चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२८२ चरकसंहिता [ अ० ३ होने से ) शीघ्र शान्त हो जाता है, अथवा रोगी को मार देता है । सन्तत ज्वर के दुःसह होने का कारण—काल, दूष्य (रस आदि धातु) और प्रकृति के वातादि दोषों के तुल्य होने से सन्तत ज्वर कष्टसाध्य होता है । सन्तत ज्वर में वात आदि दोष जिस प्रकार से रस आदि धातुओं में पहुँचते हैं, उसी प्रकार से युगपत् रूप में मूत्र तथा मल में भी पहुचते हैं। यह सन्तत ज्वर रस आदियो के सर्वथा शुद्ध होने पर या अशुद्धावस्था में सप्ताह आदि काल के अन्दर या तो स्वय शान्त हो जाता है, अथवा मार देता है। जिस समय सन्तत ज्वर के बाहर आश्रय (तीन दोष, सात धातु और मल तथा मूत्र ) अत्यन्त शुद्ध नही होते अथवा कुछ शुद्ध हो जाते हैं और कुछ अशुद्ध रहते हैं, तब बारहवें दिन अस्पष्ट लक्षणों से ज्वर उतर जाता है, परन्तु कष्टसाध्य होकर दीर्घ काल तक चलता रहता है । सन्तत ज्वर को इस प्रकार से समझ कर चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये । चिकित्सा में भी प्रथम अपतर्पण (लङ्घन) आरम्भ करना चाहिये ॥ ५७-६१ ॥ रक्तधात्वाश्रय प्रायो दोषः सततक ज्वरम् । सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ॥ ६२ ॥ अहोरात्र सततको द्वौ कालावर्तते । विरोधी दोष प्रायः करके रक्त-धातु में आश्रित होकर काल में बढ़ने वाले और काल में घटने वाले (क्षीण होने वाले ) सतत ज्वर को उत्पन्न करते हैं। यह ज्वर समय पर बढ़ता है और समय पर घटता है । काल प्रकृति और दूष्य इनमे से किसी एक का बल प्राप्त करक सतत ज्वर दिन रात में (२४ घण्टे में) दो बार आता है ॥ ६२-॥ कालप्रकृतिदूष्याणां प्राप्यवान्यतमद्बलम् ॥ ६३ ॥ दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडीरन्येद्युक ज्वरम् । सप्रत्यनीकः कुरुते एककालमहर्निशं ॥ ६४ ॥ दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थ कौ । काल प्रकृति और दूष्य इनमें से किसी एक के विरोधी होने पर दोष मेदोवहा नाड़ियों को रोक कर अन्येद्युष्क ज्वर को उत्पन्न करते हैं। यह दिन रात में एक बार आता है। अस्थि और मज्जा मे दोष पहुच कर तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ॥ ६३-६४-॥ गतिद्वये॑कान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः ॥ ६५ ॥ रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युक ज्वरम् । मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् ॥ ६६ ॥