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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६६

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६६ कुटी मे प्रविष्ट होकर संशोधन ओषधियों से शुद्ध होकर पुनः बलवान् होने पर रसायन का प्रयोग करे । इसलिये प्रथम संशोधनों को कहते हैं ॥ २४ ॥ हरीतकीनां चूर्णानि सैन्धवामलके गुडम् । वचां विडङ्गं रजनीं पिप्पलीं विश्वभेषजम् । पिवेदुष्णाम्बुना जन्तुः स्नेहस्वेदोपपादितः ॥ २५ ॥ तेन शुद्धशरीराय कृतसंसर्जनाय च । त्रिरात्रं यावकं दद्यात्पञ्चाहं वाऽपि सर्पिषा । सप्ताहं वा पुराणस्य यावच्छुद्धेस्तु वर्चसः ॥ २६ ॥ शुद्धकोष्ठं तु तं ज्ञात्वा रसायनमुपाचरेत् । वयःप्रकृतिसात्म्यज्ञो योगिकं यस्य यद्भवेत् ॥ २७ ॥ संशोधन—हरड़ का चूर्ण, सेन्धा नमक, आवला, गुड़, वच, बायविडंग, हल्दी, पीपल और सोंठ इनके चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये । संशोधन देने से पूर्व रोगी को स्नेहन और स्वेदन दे देना चाहिये । इस प्रकार से शरीर के शुद्ध होने पर पेया आदि पथ्य के क्रम का अनुष्ठान कर चुकने पर हीन, मध्यम और उत्तम शुद्धि की दृष्टि से तीन दिन, पाच दिन और सात दिन जब तक पुराना मल बाहर न हो जाये तब तक यवान्न (जौ का बना भोजन वा कुल्माष, मोटा धान्य ) घी के साथ देना चाहिये । जिस समय कोष्ठ शुद्ध हो जाये उस समय रसायन का उपयोग करे । वय, प्रकृति और सात्म्य को समझनेवाले वैद्य को चाहिये कि जो रसायन उपयोगी हो उसी का प्रयोग करे ॥ २५-२७ ॥ हरीतकीं पञ्चरसामुष्णामलवणा शिवाम् । दोषानुलोमिनीं लघ्वीं विद्याद्दीपनपाचनीम् ॥ २८ ॥ आयुष्या पौष्टिकी धन्या वयसः स्थापनी पराम् । सर्वरोगप्रशमनीं बुद्धीन्द्रियबलप्रदाम् ॥ २९ ॥ हरड़ के गुण—यद्यपि आयुःस्थापक द्रव्यों में आवला ही श्रेष्ठ है, परन्तु विरेचक गुण क होने से रोगनिवारक वस्तुओं में हरड़ ही श्रेष्ठ है । हरड़ मे लवण रस को छोड़ कर शेष पाचो रस हैं, उसे उष्ण वीर्य, कल्याणकारिणी, दोषों का अनुलोमन करनेवाली, लघु, अग्निदीपक, पाचक, आयु को बढ़ानेवाली, पौष्टिक, धन्य, उत्कृष्ट आयु.स्थापक, सब रोगों का नाश करने वाली, बुद्धि इन्द्रिय बल को देने वाली जाने ॥ २८-२९ ॥ कुष्ठ गुल्ममुदावर्तं शोषं पाण्ड्वामय मदम् । अर्शांसि ग्रहणीदोषं पुराण विषमज्वरम् ॥ ३० ॥

हृद्रोगं सशिरोरोगमतीसारमरोचकम् । कासं प्रमेहमानाहं प्लीहानमुदरं नवम् ॥ ३१ ॥ कफप्रसेकं वैस्वर्यं वैवर्ण्यं कामलां कृमीन् । श्वयथुं तमकं छर्दिं क्लैव्यमङ्गावसादनम् ॥ ३२ ॥ स्रोतोविवन्धांन्विविधान् प्रलेपं हृदयोरसोः । स्मृतिबुद्धिप्रमोहं च जयेच्छीघ्रं हरीतकी ॥ ३३ ॥ कुष्ठ, गुल्म, उदावर्त्त, शोष, पाण्डुरोग, मद, अर्श, ग्रहणी, पुराने विषम ज्वर, हृदयरोग, शिरोरोग, अतिसार, अरुचि, कास, प्रमेह, आनाह ( अफरा ), प्लीहा ( बढ़ी तिल्ली ), नवीन उदररोग, कफ-प्रसेक ( मुख से लार बहना, कफ का जाना ), स्वरभेद, विवर्णता, कामला, क्रिमिरोग, श्वयथु ( शोथ ), तमक, छर्दि ( कै ), क्लीबता, अंगों का अवसाद ( शिथिलता ), रसवह आदि स्रोतों के अवरोध, हृदय और छाती की कफ आदि से उत्पन्न लिप्तता, स्मृति और बुद्धिनाश ( अज्ञान ) इन विकारों को हरड शीघ्र ही जीत लेती है ॥ ३०-३३ ॥ अजीर्णिनो रूक्षभुजः स्त्रीमद्यविषकर्षिताः । सेवेरन्नभयामेते क्षुत्तृष्णोष्णार्दिताश्च ये ॥ ३४ ॥ हरीतकी सेवन के योग्य व्यक्ति—अजीर्ण के रोगी, रूक्ष आहार करनेवाले, स्त्री-सम्भोग या विष के कारण दुर्बल व्यक्ति भूख, प्यास और गरमी से पीड़ित पुरुष हरड का सेवन करें ॥ ३४ ॥ तान् गुणांस्तानि कर्माणि विद्यादामलकेष्वपि । यान्युक्तानि हरीतक्या वीर्यस्य तु विपर्ययः ॥ ३५ ॥ अतश्चामृतकल्पानि विद्यात्कर्मभिरीदृश । हरीतकीनां शस्यानि भिषगामलकस्य च ॥ ३६ ॥ ओषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः । तस्मात्फलानि तज्जानि ग्राहयेत्कालजानि तु ॥ ३७ ॥ आपूर्णरसवीर्याणि काले काले यथाविधि । आदित्य-सलिल-च्छाया-पवन प्रीणितानि च ॥ ३८ ॥ यान्यदग्धान्यपूतीनि निर्व्रणान्यगदानि च । तेषां प्रयोगं वक्ष्यामि फलानां कर्म चोत्तमम् ॥ ३६ ॥ आंवले के गुण-कर्म—हरड़ के समान ही आवले में गुण और कर्म जाने । परन्तु आवले का वीर्य हरड़ से विपरीत अर्थात् शीत है । इसलिये उपरोक्त गुणों के कारण अस्थिरहित बीजरहित आवले और हरड़ को अमृत के समान समझना

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१ चाहिये। गुठलीरहित हरड़ आवले का प्रयोग और परिमाण जानना चाहिये। श्रेष्ठ हिमालय पर्वत ही औषधियों के लिये उत्कृष्ट भूमि है। इसलिये अपनी ऋतु में उत्पन्न मौसमी फलो को हिमालय पर्वत से समय समय पर लेना चाहिये। ये फल रस और वीर्य से परिपुष्ट होने चाहियें। ये फल सूर्य, वायु, छाया, पानी से तृप्त व हरे-भरे होने चाहिये। जो फल कृमि आदि से न खाये हों सड़े न हों, जिन पर चोट न लगी हो, रंग रहित हों, उन फलों का प्रयोग और उत्तम कर्मों का अब उपदेश करूंगा ॥ ३५-३६ ॥ पञ्चानां पञ्चमूलानां भागानेकदशपलोन्मितान् । हरितकीसहस्रं च त्रिगुणामलकं नवम् ॥ ४० ॥ विदारिगन्धा बृहतीं पृश्निपर्णीं निदिग्धिकाम् । विद्याद्विदारिगन्धाद्यं श्वदंष्ट्रापञ्चमं गणम् ॥ ४१ ॥ बिल्वाग्निमन्थस्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलाम् । पुनर्नवां शूर्पपर्ण्यौ बलामैरण्डमेव च ॥ ४२ ॥ जीवकर्षभकौ मेदा जीवन्तीं सशतावरीम् । शरेक्षुदर्भकाशानां शालीनां मूलमेव च ॥ ४३ ॥ इत्येषा पञ्चमूलानां पञ्चानामुपकल्पयेत् । भागान्यथोक्तांस्तत्सर्वं साध्यं दशगुणेऽम्भसि ॥ ४४ ॥ दशभागावशेषं तु पूतं तं ग्राहयेद्रसम् । हरीतकीश्च ताः सर्वाः सर्वाण्यामलकानि च ॥ ४५ ॥ तानि सर्वाण्यनस्थीनि फलान्यापोथ्य कूर्चनैः । विनीय तस्मिन्निर्यूहे चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ ४६ ॥ मण्डूकपर्ण्याः पिप्पल्याः शङ्खपुष्प्याः प्लवस्य च । मुस्तानां सविडङ्गानां चन्दनागुरुणोस्तथा ॥ ४७ ॥ मधुकस्य हरिद्राया वचायाः कनकस्य च । भागांश्चतुष्पलान् कृत्वा सूक्ष्मेलायास्त्वचस्तथा ॥ ४८ ॥ सितोपलासहरुं च चूर्णितं तुल्याऽधिकम् । तैलस्य द्वयाढकं तत्र दद्यात् त्रीणि च सर्पिषः ॥ ४९ ॥ साध्यमौदुम्बरे पात्रे तत्सर्वं मृदुनाऽग्निना । ज्ञात्वा लेहमदग्धं च शीतं क्षौद्रेण ससृजेत् ॥ ५० ॥ क्षौद्रप्रमाणं स्नेहार्धं तत्सर्वं घृतभाजने । तिष्ठेत्सम्मूछितं तस्य मात्रा काले प्रयोजयेत् ॥ ५१ ॥

