चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ चरकसंहिता [ अ० १२ के घर में घुसते समय निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे तो शुभ लक्षण समझने चाहिये । जैसे—दही, अक्षत (खिलें चावल ), ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, गाय, राजा, रत्न, पानी से भरे घड़े, सफेद घोड़ा, शक्र ध्वजा, फल, यावक ( यावक- अन्न ), गाद में चढ़ा कन्या या पुत्र, बधा हुआ श्रेष्ठ पशु, खोदी हुई मिट्टी वाली भूमि, जलती हुई आग, लड्डू, सफेद फूल, चन्दन, मनोनुकूल खान-पान, मनुष्यों से भरी गाड़ी, बछड़े समेत गाय, बछेरी समेत घोड़ा, लड़के समेत स्त्री, जीवजीवक ( चकोर ), सिद्धार्थक, सारस, प्रियवादी ( चातक ), हंस, कटफोड़ा, चाष ( भास पक्षी ), मोर, मछली, बकरा, ब्राह्मण, शंख, प्रियंगु, घृत, गोरोचना, शीशा (दर्पण), सफेद सरसों, रोचना इन सब पदार्थों का दर्शन शुभ है ॥ ६६-७६ ॥ गन्धः सुगन्धो वर्णश्च सुशुक्लो मधुरो रसः । मृगपक्षिमुष्याणा प्रशस्ताश्च गिरः शुभाः ॥ ७७ ॥ छत्रध्वजपताकानामुत्क्षेपणमभिष्टुतिः । भेरीमृदङ्गशङ्खाना शब्दाः पुण्याहनिस्वनाः ॥ ७८ ॥ वेदाध्ययनशब्दाश्च सुखो वायुः प्रदक्षिणः । पथि वेश्मप्रवेशे तु विद्यादारोग्यलक्षणम् ॥ ७६ ॥ सुगन्ध, श्वेत वर्ण, मधुर रस, मनुष्य, पशु, पक्षियों की शुभ वाणी प्रशस्त समझनी चाहिये । छत्र, ध्वजा, पताकाओं का ऊपर चढ़ा रहना, अथवा इधर उधर आकाश में उड़ते रहना, भेरी, मृदंग, शंख आदि बाजों के पवित्र शब्द, वेद के पढ़ने का शब्द, सुखकारक दक्षिण दिशा की वायु का बहना—ये सब शुभ चिह्न हैं। इन लक्षणो को रास्ते मे देख कर रोगी की आरोग्यता को समझ लेना चाहिये ॥ ७७-७६ ॥ मङ्गलाचारसपन्नः सातुरो वैश्मिको जनः । श्रद्दधानोऽनुकूलश्च प्रभूतद्रव्यसंग्रहः ॥ ८० ॥ धनैश्वर्यसुखावाप्तिरिष्टलाभः सुखेन च । द्रव्याणा तत्र याग्याना योजना सिद्धिरेव च ॥ ८१ ॥ रोगी और उसके घर के मनुष्य यदि मंगल आचार वाले, श्रद्धावाले, अनु- कूल, बहुत अधिक सामान ( धन आदि ) वाले, धन-ऐश्वर्य-सुख से परिपूर्ण हों, इष्ट वस्तु सुगमता से मिल सके, उचित तथा अभीष्ट वस्तु की योजना सुग- मता से की जा सके, ऐसी अवस्था में सफलता शीघ्र मिलती है ॥ ८०-८१ ॥ गृहप्रासादशैलाना नागानां वृषभस्य च । हयानां पुरुषाणां च स्वप्ने समधिरोहणम ॥ ८२ ॥