भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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१२ चरकसंहिता [ अ० १ वह अनित्य है। १'कोई वस्तु उत्पत्ति कारण वाली होने से नित्य नहीं हो सकती। जो वस्तु कारणजन्य है, वह वस्तु किसी भी प्रकार से नित्य नही हो सकती। क्योंकि उसकी उत्पत्ति हुई है। कारणवान् होने से अनित्य है। इस- लिये यह नित्य-अव्यक्त है, ग्रहण न होने से अव्यक्त है, अचिन्त्य है। इससे विपरीत व्यक्त और अनित्य है ॥ ५६-६० ॥ अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः । तस्माद्यदन्यत्तद् व्यक्तं, वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ ६१ ॥ व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः । अतोऽन्यत्पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ ६२ ॥ आत्मा को अव्यक्त शब्द से कहा जाता है। इसी आत्मा को क्षेत्रज्ञ, शाश्वत, विभु और अव्यय कहते है। आत्मा से पृथक् जो कुछ है वह सब व्यक्त है। अन्य प्रकार मे भी व्यक्त-अव्यक्त कहे जाते ह। जो ऐन्द्रियक अर्थात् इन्द्रियों मे उपलब्ध होता है वह सब व्यक्त है। जो इन्द्रिय से ग्रहण नहीं होता वह अतीन्द्रिय और अव्यक्त है। लक्षणों से इस अव्यक्त का अनुमान होता है ॥६२॥ खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहङ्कारस्तथाऽष्टमः । भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा— पाच सूक्ष्म भूत, पंच तन्मात्रा (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी), बुद्धि और महान् (अव्यक्त) ये सात अव्यक्त मूल प्रकृति तथा अहङ्कार यह आठ भूत-प्रकृति कही हैं ॥ विकाराश्चैव षोडश ॥ ६३ ॥ बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च । समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति सञ्ज्ञिताः । ६४ ॥ इनके सोलह विकार हैं। पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच कर्मेन्द्रिय ओर मन के साथ पाच अर्थ (विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) ये १६ विकार कहे हैं ॥ ६३-६४ ॥ इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम् । इन चौबीस तत्त्वो में अव्यक्त (मैलित प्रकृति और पुरुष) को छोड़ कर शेष तेईस तत्त्वों को क्षेत्र (शरीर) कहा जाता है। अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ ६५ ॥ ऋषि लोग अव्यक्त को इस क्षेत्र का जानने वाला 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं ॥६५॥ १ 'सदकारणवन्नित्यम्' वै० द० ४।१।१।