२०२ चरकसंहिता [ अ० १ या नोपरुन्ध्यादाहारमेतं मात्रां जरां प्रति । षष्टिकः पयसा चात्र जीर्णे भोजनमिष्यते ॥ ५२ ॥ ब्राह्म रसायन—पाचों पंच मूलो के पृथक् पृथक् दस पल ( एक पल = ८ तोले के ) लेने चाहिये । हरड़ एक हजार, नया आवला तीन हजार लेने चाहियें । पाच पचमूल पहला ( १ ) पचमूल विदारिगन्धा ( शालपर्णी ), ( २ ) वृहती ( बड़ी कटेरी ), ( ३ ) पृश्निपर्णी, ( ४ ) निर्दिग्धका ( छोटी कटेरी ) और ( ५ ) गोखरू ये पाच विदारोगन्वादि पचमूल है । इसको क्षुद्र पचमूल भी कहते हैं । ( २ ) दूसरा पचमूल—बिल्व ( बेल ), अग्निमन्य ( अरणी ), स्योनाक ( सोनापाठा ), काश्मरा ( गम्भारी ) और पाटला इसे महा-पञ्चमूल कहते हैं । ( ३ ) तीसरा पचमूल—पुनर्नवा, शूर्पपर्णी, ( मुद्गपर्णी और माषपर्णी ), बळा और एरण्ड । ( ४ ) चौथा पचमूल ऋषभक, जीवक, मेदा, जीवन्ती और शतावरी । ( ५ ) पाचवा पचमूल—शर, इक्षु, दर्भ, काश तथा शाली की जड़ । उपरोक्त औषधियों को दस गुणे जल में डाल कर क्वाथ करना चाहिये और जल का दसवा भाग शेष रहने पर निर्मल वस्त्र से छान लेवे । हरड़ और आवलों को निकाल कर इनकी गुठलियों को बाहर कर देना चाहिये । फिर कुचल कर कूर्चनों से इनके रेशे बाहर कर लेने चाहियें । ✤ रेशे निकल जाने पर हरड़ और आंवले की पिठ्ठी को क्वाथ में डाल देना चाहिये । साथ में निम्न वस्तुओं का चूर्ण भी क्वाथ में मिला देना चाहिये । यथा—मण्डूकपर्णी, पिप्पली, शखपुष्पी, प्लव ( केवटी मोथा ), मोथा, बायविडग, लालचन्दन, अगरु, मुलहठी, हल्दी, वच, कनक ( नाग केसर ), छोटी इलायची और दालचीनी, प्रत्येक चार पल, मिश्री १००० पल, तैल २ आढक, घी ३ ✤ ( १ ) आवल और हरड़ के रेशे निकालने के लिये कूर्चनों का उपयोग करते हैं । एक लकड़ी में तीन चार सूइया लगी रहती हैं। उन को इन पर फेरने से रेशे इन में फस जाते हैं। हरड़ और आवले मे सूत होते हैं, इसलिये लकड़ी के कूर्चनो का उपयोग करना चाहिये ' अथवा हरड़ और आंवले को कपड़े में मथ कर निकालना चाहिये । इससे रेशे ऊपर रह जाते हैं ।

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०३

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०३ आढ़क * इन सब को औदुम्बर ( ताम्र ) के कलई किये बर्त्तन मे कोमलाग्नि पर पाक करना चाहिये । जब लेह भली प्रकार बन जाये और जले नहीं, तब उतार लेना चाहिये । ठण्डा होनेपर इसमें शहद मिलाना चाहिये । शहद की मात्रा घी और तेल की मात्रा से आधी होनी चाहिये । इन सब को घी से भावित पात्र मे रखना चाहिये । मात्रा ओर समय को देख कर इतना इस अवलेह का खाये जो पच जाये और भूख को नष्ट न करे । [ साधारण मात्रा एक तोला ] । सेवन करनेवाला व्यक्ति पूर्ववत् आहार राशि का उपयोग करे । इस अवलेह के जीर्ण होने पर दूध के साथ साठी चावलों का भात खाना चाहिये ॥ ४०-५२ ॥ वैखानसा बालखिल्यास्तथा चान्ये तपोधनाः । रसायनमिदं प्राप्य बभूवुरमितायुषः ॥ ५३ ॥ मुक्त्वा जीर्णं वपुश्चाग्र्यमवापुस्तरुणं वयः । वीत तन्द्रा-क्लम-श्वासा निरातङ्काः समाहिताः ॥ ५४ ॥ मेधा-स्मृति-बलोपेताश्चिररात्रं तपोधनाः । ब्राह्मं तपो ब्रह्मचर्यं चेरुश्चात्यन्तनिष्ठया ॥ ५५ ॥ रसायनमिदं ब्राह्ममायुष्कामः प्रयोजयेत् । दीर्घमायुर्वयश्चाग्र्यं कामांश्चेष्टान् समश्नुते ॥ ५६ ॥ इति ब्राह्मरसायनम् । वैखानस, बालखिल्य और अन्य तपस्वी लोगों ने इस रसायन के सेवन से अपरिमित आयु प्राप्त की । जीर्ण, शीर्ण, वृद्ध शरीर त्याग कर नया सुन्दर जवान शरीर और आयु पाई । इसके सेवन से तपस्वी लोग तन्द्रा, क्लम (थकान) श्वास (श्रमजन्य) से रहित, नीरोग, मेधा, स्मृति, बल से युक्त होकर बहुत

  • परिभाषा-नियम से, घी और तैल द्विगुण करना चाहिये । अष्टांग-संग्रह में यह योग आया है । वहा पर दुगने का विधान दिया है । यहा पर सब घी, तैल, क्वाथ, चूर्ण, मिश्री को एक साथ पाक करने की विधि बतलाई है । यदि इनको पृथक् पृथक् भी पकाये तो भी कार्य हो जायेगा । हरड़ और आवले तो घी और तैल में भून कर रख ले । इस पिट्ठी को क्वाथ और मिश्री में मिला कर पाक करें । आसन्न पाक होने पर मण्डूकपर्णी आदि का चूर्ण मिला कर उतार लें और शीतल होने पर शहद मिला देवें । हरड़ और आवले को भूनते समय लोहे की कड़ाही या कोंचे का उपयोग न करके कलई वाले पात्र तथा लकड़ी का प्रयोग करना उत्तम है ।

