चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१६ ~ ~ ~ ~ ~ ~ निखातस्य स्नेहभावितस्य दृढस्योपरि कुम्भस्याऽऽश्लेषोडुपेनापिधाय कृष्णमृत्तिकावलिप्त गोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तेषा यः स्वरसः कुम्भ प्रपद्येत तमष्टभाग-मधु संप्रयुक्तं द्विगुणघृतमद्यात् । तत्प्रयोगाद्वर्षशतम- जरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १४ ॥ इति भल्लातकक्षौद्रम् । भल्लातक क्षौद्र—भिलावो को कुचल कर पिष्ट स्वेद विधि से (पेदी में छिद्र किये हुए ) घड़े में रखे । एक दूसरे घड़े में घी का लेप करके इस घड़े को गले तक मिट्टी मे गाड़ दे । इस बड़े के मुख पर भिलावेवाला घड़ा रख कर इसका मुख ढक्कन से बन्द कर दे । इनकी सन्धियों को काली मिट्टी से बन्द कर दे । अब ऊपर के घड़े के चारों ओर उपले बिन कर आग लगावे । आग की आच से तैल निचले घड़े मे आयेगा । इस तेल में आठवा भाग मधु और दुगना घी मिलाकर खावे । [ मात्रा आधा बूंद से २ बूंद तक ] । इसके प्रयोग से एक सौ बरस की बुढ़ापे से रहित परम आयु होती है । शेष गुण पूर्वोक्त रसायनों के समान है ॥ १४ ॥ भल्लातकतैलपात्र सपयस्कं मधुकेन कल्केनाक्षमात्रेण शतपाकं कुर्यात् । समानं पूर्वेण । १५ ॥ इति भल्लातकतैलम् । भल्लातक तैल—पूर्वोक्त विधि से तैयार किया भल्लातक तैल दो आढक, दूध आठ आढक और मुलहठी का कल्क १ अक्ष ( २ तोला ) इनसे यथा- विधि पाक करे । इस प्रकार मे एक सौ बार पाक करके तैल सिद्ध करे । उसका सेवन पूर्व के तुल्य ही करे । इसके गुण भी पूर्व की भाति ही समझें ॥१५॥ भल्लातकक्षीर भल्लातकक्षोद्र भल्लातकतैलमेव गुडभल्लातकं भल्लातक- यूषो भल्लातक-सर्पि-र्भल्लातक-पललं भल्लातकसक्तवो भल्लातकळवणं भल्ला- तकतर्पणमिति भल्लातकविधानमुक्तम् ॥१६॥ इति भल्लातकविधिः । भल्लातक विधान—भल्लातक क्षीर, भल्लातक क्षोद्र, भल्लातक तैल के समान भल्लातक घी, भल्लातक गुड़ ( भिलावे का गुड़ के साथ ), भल्लातक यूष (भल्ला- तक क्षीर के समान ), भल्लातक तेल, भल्लातक पलल ( भिलावे का तिल कल्क के साथ ), भल्लातकसक्तु ( भिलावे का जौ के सत्तु के साथ ), भल्लातक लवण ( भिलावे का सेन्धा नमक के साथ ), भल्लातक तर्पण (भिलावे का लाजा के सत्तूओं के साथ सेवन ) होता है, ये भल्लातक विधान भी पूर्व के तुल्य ही जानने चाहिये ॥ १६ ॥ [ अष्टाग-सग्रह में भल्लातकप्राश घृत का भी प्रयोग लिखा है—पुष्ट, परि- पक्क आढक भर भल्लातक लेकर उनको ईंट के चूर्ण से रगड़ कर जल से धोकर