भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २५७ मिलाकर प्रातःकाल भोजन से पूर्व तथा पीछे तीन समय खाना चाहिये। इस प्रकार करने से कास, क्षय, श्वास, शोष, जिसकी, गले की बिमारिया, अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डु, विषम ज्वर, स्वरभंग, पीनस, शोफ, गुल्म और वात, कफजन्य रोग नष्ट होते हैं। [ पिप्पली प्रयोग में पाच से कम पिप्पली का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार कफ की मात्रा अत्यधिक बढ़े होने पर प्रातः, मध्यावस्था में होने पर भोजन से पूर्व और कम होने पर भोजन के अन्त में देनी चाहिये । पिप्पली के अति सेवन से उत्पन्न दोष अन्य वस्तुओं के साथ सम्मिलित होने से उत्पन्न नहीं होते । भावना १ देते समय कम से कम सात भावना देनी चाहियें ।]॥३३-३५॥ क्रमवृद्ध्या दशाहानि दशपैप्पलिकं दिनम् । वर्धयेत्पयसा सार्धं तथा चापनयेत्पुनः ॥ ३६ ॥ जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा । पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनम् ॥ ३७ ॥ पिष्टास्ता बलिभिः सेव्याः शृता मध्यबलैर्नरैः । शीतकृता ह्रस्वबलैर्योज्या दोषामयान् प्रति ॥ ३८ ॥ दशपैप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्तितः । प्रयोगो यस्त्रिपर्यन्तः स कनीयान् स चाबलैः ॥ ३६ ॥ बृंहणं स्वर्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम् । वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीना रसायनम् ॥ ४० ॥ इति पिप्पलीवर्धमानं रसायनम् । पिप्पली वर्धमान—एक दिन में दस पिप्पलियो का दूध के साथ सेवन करे । दूसरे दिन बीस का, और तीसरे दिन तीस का । इस प्रकार से प्रत्येक दिन दस दिनों तक दस दस पिपलिया बढ़ाता जावे । साथ में दूध की मात्रा भी बढ़ाता जाय [ पिप्पली-वर्धमान के प्रयोग में दूध की मात्रा एक प्रकुञ्च (पल) से आरम्भ करके प्रतिदिन एक एक प्रकुञ्च बढानी चाहिये, फिर घटाने के साथ घटा देना चाहिये । ] दस दिन के पीछे ग्यारहवें दिन दस पिप्पली कम करे इस प्रकार से बीसवें दिन फिर दस पर ही आजावे । दूध की मात्रा भी कम १ भावना विधि—दिवा दिवाऽऽतपे शुष्कं रात्रौ रात्रौ निवासयेत् । श्लक्ष्णचूर्णं कृत द्रव्य सप्ताह भावनाविधिः ॥ दिन में धूप में सूखे रात्रि में खुले आकाश के नीचे रहे ।