्थान में इंधन के होने पर भी आग बुझती हो, वह रोगी चिकित्सा के अयोग्य है । ( ५ ) जिस रोगी के घर में थाली, कटोरे आदि पात्र बहुत करके टूटते या गिरते हों, उस रोगी का जीवन कठिन है ॥ ३२-३६ ॥ भवन्ति चात्र-यद् द्वादशभिरध्यायैर्व्यासतः परिकीर्तितम् । मुमूर्षतां मनुष्याणां लक्षणं जीवितान्तकृत् ॥ ४० ॥ तत्समासेन वक्ष्यामः पर्यायान्तरमाश्रितम् । पर्यायवचनं ह्यर्थविज्ञानायोपपद्यते ॥ ४१ ॥