चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८६ भेषजानि न संवृत्तिं प्राप्नुवन्ति यथारुचिम् । यानि चाप्युपपद्यन्ते तेषां वीर्यं न सिध्यति ॥ ५६ ॥ नानाप्रकृतयः क्रूरा विकारा विविधौषधाः । क्षिप्रं समभिवर्तन्ते प्रतिहत्य बलौजसी ॥ ५७ ॥ शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्चेष्टा विचिन्तितम् । उत्पद्यन्तेऽशुभान्येव प्रतिकर्मप्रवृत्तिषु ॥ ५८ ॥ दृश्यन्ते दारुणाः स्वप्ना दौरात्म्यमुपजायते । प्रेष्याः प्रतीपता यान्ति प्रेताकृतिरुदीर्यते ॥ ५९ ॥ प्रकृतिर्हीयतेऽत्यर्थं विकृतिश्चाभिवर्धते । कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरिष्टमुपलक्ष्यते ॥ ६० ॥ इत्येतानि मनुष्याणां भवन्ति विनाशिष्यताम् । लक्षणानि यथोद्देशं यान्युक्तानि यथागमम् ॥ ६१ ॥ अन्तकाल अर्थात् मृत्यु के समय में प्रिय प्राणो के निकलते समय, शरीर के सिरा, स्नायु आदि में जो परिवर्त्तन होते हैं, शरीर के नाश होने के समय जो व्याकुल दशा होती है, इनके कारण शरीर के अवयवों की जो दशा होती है, उसका शास्त्रानुसार वर्णन करते हैं:— प्राण पीड़ित होते हैं, ज्ञान की गति बन्द हो जाती है, अंगों का बल नष्ट हो जाता है, क्रियायें बन्द ( नष्ट ) हो जाती है, चेतना बिखरती जाती है, मन में आकाङ्क्षा, उत्सुकता रहती है, चित्त में भय समा जाता , स्मरण शक्ति लुप्त हो जाती है, बुद्धि, लज्जा और कान्ति भी नष्ट हो जाती है, पाप से उत्पन्न होने वाले रोग पैदा होने लगते हैं, ओज और तेज (शुक्र) कान्ति नष्ट हो जाती है, शील-स्वभाव बहुत बदल जाता है, भक्ति नष्ट हो जाती है, कान्ति और प्रभा विकृत हो जाती है, शुक्र स्थान से भ्रष्ट हो जाता है, वायु ऊपर को चढ़ने लगता है, मास का क्षय हो जाता है, रक्त भी कम हो जाता है, शरीर की गरमी नष्ट हो जाती है, सन्धिया शिथिल हो जाती हैं, गन्ध, वर्ण, स्वर, विकृत हो जाते हैं, शरीर का रंग बदल जाता है, शरीर के रोमकूप बन्द हो जाते हैं, शिर पर धूम हो जाता है, गोमय के समान भयानक चूर्ण उत्पन्न हो जाता है (स्नेह नहीं रहता ), शरीर के जिन स्थानो पर निरन्तर स्पन्दन (कम्पन) रहता है, उन स्थानों पर जड़ता आ जाती है, वे किसी भी प्रकार में गति नहीं करते, शरीर के स्थानों में शीत, मृदु, दारुण आदि गुण भी बदल जाते हैं, (शीत के स्थान पर उष्णमा, मृदु के स्थान पर कठोरता, कठोरता के स्थान पर मृदुता, उष्णमा के स्थान पर शीत हो जाता है), नखों में पुष्प (फूल, श्वेत चिह्न), उत्पन्न हो जाता है, दातों मे मलिनता आ जाती है, पलकों में गुझिया