२०४ चरकसंहिता [ अ० १ दिनों तक ब्रह्म, तप, एवं ब्रह्मचर्य का अत्यन्त एकाग्रता (निष्ठा) के साथ पालन कर सके । दीर्घायु को चाहनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि इस रसायन का उपयोग करे । इसके सेवन से दीर्घायु, श्रेष्ठ वय, मनचाही कामनायें प्राप्त होती हैं ॥ ५३-५६ ॥ यथोक्तगुणानामामलकाना सहस्रं पिष्ट-स्वेदन-विधिना पयस ऊष्मणा सुस्विन्नमनातपशुष्कमनस्थि चूर्णयेत्, तदामलकसहस्रं स्वरसपरिपोतँ स्थिरा-पुनर्नवा-जीवन्ती- नागबला ब्रह्मसुवर्चला-मण्डूकपर्णी-शतावरी- शङ्खपुष्पी-पिप्पली-वचा-विडङ्ग स्वयंगुप्तामृता-चन्दनागुरु-मधुक-मधूक- पुष्पोत्पल-पद्म-मालती-युवती यूथिका-चूर्णाष्टभाग-संयुक्तं, पुनर्नार्गबला- सहस्रपल-स्वरस-परिपोतमनातपशुष्कं द्विगुणितमषिषा क्षौद्रसर्पिषा वा क्षुद्रगुडाकृति कृत्वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे भस्मराशेरधः स्थापयेदन्त- र्भूमेः पक्षं कृतरक्षाविधानमथर्ववेदविदा, पक्षात्यये चोद्धृत्य कनक रजत- ताम्र-प्रवाल-कालायस-चूर्णाष्टभाग-सयुक्तमर्धकर्षवृद्ध्या यथोक्तेन विधिना प्रातः प्रातः प्रयुञ्जानोऽग्निबलमभिसमीक्ष्य जीर्णे च षष्टिकं पयसा ससर्पिष्कमुपसेवमानो यथोक्तान् गुणान् समश्नुत इति ॥ ५७ ॥ ब्राह्म रसायन—ऊपर कहे हुए गुणों से युक्त एक हजार आवलों को पिष्ट- स्वेदन विधि द्वारा दूध की गरमी से स्विन्न करना चाहिये* । जब भली प्रकार से स्विन्न हो जायें तब इनकी गुठली निकाल कर इनको छाया में शुष्ककर लेना चाहिये । शुष्क होने पर इनके चूर्ण को एक एक हजार आवलों

  • पिष्ट-स्वेदन विधि कई प्रकार की है । जेमे— (१) एक मलमल में आवले बाधकर हाड़ी के मुख मे लटका देना चाहिये। हाडी मे दूध भर देना चाहिये । दूध आवलों को छुए नहीं । इसको कोमल आग पर गरम करना चाहिये । जब आवले नरम हो जाये तब बाहर कर ले । (२) हाडी मे दूध भर कर हाडी के मुख पर जाली या मलमल बाधकर उस पर आवले रख दें। ऊपर से दूसरी हाडी ढाप दे। फिर गरम करें। (३) हाडी में दूध भर कर ऊपर मुख पर घास आदि रखकर उस पर आंवले रख कर गरम करें । (२) क्षुद्र गुड़ाकृति का अर्थ चक्रपाणि ने फाणित, राब किया है। राब के समान होने पर— (३) अष्टाग सग्रह में—'द्विगुण-सर्पिषा क्षौद्रेण' यह पाठ है। अर्थात् शहद से घी दुगुना लेना चाहिये। यह ठीक भी है।

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०५

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०५ का स्वरस पिला देना चाहिये । आवंलों के ताजे रस में इस चूर्ण को रख देना चाहिये । रस के शुष्क होने पर शालिपर्णी, पुनर्नवा, नागबला, ब्रह्म-सुवर्चला ( ब्राह्मी ), मण्डूकपर्णी, शतावरी, शंखपुष्पी ( शंखाहूलो ), पिप्पली, वच, वायविडंग, कौंच, गिलोय, लाल चन्दन, अगरु, मुलहठी, महुवे के फूल, नीला कमल, श्वेत कमल, मालती, युवती ( नवमालिका, मागरा ), यूथिका ( जूही, श्वेतपुष्पा ), इनका चूर्ण मिलाना चाहिये । इन सब का चूर्ण स्वरस से भावित आवले के चूर्ण से अष्टमाश होना चाहिये । फिर इस सम्पूर्ण चूर्ण में एक हज़ार पल नागबला का स्वरस डालकर छाया मे शुष्क करना चाहिये । शुष्क होने पर दुगना घी अथवा एक साथ मिले घी और शहद मिलाकर गुड़ के समान बन जाने पर छोटा छोटी डलिया बाघकर घी से भावित पवित्र दृढ़ पात्र मे रखकर उपलों की राख मे भूमि क अन्दर गाड़ देना चाहिये । अथर्ववेद के ज्ञाता विद्वानों से रक्षाविधान कराके गत्तं में गाड़ना चाहिये । पन्द्रह दिन तक औषध को भूमि मे गड़े रहने देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे निकाल कर स्वर्ण, चादी, ताम्र, प्रवाल, कालायस ( फौलाद ) की भस्मों को औषध मे अष्टमाश मिलाना चाहिये । इस रसायन को कुटी-प्रावेशिक विधि के अनुसार आधा कर्ष ( १ तोला ) से प्रारम्भ करके धीरे धीरे आधा आधा कर्ष बढ़ाते हुए प्रातः सेवन करना चाहिये । इसका प्रयोग करते समय अग्नि के बल का ध्यान रखना चाहिये । जब यह औषध जीर्ण हा जाये तब घी से मिश्रित साठा के भात को दूध के साथ खाना चाहिये । इस रसायन से उपरोक्त कहे गुण प्राप्त होते हैं ॥ ५७ ॥ भवन्ति चात्र — इदं रसायन ब्राह्मं महर्षिगणसेवितम् । भवत्यरोगो दीर्घायुः प्रयुञ्जानो महाबलः ॥ ५८ ॥ कान्तः प्रजाना सिद्धार्थश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः । श्रुतं धारयते सत्त्वमार्षं चास्य प्रवर्तते ॥ ५६ ॥ धरणीधरसारश्च वायुना समविक्रमः । स भवत्यविष चास्य गात्रे संपद्यते विषम् ॥ ६० ॥ इति ब्राह्मरसायनद्वितीययोगः । इस ब्राह्म रसायन को महर्षियों ने सेवन किया था । इसके सेवन से पुरुष नीरोग, दीर्घायु, महाबलशाली जनता मे प्रिय, सुन्दर ( जिसे जनता चाहती है ), उसकी सब इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं । वह चन्द्रमा और सूर्य के समान कान्तियुक्त होता है, वह सुनते ही याद कर लेता है, उसका मन आर्षप्रकृति का

२०६ चरकसंहिता [ अ० १ हो जाता है, वह पर्वत के समान लम्बा-चौड़ा डीलडौल का, वायु के समान पराक्रमी हो जाता है । विष भी इसके शरीर में पहुचकर अविष, ( विषरहित ) बन जाता है। यह ब्राह्म रसायन का द्वितीय योग है ॥ ५८-६० ॥ बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः काश्मरी पाटलिर्बला । पर्ण्यश्वतस्रः पिप्पल्यः श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥ ६१ ॥ शृङ्गी तामलकी द्राक्षा जीवन्ती पुष्करागुरुः । अभया चामृता ऋद्धिर्जीवकर्षभकौ शठी ॥ ६२ ॥ मुस्तं पुनर्नवा मेदा एला चन्दनमुत्पलम् । विदारी वृषमूलानि काकोली काकनासिका ॥ ६३ ॥ एषां पलोन्मितान्भागान्शतान्यामलकस्य च । पञ्च दद्यात्तदैकत्र जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ६४ ॥ ज्ञात्वा गतरसान्येतान्यौषधान्यथ तं रसम् । तच्चाऽऽमलकमुद्धृत्य निष्कुलं तैलसर्पिषोः ॥ ६५ ॥ पलद्वादशके भृष्ट्वा दत्त्वा चार्धतुला भिषक् । मत्स्यण्डिकायाः पूताया लेहवत्साधु साधयेत् ॥ ६६ ॥ षट्पलं मधुनश्चात्र सिद्धशीते समावपेत् । चतुष्पलं तुगाक्षीर्याः पिप्पलीद्विपलं तथा ॥ ६७ ॥ पलमेकं निदध्याच्च त्वगेलापत्रकेशरात् । इत्ययं च्यवनप्राशः परमुक्तं रसायनम् ॥ ६८ ॥ कासश्वासहरश्चैव विशेषेणोपदिश्यते । क्षीणक्षतानां वृद्धानां बालानां चाङ्गवर्धनः ॥ ६९ ॥ स्वरक्षयमुरोरोगं हृद्रोगं वातशोणितम् । पिपासां मूत्रशुक्रस्थानदोषंश्चाप्यपकर्षति ॥ ७० ॥ अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत योपरुन्ध्यान्न भोजनम् । अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत्पुनर्युवा ॥ ७१ ॥ मेधां स्मृतिं कान्तिमनामयत्वमायुःप्रकर्षं बलमिन्द्रियाणाम् । स्त्रीषु प्रहर्षं परमग्निवृद्धि वर्णप्रसादं पवनानुलोम्यम् ॥ ७२ ॥ रसायनस्यास्य नरः प्रयोगाल्लभेत जीर्णोऽपि कुटीप्रवेशात् । जराकृतं रूपमपास्य सर्वं बिभर्ति रूपं नवयौवनस्य ॥ ७३ ॥ इति च्यवनप्राशः । च्यवनप्राश—बेल की छाल, अरणी की छाल, अरलु की छाल, गम्भारी की

