भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 242

२२८ चरकसंहिता [ अ० १ करे। पिप्पली के जीर्ण होने पर साठी भात दूध और घी के साथ खावे। दोष और रोगों को देख कर बलवान् पुरुष पीसकर, मध्यम बलवाला क्वाथ बना कर और ह्रस्व बलवाला शीत कषाय करके प्रयोग करे। दस पिप्पली के प्रयोग को श्रेष्ठ, छः पिप्पली के प्रयोग को मध्यम और तीन पिप्पली के प्रयोग को अवर कहते हैं। पिप्पली-रसायन पुष्टिकारक, स्वरवर्धक, आयुष्य, प्लीहा, उदर रोग का नाशक, आयु को स्थिर रखने वाली और बुद्धिवर्धक है ॥ ३६-४० ॥ [ गंगाधर कविराज ने छः पिप्पली तथा तीन पिप्पली का प्रयोग भी एक हजार तक लेजाने को कहा है। यथा- प्रथम दिन दस पिप्पली लेवे। दूसरे दिन बारह, इस प्रकार से तेरह दिन तक बढ़ाता जाये और फिर चौदहवें दिन से छः छः कम करना आरम्भ करे। इस प्रकार से १०२४ पिप्पली का प्रयोग करे। तीन पिप्पली के प्रयोग में अठारह दिन तक क्रमशः तीन तीन बढ़ाते जावें। उन्नीसवें दिन तीन घटा देवें। इस प्रकार से १०२८ पिप्पली का प्रयोग करें। दस पिप्पली का प्रयोग श्लैष्मिक रोगी के लिये, छः का वातिक और तीन का पैत्तिक रोगी के लिये है। सुश्रुत के मत से पिप्पलियो को दूध में पीस कर पांच, सात वा दस की वृद्धि से पान करे। दस दिन तक दूध भात खावे। दस दिन के बाद फिर घटावे और घटाते २ पाच, सात और दस तक आजावे।]॥३६-४०॥ जरणान्तेऽभयामेकां प्राग्भुक्ते द्वे बिभीतके। भुक्त्वा तु मधुसर्पिर्भ्यांश्चत्वार्यामलकानि च ॥ ४१ ॥ प्रयोजयेत्समामेकां त्रिफलाया रसायनम् । जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽव्याधिरेव च ॥ ४२ ॥ इति त्रिफलानां रसायनम्। त्रिफला रसायन-पूर्व किये भोजन के जीर्ण होने पर एक हरड़ प्रातःकाल, भोजन से पूर्व दो बहेड़ा और भोजन के पश्चात् चार आँवले मधु और घी के साथ खावे [इन द्रव्यों को कूटकर मधु और घी के साथ खाना चाहिये]। इस रसायन का एक वर्ष तक प्रयोग करने से सौ बरस तक बुढ़ापा और रोगों से मुक्त होकर जीता है ॥ ४१-४२ ॥ त्रैफलेनायसीं पात्रीं कल्केनालेपयेन्नवाम् । तमहोरात्रिकं लेपं पिबेत्क्षौद्रोदकाप्लुतम् ॥ ४३ ॥ प्रभूतस्नेहमशनं जीर्णे तत्र प्रशस्यते । अजरोऽरुक् समाभ्यासाज्जीवेच्चैव समाः शतम् ॥ ४४ ॥ इति त्रिफलारसायनमपरम् ।