चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ चरकसंहिता [ अ० १ या नोपरुन्ध्यादाहारमेतं मात्रां जरां प्रति । षष्टिकः पयसा चात्र जीर्णे भोजनमिष्यते ॥ ५२ ॥ ब्राह्म रसायन—पाचों पंच मूलो के पृथक् पृथक् दस पल ( एक पल = ८ तोले के ) लेने चाहिये । हरड़ एक हजार, नया आवला तीन हजार लेने चाहियें । पाच पचमूल पहला ( १ ) पचमूल विदारिगन्धा ( शालपर्णी ), ( २ ) वृहती ( बड़ी कटेरी ), ( ३ ) पृश्निपर्णी, ( ४ ) निर्दिग्धका ( छोटी कटेरी ) और ( ५ ) गोखरू ये पाच विदारोगन्वादि पचमूल है । इसको क्षुद्र पचमूल भी कहते हैं । ( २ ) दूसरा पचमूल—बिल्व ( बेल ), अग्निमन्य ( अरणी ), स्योनाक ( सोनापाठा ), काश्मरा ( गम्भारी ) और पाटला इसे महा-पञ्चमूल कहते हैं । ( ३ ) तीसरा पचमूल—पुनर्नवा, शूर्पपर्णी, ( मुद्गपर्णी और माषपर्णी ), बळा और एरण्ड । ( ४ ) चौथा पचमूल ऋषभक, जीवक, मेदा, जीवन्ती और शतावरी । ( ५ ) पाचवा पचमूल—शर, इक्षु, दर्भ, काश तथा शाली की जड़ । उपरोक्त औषधियों को दस गुणे जल में डाल कर क्वाथ करना चाहिये और जल का दसवा भाग शेष रहने पर निर्मल वस्त्र से छान लेवे । हरड़ और आवलों को निकाल कर इनकी गुठलियों को बाहर कर देना चाहिये । फिर कुचल कर कूर्चनों से इनके रेशे बाहर कर लेने चाहियें । ✤ रेशे निकल जाने पर हरड़ और आंवले की पिठ्ठी को क्वाथ में डाल देना चाहिये । साथ में निम्न वस्तुओं का चूर्ण भी क्वाथ में मिला देना चाहिये । यथा—मण्डूकपर्णी, पिप्पली, शखपुष्पी, प्लव ( केवटी मोथा ), मोथा, बायविडग, लालचन्दन, अगरु, मुलहठी, हल्दी, वच, कनक ( नाग केसर ), छोटी इलायची और दालचीनी, प्रत्येक चार पल, मिश्री १००० पल, तैल २ आढक, घी ३ ✤ ( १ ) आवल और हरड़ के रेशे निकालने के लिये कूर्चनों का उपयोग करते हैं । एक लकड़ी में तीन चार सूइया लगी रहती हैं। उन को इन पर फेरने से रेशे इन में फस जाते हैं। हरड़ और आवले मे सूत होते हैं, इसलिये लकड़ी के कूर्चनो का उपयोग करना चाहिये ' अथवा हरड़ और आंवले को कपड़े में मथ कर निकालना चाहिये । इससे रेशे ऊपर रह जाते हैं ।