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०७ छाल, पाढल की छाल, खरेंटी, चारों पर्णिया ( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्ग- पर्णी, माषपर्णी ), पिप्पली, गोखरू, दोनों छोटी बड़ी कटेरी, काकड़ासिङ्गी, तामलकी ( भुई आंवला ), द्राक्षा, जीवन्ती, पुष्करमूल, अगरु, हरड बड़ी, गिलोय, ऋद्धि, जीवक, ऋषभक, शठी ( कचूर ), नागरमोथा, पुनर्नवा, मेदा, छोटी इलायची, लाल चन्दन, कमल गट्टा, विदारी, अडूसे की जड, काकोली, काकनासा ( कौआ ठोढ़ी ), प्रत्येक एक एक पल, आवले ५०० इनको एक द्रोण ( परिभाषा से दुगने ) जल में पकावे । पकाते समय आवलों को पाटली में बाँध कर क्वाथ में छोड़ना चाहिये । जब ओषधियों का रस काथ मे आ जाये और ओषधिया नीरस हो जायें तब पोटली को निकाल कर क्वाथ छान लेना चाहिये । इन आवलों की गुठलियों को निकाल कर कपड़े में से आवलों को हाथ से रगड़ कर छानना चाहिये । जिससे रेशे निकल जायें और नरम पिट्ठी सी बन जाये । इस पिट्ठी को मिलित तैल एव घी के बारह पल में भून लेना चाहिये । भूनना इतना चाहिये कि रंग लाल सा हो जाये । काथ में ५० पल राब या दानेदार खाड मिलाकर लेह पकाना चाहिये । पकाने से पूर्व छानकर आवले की पिट्ठी इसमें मिला दे । जब पाक तैयार हो जाय तो इसको उतार ले । ठण्डा होने पर छ. पल ( ४८ तोला ) मधु, वशलोचन ४ पल, पिप्पली दो पल, दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेसर मिलित १ पल मिला दे । पकाते समय निरन्तर लकड़ी के कौंचे ( पल्टा ) से चलाता जावे । [ च्यवनप्राश का पाठ कई पुस्तकों में है । चिकित्सा-कलिका, योग रत्ना- कर और शार्ङ्गधर में कुछ ओषधियों का भेद है । किसी में ३५, किसी मे ३८ और किसी मे ३६ हैं । क्वाथविधि मे भी कहीं चतुर्थांश शेष रखने की विधि लिखी है, कहीं अष्टमांश की । ओषधियों का रस क्वाथ में आना चाहिये । साथ ही शार्ङ्गधर मे तैल के अन्दर आवले भूनने का विधान नहीं। वहा पर केवल घी का ही प्रयोग किया है । ] यह च्यवनप्राश उत्तम रसायन है । खासकर कास, श्वास, को नष्ट करता है । क्षीणक्षत, वृद्ध एव बालकों के अगों को बढ़ाता है । स्वरक्षय, उरोरोग, हृदय- रोग, वात-रक्त, पिपासा, मूत्रस्थान, शुक्रस्थान के रोगों ( वीर्यदोष ) को नष्ट करता है । इस च्यवनप्राश की मात्रा इतनी लेनी चाहिये जिससे भूख नष्ट न हो । इसके प्रयोग से वृद्ध च्यवन ऋषि भी पुनः जवान बन गये थे । इस रसायन के प्रयोग से मेधा, स्मृति, कान्ति, नीरोगता, आयु की दीर्घता, इन्द्रियों की सबलता, मैथुन में समर्थता, देहाग्नि की वृद्धि, वर्ण की निर्मलता, वायु की

२०८ चरकसंहिता [ अ० १

अनुलोमता प्राप्त होती है । कुटी-प्रावेशिक विधि से इस रसायन का प्रयोग करने वाला वृद्ध पुरुष भी वार्द्धक्य के चिह्नों से रहित होकर नई जवानी के रूप को धारण करता है, (मात्रा १ से २ तोला तक) ॥ ६१-७३ ॥ अथाऽऽमलक-हरीतकीनामामलक-बिभीतकानां हरीतकी-बिभीत- कानामामलक-हरीतकी-बिभीतकानां वा पलाशत्वगवनद्धानां मृदावलि- प्तानां कुकूलैके स्विन्नानाममुलकानां पल-सहस्रमुलूखले सगोथ्य दधि- घृत-मधु-पलल तैल-शर्करा संप्रयुक्तं भक्षयेदनन्नभुग्यथोक्तेन विधिना, तस्यान्ते यवाग्वादिभिः प्रकृत्यवस्थापनमभ्यङ्गोत्सादन सर्पिषा यवचू- र्णैश्च, अयं च रसायन-प्रयोग-प्रकर्षो द्विस्तावदग्नि-बलमभिसमीक्ष्य प्रति- भोजनं यूषेण पयसा वा षाष्टिकः ससर्पिष्कोऽतः परं यथासुखविहारः कामभक्ष्यः स्यात् । अनेन प्रयोगेणर्षयः पुनर्युवत्वमवापु, बभूवुश्चानेक- वर्षशतजीविनो निर्विकाराः पर शरीर-बुद्धीन्द्रिय-बल-समुदिताः, चेरु- श्चात्यन्तनिष्ठया तप इति ॥ ७४ ॥ इति चतुर्थामलकरसायनम् । आमलक रसायन (४)-आवले और हरड, (२) आवले ओर बहेड़ा (३) हरड और बहेड़ा, (४) वा आवला हरड और बहेड़ा इन चारों मे से किसी एक योग का लेकर, ढाक का गोली छाल से लपेट कर, ऊपर से मिट्टी का लेप चढ़ा कर गोहों की आग में स्विन्न करना चाहिये । स्विन्न होने पर इनकी गुठलिया निकाल कर एक हजार पल परिमित मात्रा में ऊखल से कूट ले । इनमें दही, घी, शहद, पलल (तिल कल्क), तैल, शर्करा मिला कर कुटीप्रावे- शिक विधि से सेवन करे । इस के सेवन के समय दूसरा किसी प्रकार का कोई अन्न आहार नहीं खाना चाहिये । पश्चात् यवागू आदि पेया द्वारा प्रकृति मे अर्थात् पूर्व भोजन पर लाना चाहिये । प्रति दिन घी का मालिश और जौ के चूर्ण से उबटन करे* । अग्नि बल को देखते हुए इस रसायन को दो ही बार सेवन करे । भोजन में घी युक्त साठी का यूष या दूध के साथ खाना चाहिये । इसके पश्चात् यथेच्छ आहार-विहार का उपभोग करना चाहिये । इस प्रयोग से ऋषियों ने पुनः युवावस्था को प्राप्त किया था, अनेक वर्षों की आयु भोगी थी, वे देर तक नीरोग और शरीर बुद्धि, इन्द्रिय बल से युक्त रहे, उन्होंने अत्यन्त निष्ठा से तप किया ॥ ७४ ॥ हरीतक्यामलक-बिभीतक-पञ्च पञ्चमूल-निर्यूहेण पिप्पली-मधु-मधू- क-काकोली-क्षीरकाकोल्यात्मगुप्ता-जीवकर्षभक-क्षीर-शुक्ला-कल्क-संप्र-

  • अष्टाङ्गसंग्रह के अनुसार रसायनावधि प्रयोग के दुगन दिन घी की मालिश और जौ का उबटन करना चाहिये ।

