चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० चरकसंहिता [ अ० १ वायु से सुखा कर कूट कर, एक जल के घड़े में पकावे, एक चौथाई बचे तो उसे छान कर ठण्डा करले, फिर उसको दूध के घड़े में पकावे, एक चतुर्थांश बचे तो बराबर मात्रा घी की लेकर उसमें मिला कर धान्य के ढेर में सात दिन तक रखे। इस प्रकार 'अमृतरसपाक' बनता है, उसका सेवन करे और पचने के उपरान्त यथेष्ट जल, दूध या रस का सेवन करे। इससे स्मृति, मति, बल, मेधा, सत्त्व और सार इनसे सम्पन्न होकर सोने के समान उज्ज्वल गौर शरीर होकर दीर्घ आयु का भोग करता है । ] भवन्ति चात्र—भल्लातकानि तीक्ष्णानि पाकीून्यग्निसमानि च । भवन्त्यमृतकल्पानि प्रयुक्तानि यथाविधि ॥ १७ ॥ एते दशविधास्तेषां प्रयोगा. परिकीर्तिताः । रोगप्रकृतिसात्म्यज्ञास्तान् प्रयोगान् प्रकल्पयेत् ॥१८॥ कफजो न स रोगोऽस्ति न विबन्धोऽस्ति कश्चन । यं न भल्लातकं हन्याच्छीघ्रं मेधाग्निवर्धनम् ॥ १६ ॥ प्राणकामाः पुरा जीर्णाश्च्यवनाद्या महर्षयः । रसायनैः शिवैरेतैर्बभूवुरमितायुषः ॥ २० ॥ ज्ञानं १ तपो ब्रह्मचर्यमध्यात्मध्यानमेव च । दीर्घायुषो यथाकामं संभृत्य त्रिदिवं गताः ॥ २१ ॥ तस्मादायुःप्रकर्षार्थं प्राणकामैः सुखार्थिभिः । रसायनविधिः सेव्यो विधिवत्सुसमाहितैः ॥ २२॥ भिलावे अग्नि के समान तीक्ष्ण और पकानेवाले ( पाक रोग उत्पन्न करने वाले) होते हैं। परन्तु यदि इनका विधिपूर्वक प्रयोग किया जाये तो अमृत के समान होते हैं। यहाँ पर भिलावे के दस प्रयोगों का वर्णन कर दिया है। रोग और प्रकृति की और सात्म्य की विवेचना करके इनका प्रयोग करे। ऐसा कोई भी कफजन्य रोग नहीं है और नाहीं कोई ऐसी स्रोतो की रुकावट है, जिसको कि भिलावा दूर न कर सके। यह शीघ्र ही मेधा तथा अग्नि को बढ़ाता है। [भल्लातक के प्रयोग में अपथ्य कुल्थी, दधि, शुक्त (आचार आदि ), तैल का देह मे लगाना, अग्नि का सेवन और गरम पानी इनका त्याग करना चाहिये।] पुरातन काल मे प्राणों की कामना करनेवाले वृद्ध च्यवन आदि महर्षियों ने इन्हीं कल्याणकारी रसायनों के सेवन से अपरिमित आयु प्राप्त की थी । १ 'ब्राह्म' इति च पाठ ।