भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 616 में से

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पृष्ठ 204

१६० चरकसंहिता [अ० १२

(जटा) पड़ जाती हैं, बालों में माग निकल आती है, रोगी के लिये जरूरी
औषध नहीं मिलती, तथा जो मिलती है वह फलप्रद नही होती, रुचि के अनुसार
दी हुई औषध से भी सफलता नहीं होती, बल और ओज को कम करके नाना
प्रकार के भयानक तथा अनेक ओषधियो से अच्छे होने वाले रोग शीघ्र उत्पन्न
हो जाते हैं, शब्द, रूप, रस, गन्ध और अनेक प्रकार की अशुभ चेष्टा और
विचार उत्पन्न होते हैं, चिकित्सा करने पर भी अशुभ फल दीखता है, नाना
प्रकार के भयानक स्वप्न दिखाई देते हैं, स्वभाव दुष्ट बन जाता है, सेवक,
परिचारक विरूद्ध एव निराश हो जाते हैं, रोगी की आकृति मृतक के समान
बन जाती है, प्रकृति विशेष रूप में कम हो जाती है और विकृति विशेष रूप मे
बढ़ जाती है। ये सब उत्पात घोर अनिष्टसूचक हैं। ये सब लक्षण मरणासन्न
मनुष्य में होते हैं। शास्त्र-प्रमाण के अनुसार मरने वाले मनुष्य के ये
लक्षण कहे हैं॥ ४३-६१॥
मरणायेह रूपाणि पश्यताऽपि भिषग्विदा।
अपृष्टेन न वक्तव्यं मरणं प्रत्युपस्थितम् ॥ ६२ ॥
पृष्टेनापि न वक्तव्यं तत्र यत्रोपघातकम् ।
आतुरस्य भवेद् दुःखमथवाऽन्यस्य कस्यचित् ॥ ६३ ॥
अनुवन् मरणं तस्य नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ।
वैद्य के कर्त्तव्य—इन लक्षणों को वैद्य देख कर भी बिना पूछे किसी को
नहीं कहे और जहा पर रोगी को अथवा किसी अन्य आदमी को दुःख या मृत्यु
हो तो वहा पर पूछने पर भी रोगी की मृत्यु न कहे । उनसे कह दे कि मैं इस
रोगी की चिकित्सा नहीं करना चाहता ॥ ६२-६३॥
यस्य पश्येद्विना शाय लिङ्गानि कुशलो भिषक् ॥ ६४ ॥
लिङ्गेभ्यो मरणाख्येभ्यो विपरीतानि पश्यता।
लिङ्गान्यारोग्यमागन्तुं वक्तव्यं भिषजा ध्रुवम् ॥ ६५ ॥
दूतैरुत्पातिकैर्भावैः पथ्यातुरकुलाश्रयैः ।
आतुराचार-शीलेष्ट-द्रव्य-संपत्ति-लक्षणैः ॥ ६६ ॥
रोगी के अच्छे लक्षण—जिस मरणासन्न रोगी मे वैद्य अच्छे लक्षण देखे,
जैसे—मरणसूचक लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, वैद्य को बुलानेवाले दूत
सद्भाव युक्त हों, वैद्य के मार्ग मे उत्पात न हों, रोगी के घर में अमंगल लक्षण
दृष्टिगोचर न हों, इत्यादि लक्षणों को देखकर रोगी का आरोग्य सम्बन्धियों तथा
रोगी को अवश्य कह देना चाहिये ॥ ६४-६६ ॥
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