चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 297, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३ ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदो मार्गं चतुर्थकम् । अन्येद्युष्कः प्रतिदिनं दिनं क्षिप्त्वा तृतीयकः ॥ ६७ ॥ दिनद्वयं यो विश्राम्य प्रत्येति स चतुर्थकः । अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति ॥ ६८ ॥ अधिशेते तथा धातु दोषः काले च कुप्यति । स वृद्धि बलकाल च प्राप्य दोषस्तृतीयकम् ॥ ६९ ॥ चतुर्थकं च कुरुते प्रत्यनीकबलक्षयात । कृत्वा वेगं गतबलाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ॥ ७० ॥ पुनर्विवृद्धाः काले ज्वरयन्ति नर मलाः । दोषों की गति—प्रति दिन, एक दिन के अन्तर से और दो दिन के अन्तर से कही गई है । जब प्रति दिन ज्वर आता है उसे अन्येद्युष्क कहते है, एक दिन के अन्तर से आवे तो 'तृतीयक' और दो दिन अंतर से आवे ता 'चतुर्थक' कहते हैं । अन्येद्युष्क ज्वर प्रति दिन लौट कर आता है, तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़ कर आता है, चतुर्थक ज्वर दो दिन पीछे लौट कर आता है । जिस प्रकार कि बीज भूमि में पड़ा रहता है और अपने समय पर उगता है, इसी प्रकार से वातादि दोष रस, रक्तादि धातुओं में पड़े रहते हैं और समय पाकर प्रकुपित होते हैं । दोष, बल और काल की सहायता पाकर विरोधी बल के क्षीण होने पर तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ज्वर वेग को उत्पन्न करके निर्बल हुए दोष अपने अपने स्थानों में पहुच जाते हैं । अपने अनुकूल परिस्थिति ( काल ) में ज्वर को पुन: उत्पन्न कर देते हैं ॥ ६५-७०- ॥ कफपित्तात् त्रिकग्राही पृष्ठाद् वातकफात्मकः ॥ ७१ ॥ वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः । तृतीयक ज्वर तीन प्रकार का है । जिस तृतीयक ज्वर मे प्रथम त्रिक स्थान ( कूल्हे ) में वेदना होती है, वह कफ-पित्त के कारण होता है । जिस तृतीयक ज्वर में पीठ में वेदना प्रथम होती है वह वात-कफजन्य है । जिस तृतीयक ज्वर मे शिर में वेदना प्रथम होती है, वह वात-पित्तजन्य है । इस प्रकार से यह तृतीयक ज्वर तीन प्रकार है ॥ ७१- ॥ चतुर्थको दर्शयति प्रभावं विविध ज्वरः ॥ ७२ ॥ जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्व शिरस्तोऽनिलसंभवः । विषमज्वर एवान्यश्चतुर्थकविपर्ययः ॥ ७३ ॥ त्रिविधो धातुरेकैको द्विधातुस्थः करोत्ययम् !