चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] १३ इन्द्रियस्थानम् १६३ अर्णवानां प्रतरणं वृद्धिः सर्वाधनिःस्रुतिः । स्वप्ने देवः सपितृभिः प्रसन्नैश्चाभिभाषणम् ॥ ८३ ॥ सोमार्कवह्निद्विजातीनां गवां नॄणां यशस्विनाम् । दर्शनं शुक्लवस्त्राणां ह्रदस्य विमलस्य च ॥ ८४ ॥ मास-मत्स्य-विषामेध्यच्छत्रादर्शपरिग्रहः । स्वप्ने सुमनसां चैव शुक्लानां दर्शनं शुभम् ॥ ८५ ॥ अश्वगोरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च । रोदनं पतितात्थानं द्विषतां चावमर्दनम् ॥ ८६ ॥ रोगी का स्वप्न में घर, महल, पर्वत, हाथी बैल घोड़े आदि पर चढ़ना, समुद्रों को तैरना, समुद्र का बढ़ना, दुःखों से पार होना, प्रसन्न हुए देवताओं और पितरों से बातचात करना, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, गाय और कीर्तिशाली पुरुषों का दर्शन करना, सफेद वस्त्रों का दर्शन, निर्मल सरोवर का दर्शन होना, मास, मछली, विष, अपवित्र वस्तु, छत्र, दर्पण इन वस्तुओं को ग्रहण करना, सफेद फूलों का दर्शन या धारण करना, घोड़ा, बैल या रथ पर बैठ कर सवारी करना, पूर्व उत्तर में जाना, रोना वा गिरे हुओं का उठना, शत्रुओं का अवमर्दन करना, ये लक्षण हों तो जाने कि रोगी स्वस्थ हो जायगा ॥ ८२-८६ ॥ सत्त्वलक्षणसंयोगो भक्तिर्वैद्यद्विजातिषु । साध्यत्वं न च निर्वेदस्तदारोग्यस्य लक्षणम् ॥ ८७ ॥ आरोग्याद् बलमायुश्च सुखं च लभते महत् । इष्टांश्चाप्यपरान् भावान् पुरुषः शुभलक्षणः ॥ ८८ ॥ जिस रोगी की वृत्ति सत्त्व गुण के लक्षणों से युक्त हों, जो रोगी वैद्य और ब्राह्मणों में भक्ति रखता हो, रोगी में आत्मग्लानि भाव न हो तो रोगी को साध्य समझे । उपरोक्त शुभ लक्षणो से मनुष्य को आरोग्य दीर्घायु, महान् सुख एव अन्य वाञ्छित फल प्राप्त होते हैं ॥ ८७ ८८ ॥ तत्र श्लोकः-उक्तं गोमयचूर्णीये मरणारोग्यलक्षणम् । दूतस्वप्नान्तरोत्पातयुक्तिसिद्धिद्व्यपाश्रयम् ॥ ८६ ॥ 'इस गोमयचूर्णीय' नामक अध्याय मे मरण व आरोग्य के लक्षण दूत के लक्षण, स्वप्न के लक्षण, मार्ग मे जाते समय शुभ अशुभ उत्पात, रोगी के घर मे होने वाले लक्षण, युक्ति और सिद्धि में वर्णन कर दी है ॥८६॥ भवति चात्र-इतीदमुक्तं प्रकृतं यथा तथा तदन्ववेक्ष्य सतत भिषग्विदा ।