पा० १ ] १४ चिकित्सितस्थानम् २०६

पा० १ ] १४ चिकित्सितस्थानम् २०६ युक्तेन विदारीस्वरसेन क्षीराष्टगुणसंप्रयुक्तेन च सर्पिषः कुम्भं साध- यित्वा प्रयुञ्जानोऽग्निबलसमा मात्रां, जीर्णे च क्षीरसर्षिभ्यां शालि- षष्टिकमुष्णोदकानुपानमश्नन्, जरा-व्याधि-पापाभिचार-व्यपगत-भयः, शरीरेन्द्रिय-बुद्धि-बलमतुलमुपलभ्याप्रतिहतसर्वारम्भः परमायुरवाप्नुया- दिति ॥ ७५ ॥ इति पञ्चमो हरीतकीयोगः१ । हरितक्यादि योग—हरड़, बहेड़ा, आवला, पाचों पंचमूल इनके सम्मिलित क्वाथ में, पिप्पली, मुलहठी, महुआ, काकोली, क्षीरकाकोली, कौंच बीज, जीवक, ऋषभक, क्षीरशुक्ला (क्षीरविदारी या निशोथ) इनके कल्क से, विदारी के स्वरस से, आठ गुण दूध मिलाकर दो गुणा गोघृत सिद्ध करे * । जाठराग्नि के बल के अनुसार इसका उपयोग करे । जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि (हेमन्त धान) या साठी का भात खाना चाहिये । अनुपान गरम जल होना चाहिये । इसके प्रयोग से बुढ़ापा पाप और रोग तथा अभिचार का भय नहीं रहता । इसके सेवन से देह, इन्द्रिय और बुद्धि का अतुल बल हो जाता है । सब कार्य बिना बाधा के पूर्ण होते हैं तथा पूर्ण आयु प्राप्त होती है ॥ ७५ ॥ हरीतक्यामलक-बिभीतक-हरिद्रा-स्थिरा-वचा [ बला ] विडङ्गामृत- वल्ली-विश्वभेषज मधुक-पिप्पली-सोमवल्क-सिद्धेन क्षीरसर्षिषा मधु- शर्कराभ्यामपि च संन्नीयमलक-स्वरस-शत-पल-परिपीतमामलकचूर्ण- मयश्चूर्णचतुर्भागसंप्रयुक्त पाणितलमात्रं प्रातः प्रातः प्राश्य यथोक्तेन विधिना साय मुद्गयूषेण पयसा वा ससर्पिष्क शालिषष्टिकमश्रीयात् । त्रिवर्षप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठात, श्रुतमवतिष्ठत, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, विषमविषीभवति गात्रे, मात्रमश्मवत् स्थिराभवति, अदृ [ धृ ] श्यो (ष्यो) भूतानां भवतीति ॥ ७६ ॥ इति षष्ठो हरीतकीयोग । १. इतिपञ्चमामलकरसायनम् । *पाक विधि—चक्रपाणि के अनुसार हरीतकी आदि का क्वाथ एक भाग, विदारी स्वरस एक भाग, दूध आठ भाग, घी एक भाग । अष्टागसग्रह के अनु- सार—घी ४ द्रोण, क्वाथ ८ द्रोण, स्वरस ८ द्रोण, दूध ३२ द्रोण । परिभाषा नियम से—घी ४ द्रोण, क्वाथ १६ द्रोण, स्वरस १६ द्राण, दूध ३२ द्रोण लेना चाहिये । यथा— जलस्नेहौषधानाञ्च प्रमाणं यत्र नेरितम् । तत्र स्यादौषधः स्नेहः स्नेहात्तोय चतुर्गुणम् ॥

२१० चरकसंहिता [ अ० १

हरितक्यादि योग (२)—हरड़, आवला, बहेड़ा पृश्निपर्णी, हल्दी, खरैंटी,
बायविडंग, गिलोय, सोंठ, मुलहठी, पिप्पली, सोमवल्क (खदिर श्वेत) इनके क्वाथ
से सिद्ध दूध में से बनाये घी के साथ मधु और शर्करा मिलाकर तथा एक सौ
आंवलों के चूर्ण को आंवलों का स्वरस मिलाकर इस चूर्ण से चतुर्थांश लौह भस्म
मिलाकर दोनों को सम्मिलित करके प्रति दिन प्रातः कुटि प्रावेशिक विधि से एक
कर्ष मात्रा मे सेवन करे। सायंकाल घी मिश्रित शालि या साठी के भात को दूध
या मूग के यूष के साथ खाना चाहिये। इस प्रकार से तीन साल तक इस प्रयोग
को करने पर एक सौ वर्ष तक बिना बुढ़ापे के आयु रहती है, पढ़ा, सुना सब
याद रहता है सब रोग नष्ट हो जाते हैं, शरीर में विष निर्विष हो जाता है, शरीर
पत्थर के समान दृढ हो जाता है, प्राणियों से तिरस्कृत नहीं होता । ['अदृश्यों
भूताना भवति' के स्थान पर 'अधृष्यो भूताना भवति' पाठ ठीक है। यही अर्थ
किया है। वला के स्थान पर वचा भी पाठ है। कविराज गंगाधर सेन ने हरितकी
आदि द्रव्यों के क्वाथ और कल्क दोनों में घृतपाक का विधान किया है] ॥७६॥
भवन्ति चात्र-यथाऽमराणाममृतं यथा भोगवता सुधा।
तथाऽभवन्महर्षीणां रसायनविधिः पुरा ॥ ७७ ॥
न जरा न च दौर्बल्यं नातुर्यं निधनं न च।
जग्मुर्वर्षसहस्राणि रसायनपराः पुरा ॥ ७८ ॥
न केवलं दीर्घमिहाऽऽयुरश्नुते रसायनं यो विधिवन्निषेवते।
गति स देवर्षिनिषेवितां शुभा प्रपद्यते ब्रह्म तथेति चाक्षर (य) म् ॥७९॥
जिस प्रकार देवताओ के लिये अमृत, नागों के लिये सुधा थी, उसी प्रकार
पूर्व काल में महर्षियों के लिये रसायन विधि थी। उस समय में रसायन को
सेवन करने वाले महर्षि न वृद्धावस्था, न दुर्बलता, न रोग और न मृत्यु को ही
(काल से पूर्व) प्राप्त हुए। उन्होंने हजारो वर्षों की आयु भोगी थी। जो पुरुष
विधिपूर्वक रसायन का सेवन करता है उसे केवल दीर्घायु ही नही मिलती अपि तु
वह देवर्षियो से प्राप्त शुभ गति को प्राप्त करता है, ब्रह्म (परमात्मा) का साक्षात्कार
करता है, उस अक्षय ब्रह्म के प्राप्त होने से मुक्ति मिल जाती है ॥ ७७-७९ ॥
तत्र श्लोकः-अभयामलकीयेऽस्मिन् षड्योगाः परिकीर्तिताः।
रसायनाना सिद्धानामायुर्येरनुवर्तते ॥ ८० ॥
इस अभयामलकीय रसायन पाद में सिद्ध रसायनों के छः प्रयोग कहे हैं,
जिनके सेवन से दीर्घायु मिलता है ॥ ८० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थानेप्रथमेऽध्यायेऽ-
भयामलकीयो नाम रसायनपादः प्रथमः ।

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २११ ( द्वितीयः पादः ) अथातः प्राणकामीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'प्राण कामीय' नामक-रसायन पाद की व्याख्या करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ प्राणकामाः शुश्रूषध्वमिदमुच्यमानममृतमिवाऽपरमदितिसुतहित- करमचिन्त्याद्भुतप्रभावमायुष्यमारोग्यकरं वयसः स्थापनं निद्रा-तन्द्रा- श्रम क्लमालस्य-दौर्बल्यापहरमनिल-कफ-पित्त-साम्य-करं स्थैर्यकरमवृद्ध- मांसहरमन्तरग्निसंधुक्षणं प्रभा-वर्ण-स्वरोत्तमकरं रसायनविधानम् । अनेन च्यवनादयो महर्षयः पुनर्मुवत्वमापुर्नारीणां चेष्टतमा बभूवुः । स्थिर-सम-सुविभक्त मांसाः सुसंहतस्थिरशरीराः सुप्रसन्न-बल-वर्ण न्द्रियाः सर्वत्राप्रतिहतपराक्रमा सर्वक्लेशसहाश्च । सर्वे शरीरदोषा भवन्ति ग्राम्याहारादम्ल-लवण-कटुक-क्षार-शुष्क-शाक-माष १ तिल-पलल-पिष्टान्न- भोजिना विरूढ-नव-शूक-शमी धान्य-विरुद्धासात्म्य-रूक्ष- क्षाराभिष्य- न्दिभोजिनां क्लिन्न-गुरू-पूति-पर्युषित भोजिना विषमाशनाध्यशनप्रि- याणां २ दिवास्वप्न-स्त्री-मद्य-नित्यानां विषमातिमात्र-व्यायाम-संक्षोभित- शरीराणां भय-क्रोध-शोक लोभ मोहायास-बहुलानाम् । अतो निमित्तं हि शिथिली-भवन्ति मांसानि, विमुच्यन्ते सन्धयो- विदह्यते रक्तं, विष्यन्दते चानल्पं मेदो, न सन्धीयतेऽस्थिषु मज्जा, शुक्रं न प्रवर्तते, क्षयमुपैत्योजः। स एवभूतो ग्लायति, सीदति, निद्रा-तन्द्रातस्य-समन्वि- तोऽनारतमाशु चेव निरुत्साहः श्वसिति, असमर्थश्चेष्टाना शारीरमान- साना, नष्ट-स्मृति-बुद्धि-च्छायो रोगाणामधिष्ठानभूतो न सर्वमायुर- वाप्नोति । तस्मादेतान्दोषानवेक्षमाणः सर्वान्यथोक्तान्हितानपास्याऽऽ- हारविहारान् रसायनानि प्रयोक्तुमर्हतीत्युक्त्वा भगवान् पुनर्वसुरा- त्रेय उवाच—॥ ३ ॥ आमलकाना सुभूमिजाना कालजानामनुपहत-गन्ध-वर्ण-रसाना- मापर्ण-रस-प्रमाण-वीर्याणा स्वरसेन पुनर्नवा-कल्क-संप्रयुक्तेन सर्पिष साधयेदाढकं अतः परं विदारीस्वरसेन जीवन्ती-कल्क-सप्रयुक्तेन, अत· परं चतुर्गुणेन पयसा बलातिबलाकषायेण शतावरी-कल्क-संप्रयुक्तेन । अनेन क्रमेणैकैकं शतपाकं सहस्रपाकं वा शर्करा-क्षौद्र-चतुर्भागसंप्रयुक्तं १. 'मास' इति च पाठः । २ "प्रायाणा' इति च पाठः ।

