चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] शारीरस्थानम् १३ जायते बुद्धिरव्यक्ताद्बुद्ध्याऽहमिति मन्यते । परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥ ततः सम्पूर्णसर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते । पुरुषः प्रलये चेष्टैः पुनर्भावैर्वियुज्यते ॥ ६७ ॥ अव्यक्त ( मूल प्रकृति से मिले हुए पुरुष ) से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है । बुद्धि से 'मै' ऐसा अभिमान करता है । अर्थात् बुद्धि से अहङ्कार उत्पन्न होता है । इसके पश्चात् अहङ्कार से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पांच सूक्ष्म भूत ( तन्मात्रा ) उत्पन्न होते हैं १ । इन पञ्च तन्मात्राओ से पञ्च महाभूत, इन भूतों से इन्द्रिया उत्पन्न होती हैं । इन पाच भूतों से सम्पूर्ण अगों वाला पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था मे उत्पन्न होता है । अब इसको उत्पन्न हो गया वा 'अभ्युदित' ऐसा कहते है और फिर यह पुरुष प्रलय में ( शरीराम्भक भूतों के कारण में लय होने पर ) बुद्धि आदि इष्ट भावों ( कार्य पदार्थों ) से पृथक् हो जाता है, यही मृत्यु है । अव्यक्त कारण से व्यक्त होना 'जन्म' कहाता है । व्यक्त का कारण में लीन होना 'मृत्यु' है ॥६६-६७॥ अव्यक्ताद् व्यक्ततां याति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः । रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ॥ ६८ ॥ पुरुष रज और तम के कारणों से बधा हुआ अव्यक्त ( कारण ) से व्यक्त रूप में आता है, यही 'जन्म' है । व्यक्त अवस्था से फिर अव्यक्त अवस्था ( कारण ) में लीन हो जाता है । यही 'मरण' है । वह फिर व्यक्त होता है । फिर अव्यक्त होता है, इस प्रकार चक्र के भाति जब तक मोक्ष नहीं होता, घूमता रहता है २ ॥ ६८ ॥ येषां द्वन्द्वे पराऽऽसक्तिरहङ्कारपराश्च ये । उदयप्रलयौ तेषां, न तेषां ये त्वतोऽन्यथा ॥ ६९ ॥ जिन पुरुषों की रज और तम के जोड़े मे अत्यन्त आसक्ति है और जो 'मै और यह मेरा है' ऐसा मिथ्या अभिमान रखते है, उनका ही उदय और प्रलय अर्थात् जन्म और मरण होता है, और जो रज और तम से पृथक् और निरहङ्कार हैं उनका जन्म और मरण नहीं होता ॥ ६९ ॥ १ तन्मात्रा का अर्थ अकेला वही तत्त्व, उसमे और किसी भूत का ससर्ग नहीं-जैसे-शब्दतन्मात्र, रूपतन्मात्र आदि । २ अव्यक्तादीनि भूतानि, व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ गीता० अ० २।२८