चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२६
त्रिफला रसायन—लोहे के नये घड़े में त्रिफला को पीसकर लेप कर देना
चाहिये । चौबीस घण्टे तक इसको लगा रहने देना चाहिये । फिर शहद के
पानी में बने घोल में मिलाकर पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने पर बहुत सा
स्नेह ( घी ) पान करना चाहिये । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर जरा
और रोगों से मुक्त होकर सौ बरस तक जाता है ॥ ४३-४४ ॥
मधुकेन तुगाक्षीर्या पिप्पल्या क्षौद्रसर्पिषा ।
त्रिफला सितया चापि युक्ता सिद्धं रसायनम् ॥ ४५ ॥
इति त्रिफलारसायनमरम् ।
त्रिफला रसायन --त्रिफला के साथ तुगाक्षीरी ( वंशलोचन ) मुलहठी,
पिप्पली, घी, मधु और शर्करा इन सबको एकत्र करके सेवन करे । यह एक
सिद्ध रसायन है १ ॥ ४५ ॥
सर्वलोहैः सुवर्णेन वचया मधुसर्पिषा ।
विडङ्गपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च ॥ ४६ ॥
संवत्सरप्रयोगेण मेधास्मृतिबलप्रदा ।
भवत्यायुष्प्रदा धन्या जरारोगनिबर्हणी ॥ ४७ ॥
इति त्रिफलारसायनमपरम् ।
त्रिफला रसायन—त्रिफला को सब धातुओं की भस्म ( स्वर्ण, रजत, ताम्र,
वंग, सीसक, लोह, यशद ), स्वर्ण, वच, घी, शहद, वायविडंग, पिप्पली और
सैन्धा नमक के साथ प्रयोग करे । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर मेधा,
स्मृति, बल, आयु बढ़ती है, यह रसायन धन्य है तथा जरा और रोग को नष्ट
करती है । [ यद्यपि सब धातुओं में स्वर्ण आ जाता है, तथापि पृथक् ग्रहण
करने से पृथक् एक अंश और डालना चाहिये २ ] ॥ ४७ ॥
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१ कोई कोई आचार्य इनको छः योग मानते हैं । परन्तु यह मानने से
संख्या बढ़ जाती है ।
२ सप्त धातु—स्वर्णतारारताम्राणि नागवंगौ च तीक्ष्णकम् ।
धातवः सप्त विज्ञया अष्टमः क्वापि पारदः ॥
स्वर्णे तार च ताम्र च वङ्गो नागस्तु पञ्चमः ।
रीतिका च तथा घोषो लोहं चेत्यष्टधातवः ॥
कविराज श्री गंगाधर सेन ने इनको भी पृथक् पृथक योग माना है । ऐसा
मानने से संख्या बढ़ जाती है ।