२१२ चरकसंहिता [ अ० १

सौवर्णे राजते मार्त्तिके वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेत् ।
तद्यथोक्तेन विधिना यथाग्नि प्रातः प्रातः प्रयोजयेत्, जीर्णे च क्षीर-
सर्पिभ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात् । अस्य त्रिवर्षप्रयोगाद्वर्षशतं वयोऽ-
जरं तिष्ठति, श्रुतमवतिष्ठते, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, अप्रतिहतगतिः
स्त्रीष्वपत्यवान् भवति ॥ ४ ॥
हे प्राण (दीर्घ आयु और स्वस्थता) की कामना रखनेवालों ! सुनो जो
हम कहते हैं, अमृत जिस प्रकार मे देवताओं के लिये हितकारी है, उसी
प्रकार से यह रसायन विधि तुम्हारे लिये दूसरे अमृत के समान हितकारी और
उपयोगी है, यह रसायन विधि अचिन्त्य प्रभाव होने से अद्भुत शक्तिवाली,
आयुवर्द्धक, आरोग्यदायक, आयुस्थापक, निद्रा (वैकारिक), तन्द्रा, श्रम
(थकान), क्लम (पीड़ा), आलस्य और निर्बलता को दूर करनेवाली, वात,
कफ और पित्त को शान्त करती है, स्थिरता (दृढता) को उत्पन्न करती है,
अबद्ध (शिथिल) मांस को सुगठित बनाती है, कायाग्नि को प्रदीप्त करती है,
प्रभा (कान्ति), स्वर और वर्ण को श्रेष्ठ बनाती है। इस रसायन विधि से
च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से जवानी प्राप्त की थी। इसीसे वे स्त्रियों के अति-
प्रिय बने, उनके शरीर की मांसपेशियां दृढ़, समानरूप, सुगठित हो गई थी,
उनके शरीर मजबूत तथा स्थिर हो गये थे, उनके बल, वर्ण और इन्द्रियां
श्रेष्ठ कोटि की हो गई थीं। उनका पराक्रम अप्रतिहत (बेरोक-टोक) था और वे
सब प्रकार के क्लेश उठा सकते थे।
जो व्यक्ति खट्टा, लवण, कटु, क्षार, शुष्क, शाक, माष (वा मास), तिल
कल्क, पिष्टान्न (पिठ्ठी के बने पदार्थ) का सेवन करते हैं, अङ्कुरित (जड़ाया
हुआ), या नये (उसी साल के) शूक या शमीधान्य का उपयोग करते हैं,
परस्पर विरुद्ध, असात्म्य, रूक्ष, क्षार, अभिष्यन्दी द्रव्य का सेवन करते हैं, जो
क्लिन्न (गीला), गुरु, सड़ा, बासी भोजन करते हैं, विषम भोजन या अध्यशन
(भोजन पर और अधिक भोजन) करते हैं, जो दिन में सोते, स्त्री-संग या
मद्य का सेवन करते, विषम या अधिक व्यायाम के कारण शरीर को चलाते
डुलाते हैं, जो भय, क्रोध, शोक, लोभ और आयास से पीड़ित होते हैं, उन
व्यक्तियों में ग्राम्य आहार के कारण सब दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसी कारण
से उनकी मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। सन्धियां अलग होने लगती हैं, रक्त
विदग्ध (जलफुक) जाता है, मेद अधिक मात्रा मे बाहर आता है, मज्जा
अस्थियों को छोड़ देती है, शुक्र उत्पन्न नहीं होता, ओज क्षीण हो जाता है।
इस प्रकार की अवस्था में मनुष्य ग्लानियुक्त (ढीला, हर्षरहित) रहता है,

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१३

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१३ दुःखित रहता है, निरन्तर निद्रा, तन्द्रा, आलस्ययुक्त रहता है, शीघ्र ही उत्साह- हीन होकर हापने लगता है, शारीरिक और मानसिक चेष्टाओं में असमर्थ हो जाता है, स्मृति, बुद्धि और छाया (कान्ति) नष्ट हो जाती है, रोगों का घर बन जाता है और सम्पूर्ण आयु को भी नहीं भोग पाता । इसलिये इन उपरोक्त दोषों को देखते हुए पूर्व कथित अहित आहारविहार का त्याग करके ही मनुष्य रसायन का उपयोग करने के योग्य होता है। यह कहकर भगवान् पुनर्वसु आत्रेय बोले-अच्छी भूमि मे समय पर उत्पन्न हुए एव जिन के गन्ध, वर्ण और रस नष्ट नहीं हुए हों और जिनका रस वीर्य और प्रभाव भरपूर हो ऐसे आवंलों के स्वरस से, पुनर्नवा (सारोड़ी) के कल्क द्वारा घी का एक आढक (२॥ सेर) सिद्ध करे ॐ । इसी प्रकार विदारीकन्द के स्वरस और जीवन्ती कल्क के द्वारा घी का एक आढक सिद्ध करे। इसी प्रकार चौगुने दूध और बला-अतिबला के कषाय स तथा शतावरी कल्क से घृत सिद्ध करे । इस प्रकार से एक एक घी का शत पाक (सौ बार) या हजार बार पाक करे । इस प्रगर से सावित घृत मे चतुर्थांश शर्करा और मधु मिला कर घी से भावित, पवित्र एव दृढ बने स्वर्ण या चांदी अथवा मिट्टी के बर्तन मे इस घी को रख देना चाहिये । फिर कुटी प्रावेशिक पूर्वोक्त विधि से अपनी पाचनशक्ति के अनुसार प्रातःकाल प्रतिदिन खाना चाहिये। औषध के जीर्ण होने पर घी और दूध के साथ शालि (सांठी के चावलों) का भात खाना चाहिये। इस प्रयोग को तीन साल तक सेवन करने पर सौ वर्ष तक बिना वृद्धावस्था के आयु बनी रहती है। पढा सुना सब याद रहता है, सब रोग नष्ट हो जाते हैं, बेरोक- टोक के ससार में विचरता है, स्त्रियों मे अपत्यशाली होता है, उसके बहुत सन्तान होतो हैं । [ सौ बार की अपेक्षा हजार बार किया पाक अधिक गुणशाली है। एक एक घृत का पृथक् २ पाक करना चाहिये । रजत के पात्र की अपेक्षा स्वर्ण मे, मिट्टी के बर्तन की अपेक्षा रजत में अधिक गुण है।]॥ ३४॥ भवतश्चात्र । बृहच्छरीरं गिरिमारसारे स्थिरेन्द्रिय चातिबलेन्द्रियं च । अधृष्यमन्यैरतिकान्तरूपं प्रशान्तपूजासुखचित्तभाक्च ॥ ५ ॥ ॐ परिभाषांनुसार स्वरस दुगुना होगा । घी से चार गुणा स्वरस और कल्क घी का चौथाई होगा। अर्थात् यदि घृत १ आढक हो तो स्वरस ८ आढक और कल्क चौथाई आढक होगा। १ आढक = ६४ पल = ६ सेर ३२ तोले के ।

