चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६६ कुटी मे प्रविष्ट होकर संशोधन ओषधियों से शुद्ध होकर पुनः बलवान् होने पर रसायन का प्रयोग करे । इसलिये प्रथम संशोधनों को कहते हैं ॥ २४ ॥ हरीतकीनां चूर्णानि सैन्धवामलके गुडम् । वचां विडङ्गं रजनीं पिप्पलीं विश्वभेषजम् । पिवेदुष्णाम्बुना जन्तुः स्नेहस्वेदोपपादितः ॥ २५ ॥ तेन शुद्धशरीराय कृतसंसर्जनाय च । त्रिरात्रं यावकं दद्यात्पञ्चाहं वाऽपि सर्पिषा । सप्ताहं वा पुराणस्य यावच्छुद्धेस्तु वर्चसः ॥ २६ ॥ शुद्धकोष्ठं तु तं ज्ञात्वा रसायनमुपाचरेत् । वयःप्रकृतिसात्म्यज्ञो योगिकं यस्य यद्भवेत् ॥ २७ ॥ संशोधन—हरड़ का चूर्ण, सेन्धा नमक, आवला, गुड़, वच, बायविडंग, हल्दी, पीपल और सोंठ इनके चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये । संशोधन देने से पूर्व रोगी को स्नेहन और स्वेदन दे देना चाहिये । इस प्रकार से शरीर के शुद्ध होने पर पेया आदि पथ्य के क्रम का अनुष्ठान कर चुकने पर हीन, मध्यम और उत्तम शुद्धि की दृष्टि से तीन दिन, पाच दिन और सात दिन जब तक पुराना मल बाहर न हो जाये तब तक यवान्न (जौ का बना भोजन वा कुल्माष, मोटा धान्य ) घी के साथ देना चाहिये । जिस समय कोष्ठ शुद्ध हो जाये उस समय रसायन का उपयोग करे । वय, प्रकृति और सात्म्य को समझनेवाले वैद्य को चाहिये कि जो रसायन उपयोगी हो उसी का प्रयोग करे ॥ २५-२७ ॥ हरीतकीं पञ्चरसामुष्णामलवणा शिवाम् । दोषानुलोमिनीं लघ्वीं विद्याद्दीपनपाचनीम् ॥ २८ ॥ आयुष्या पौष्टिकी धन्या वयसः स्थापनी पराम् । सर्वरोगप्रशमनीं बुद्धीन्द्रियबलप्रदाम् ॥ २९ ॥ हरड़ के गुण—यद्यपि आयुःस्थापक द्रव्यों में आवला ही श्रेष्ठ है, परन्तु विरेचक गुण क होने से रोगनिवारक वस्तुओं में हरड़ ही श्रेष्ठ है । हरड़ मे लवण रस को छोड़ कर शेष पाचो रस हैं, उसे उष्ण वीर्य, कल्याणकारिणी, दोषों का अनुलोमन करनेवाली, लघु, अग्निदीपक, पाचक, आयु को बढ़ानेवाली, पौष्टिक, धन्य, उत्कृष्ट आयु.स्थापक, सब रोगों का नाश करने वाली, बुद्धि इन्द्रिय बल को देने वाली जाने ॥ २८-२९ ॥ कुष्ठ गुल्ममुदावर्तं शोषं पाण्ड्वामय मदम् । अर्शांसि ग्रहणीदोषं पुराण विषमज्वरम् ॥ ३० ॥