२१४ चरकसंहिता [ अ० १ बलं महद्वर्णविशुद्धिरग्र्या स्वरो घनौघस्तनितानुकारी । भवत्यपत्यं विपुलं स्थिरं च समश्नतो योगमिमं नरस्य ॥ ६ ॥ इत्यामलकघृतम् । इस प्रयोग के सेवन से शरीर लम्बा, चौड़ा तथा लोहे के समान दृढ़ और अति बलवान् हो जाता है । इन्द्रिया मजबूत और बलशाली हो जाती हैं। कोई इसको तिरस्कृत नहीं कर सकता, रूप भी मनोहर हो जाता है, उत्तम पूजा, उत्तम सुख (आरोग्य) और उत्तम मन (या ज्ञान) युक्त होता है । बल अति अधिक हो जाता है, वर्ण अत्यन्त निर्मल हो जाता है, स्वर बादलों के गर्जन के तुल्य गम्भीर हो जाता है। सन्तान बहुत दृढ़ (नीरोग) होती है ॥ ५-६ ॥ आमलकसहस्रं पिप्पलीसहस्रसंप्रयुक्तं पलाश-तरुण-क्षारोदकोत्तरं तिष्ठेत्, तदनुगतक्षारोदकमनातपशुष्कमनस्थिचूर्णीकृतं चतुर्गुणाभ्यां मधुसर्पिर्भ्यां संनीय शर्करा-चूर्ण-चतुर्भाग-संप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं षण्मा- सान् स्थापयेदन्तर्भूमेः, तस्योत्तरकालमग्नबलसमां मात्रां खादेत् पौर्वा- ह्निकः प्रयोगः, सात्म्यपथ्यश्चाऽऽहारविधिर्नापराह्निकः । अस्य प्रयोगा- द्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ ७ ॥ इत्यामलकावलेहः । आमलकावलेह—एक हजार आवले, और एक हजार पिप्पली, न तो बहुत बच्चे और न बहुत वृद्ध अपितु तरुण ढाक के क्षारोदक में डूबी रहे । [ क्षारोदक विधि—युवा ढाक को जला कर राख कर लेनी चाहिये । इस भस्म से ६ गुना जल डाल कर बिलोड़ना चाहिये । फिर अगले दिन नितार ले । इस प्रकार इक्कीस बार करना चाहिये । इस सारे नितारे पानी को पका कर क्षार तैयार कर लेते हैं । नितरे पानी में क्षार का सब भाग आ जाता है, इस- लिये उसे क्षारोदक कहते हैं । ] जिस समय क्षार जल इनके अन्दर घुस जाये तब इनको छाया मे सुखा कर, गुठलिया निकाल कर चूर्ण बना ले । इस चूर्ण में चार गुणा घी और शहद मिलावे । चूर्ण का चतुर्थांश निर्मल खाण्ड मिलावे । अब इसको एक पात्र में रख कर छः मास तक भूमि में गाड़ दे । छः मास के पीछे अग्नि बल के अनुसार इसकी मात्रा प्रातःकाल खावे । आहार का विचार सात्म्य की अपेक्षा से है । दिन के उत्तर भाग में सेवन न करे। इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक जरारहित आयु रहती है, अन्य सब गुण पूर्वोक्त रसायन के तुल्य

पा० २] चिकित्सितस्थानम् २१५

पा० २] चिकित्सितस्थानम् २१५

ही हैं। [ अष्टांगसंग्रह में—'अभयामलाकसहस्रं' पाठ है। अभया ५०० और आंवला ५०० ] ॥ ७ ॥ आमलक-चूर्णाढकमेकविंशतिरात्रमामलक-सहस्र-स्वरस-परिपूतं मधुघृताढकाभ्यां द्वाभ्यामेकीकृतमष्टभागपिप्पलीकं शर्करा-चूर्ण-चतुर्भाग- संप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्मराशौ निदध्यात्, तद्वर्षान्ते सात्म्य- पथ्याशी प्रयोजयेत्। अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ ८ ॥ इत्यामलकचूर्णम् । आमलक चूर्ण—एक आढक आवले के चूर्ण को एक हजार आवलों के स्वरस में इक्कीस दिन तक भावना देवे । इसमें घी और मधु प्रत्येक के दो दो आढक मिलावे । इन सब का अष्टमांश पिप्पली चूर्ण तथा चूर्ण का चतुर्थांश शर्करा मिला कर घी से भावित पात्र मे रख दे । इस पात्र को बरसात में भस्म के ढेर मे गाड़ दे । वर्षा बीत जाने पर सात्म्यभोजन होने पर इसका प्रयोग करे । इसके प्रयोग से आयु सौ बरस तक बिना वृद्धावस्था तक रहतो है । शेष गुण पूर्व की भाति हैं ॥ ८ ॥ विडङ्ग तण्डुल-चूर्णानामाढकं पिप्पली-तण्डुलानामध्यर्द्धाढकं सिता- पला-सर्पिस्तैल-मध्वाढकै. षड्भिरेकीकृतं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्म- राशाविति सर्वं समानं पूर्वेण यावदाशीः ॥ ६ ॥ इति विडङ्गावलेप. । विडंगावलेह—छिलके रहित विडंग का चूर्ण एक आढक, पिप्पलो बाज का चूर्ण १॥ आढक, मिश्री घी, तैल और शहद इनका एक एक आढक लेकर छ. वस्तुओं को मिला कर घी से भावित पात्र में बरसात के प्रारम्भ में भस्म के ढेर में दाब दे, आगे सब पूर्व की भांति है ॥ ६ ॥ यथोक्तगुणानामामलकानां सहस्रमार्द्र-पलाश-द्रोण्या सपिधानायां बाष्पमनुद्गमन्त्यामारण्यगोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तानि सुस्विन्नशीता- न्युद्धृतकुलकान्यापाथ्याऽऽढकेन पिप्पलीचूर्णानामाढकेन च विडङ्ग- तण्डुलचूर्णानामध्यर्धेन चाढकेन शर्कराचूर्णाना द्वाभ्या द्वाभ्यामाढकाभ्यां तैलस्य मधुनः सर्पिषश्च समायोज्य शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेदे- कविंशतिरात्रमत उर्ध्वं प्रयोगः, अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठ- तीति समानं पूर्वेण ॥ १० ॥ इत्यामलकावलेहोऽपरः। आमलकावलेह ( २ )—पूर्वोक्त गुणवाले एक हजार आवलों को लेकर ढाक की गीली लकड़ी से बनी, ढाक के ढकनवाली नाद में भर कर ढकन लगा कर जंगली उपलों की आग पर ऐसे गरम करे कि उसके बाष्प बाहर न

२१६ चरकसंहिता [ अ० १ जायें। जिस समय आवले सीज जायें और ठण्डे हो जायें तब निकाल कर, कूट कर, गुठली बाहर कर देनी चाहिये। इनके रेशे साफ करके, इसमें पिप्पली चूर्ण एक आढक, विडग-तण्डुल चूर्ण एक आढक, शर्करा (चीनी) शाआढक, तैल २ आढक, मधु दो आदक और घी दो आढक (परिभाषानुसार ४ । ४ आढक), मिला कर घी से भावित स्वच्छ और दृढ पात्र में रख देना चाहिये। इक्कीस दिन के पीछे इसका प्रयोग करना चाहिये। इसके प्रयोग से जरारहित आयु एक सौ वरस की होती है और सब पूर्व की भाँति लाभ होते हैं॥ १०॥ धन्वनि कुशास्तीर्णे स्निग्ध-कृष्ण मधुर-मृत्तिके सुवर्ण-वर्ण-मृत्तिके वा व्यपगत-विष-श्वापद-पवन-सलिलाग्निदोषे कर्षणा-वल्मीक श्मशान- चैत्योषरावसथ-वर्जिते देशे यथर्तु-सुख-पवन-सलिलादित्य-सेविते जा- तान्यनुपहतान्यनध्यारूढान्यबालान्यजीर्णान्यविगतवीर्याणि शीर्ण-पुराण- पर्णान्यसंजातान्यपर्णानि तपसि तपस्ये वा मासे शुचिः प्रयतः कृत- देवार्चनः स्वस्ति वाचयित्वा द्विजातीन् बले सुमुहूर्ते नागबला- मूलान्युद्धरेत्, तेषां सुप्राक्षालितानां त्वक्पिण्डमाम्रमात्रमक्षमात्रं वा श्लक्ष्णपिष्टमालोड्य पयसा प्रातः प्रयोजयेत्, चूर्णीकृतानि वा पिबेत् पयसा, मधुसर्पिर्थ्या वा संयोज्य भक्षयेत्। जीर्णे च क्षीरसर्पिर्भ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात्। संवत्सरप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठ- तीति समानं पूर्वेण ॥ ११ ॥ इति नागबलारसायनम् । नागबला रसायन - जागल प्रदेश में उत्पन्न, कुशा से व्याप्त भूमि में चिकनी काली और मधुर मिट्टी में या सुवर्ण के समान रंग की मिट्टी में उत्पन्न, विष, हिंस्र जन्तु, वायु और जल तथा अग्नि के दोषों से रहित, जहाँ पर हल न चला हो, वल्मीक (बमीठ) श्मशान, चैत्य (देवायतन), जहा ऊषर भूमि न हो, जो रहने की भूमि न हो, ऋतु के अनुसार जहा पर वायु, पानी, धूप पहुचती हो, ऊचाई पर उत्पन्न, पाले आदि से न मरी, कीड़े आदि से न खाई, समीपस्थ वृक्ष या लता से न घिरी, न तो बहुत छोटी और न बहुत पुरानी, (अपितु तरुण), वीर्य से भरपूर, जिसके पुराने पत्ते झड़ गये हो, नये पत्ते अभी उत्पन्न न हुए हों, ऐसी नागबला (गंगेरन) को माघ या फाल्गुन मास में उखाड़े। उखाड़ते समय वैद्य पवित्र और सयमवाले मन से देव- ताओं की पूजा करके, मगल पाठ पढ़ कर, ब्राह्मणो का पूजन करके उत्तम बलवान् मुहूर्त्त में नागबला की जड़ को उखाड़े। इन जड़ों को पानी से भली प्रकार धोकर इनकी त्वचा आम्रमात्र (एक पल भर) या अक्ष (कर्ष) मात्र

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१७

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१७ उतार ले । इस छाल को खूब बारीक पीस कर दूध में मिला कर पीवे, अथवा इस छाल का चूर्ण करके दूध के साथ पीवे, अथवा घी और शहद में मिला कर चाटे। जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि या साठी का भात खावे। एक साल तक इस प्रकार प्रयोग करने पर एक सौ बरस की जरा ( बुढापा ) से रहित आयु होती है और सब गुण पूर्व की भाति होते है ॥११॥ बलातिबला-चन्दनागुरु-धव-तिनिश-खदिर-शिंशपासन स्वरसाः पुनर्नवान्ताश्चौषधयो दश नागबलया व्याख्याताः। स्वरसानामलाभे त्वयं स्वरसविधिः—चूर्णानामाढकमाढकमुदस्याहोरात्रस्थितं मृदितपूतं स्वरसवत्प्रयोज्यम् ॥ १२ ॥ बला ( खरैंटी ), अतिबला, चन्दन, अगरु, धव, तिनिश ( सादन, स्यन्दन वृक्ष जिसका रथ बनता था ), खदिर, शिशपा ( शीशम ), असन इनके स्वरस तथा पुनर्नवा तक गिनी हुई अमृता, गिलोय, अभया, हरड, धात्री, आवला, मुक्ता, रास्ना ( जीवन्ती ), श्वेता ( दूर्वा अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी ), दस औषधियो का प्रयोग भी नागबला से बतला दिया है । अर्थात् जिस प्रकार नागबला का स्वरस प्रयुक्त होना है, उसी प्रकार से इनका स्वरस प्रयोग करना चाहिये । यदि स्वरस प्राप्त न हो सके तो इनका स्वरस तैयार करने का यह प्रकार है कि औषध का चूर्ण एक आढक और पानी एक आढक ( परिभाषा से दुगुना ) लेकर चौबीस घन्टे इसमें भिंगो कर रखना चाहिये । फिर इसको मथ कर, छान कर स्वरस के समान प्रयोग करना चाहिये । [ स्वरस के न मिलने पर यह भी विधि है कि शुष्क द्रव्य को आठ गुणे जल में काथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान कर प्रयोग करना चाहिये । बला आदि के स्वरस का ही ऐसा प्रयोग करना चाहिये । भोजन विधि नागबला के ही समान जाने ] ॥ १२ ॥ भल्लातकान्यनुपहतान्यनामयान्यापूर्णरसप्रमाणवीर्याणि पक्व-जा- म्बव-प्रकाशानि शुचौ शुक्रे वा मासे संगृह्य यवपल्ले माषपल्ले वा निधा- पयेत्, तांन चतुर्मासस्थितानि सहसि सहस्ये वा मासे प्रयोक्तुमारभेत शीत-स्निग्ध-मधुरोपस्कृत-शरीरः, पूर्वं दश भल्लतकान्यापोथ्याष्टगुनेना- म्भसा साधु साधयेत्, तेषा रसमष्टभागावशिष्टं पूतं सपयस्कं पिबेत् सर्पिषाऽन्तर्मुखमभ्यज्य । तान्येकैकभल्लातकोत्कर्षापकर्षेण दश भल्लात- कान्यात्रिंशतः प्रयोज्यानि, नातः परमुत्कर्षः प्रयोगविधानेन, सहस्रपर एव भल्लातकप्रयोगः । जीर्णे च ससर्पिषा पयसा शालिषष्टिकाशनमुप-

२१८ चरकसंहिता [ अ० १ चारः, प्रयोगान्ते च द्विस्तावत् पयसैवोपचारः । तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १३ ॥ इति भल्लातकक्षीरम् । भल्लातक क्षीर—जिन पर किसी प्रकार की चोट न लगी हो, जिनमें किसी प्रकार का रोग ( कृमि आदि ) न हो, जो रस और वीर्य से भरपूर हों, अच्छे परिपुष्ट हों, तथा जा पके हुए जामुन के समान काले रंग के हों, ऐसे भिलावों को ज्येष्ठ ओर आषाढ मास में एकत्रित करके जौ से भरे कोठे में या उड़द के ढेर में रख देवे । चार मास के पीछे अगहन या पौष मास मे इनका सेवन आरम्भ करे। [ जौ आदि में से निकाल कर तुरन्त इनका सेवन न करे, बल्कि शीत काल मे शीत गुण युक्त शरीरावस्था मे ही इनका उपयोग करे ] । अर्थात् खाने से पूर्व शरीर को शीतल, स्नग्ध तथा मधुर वस्तुओं से संस्कृत करे । इनको सेवन करने का प्रकार यह है कि पहिले दस भिलावो को कुचल कर आठ गुण पानी मे पकावे । जब आठवा भाग रस रह जाये तब इसको छान कर इसमे दूध मिला कर पीवे और पीने से पूर्व मुख मे घी का लेप लगा लेव जिससे मुख के भीतर का सारी त्वचा चिकनी हो जाय । इस प्रकार से प्रति दिन एक एक भिलावे को बढाते हुए तीस भिलावे तक बढावे । तीस से ऊपर भिलावे की मात्रा नहीं बढावे और फिर उसी प्रकार से घटा कर दस तक ले आवे । इस प्रकार से एक हजार भिलावों का प्रयोग करे। भिलावों के जीर्ण होने पर घी और दूध के साथ शालि या साठी के चावल खावे । प्रयोग के उपरान्त [ जितने दिन भिलावों को प्रयोग किया उसमे दुगुने दिनों तक ] दूध का ही उपयोग करे अर्थात् दोनों समय दूध पीवे । इस प्रकार करने से एक सौ बरस की बिना वृद्धावस्था के आयु होता है। शेष पूर्व की भाति गुण हैं । [ अष्टाग सग्रह के टीकाकार इन्दु ने निम्न प्रकार से खाने की विधि बताई है । प्रथम दिन १० भिलावें, दूसरे दिन ११, तीसरे दिन १२ इस प्रकार से बढ़ाते हुए बीसवें दिन २६, इक्कीसवे दिन ३०, बाईस से लेकर २७ वे दिन तक तीस तीस ही ले, आगे न बढ़ाये । २८ वे दिन २६, २९ वें दिन २८, तीसवें दिन २७, इस प्रकार से घटा कर सैनालिसवें दिन १० पर ले आवे, ४८ वें दिन भी दस ही देवे । इस प्रकार से एक हजार पूरे हो जायेगे । यह एक हज़ार संख्या आवश्यकतानुसार कम भी हो सकती है। प्रकृति की अपेक्षा से कम में भी परि- त्याग किया जा सकता है। अष्टागसग्रह के अनुसार जितने दिन भिलावे का प्रयोग किया हो उससे तिगुने दिनों तक दूध चावल खाना चाहिये ] ॥ १३ ॥ भल्लातकानां जर्जरीकृतानां पिष्टस्वेदनं पूरयित्वा भूमावाकण्ठं