चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८४ चरकसंहिता [ अ० ३ चतुर्थक ज्वर दो प्रकार से अपना प्रभाव दिखाता है, अतः वह दो प्रकार का है। जिस ज्वर में आक्रमण जंघाओं की ओर से या पाव से होता है वह कफजन्य है और जिसमें शिर पर सबसे प्रथम आक्रमण होता है वह वायुजन्य है। ^१चातुर्थक ज्वर का ही एक विपर्यय (भेद) विषम ज्वर है। यह तीन धातु-वात, पित्त, कफ में से किसी एक धातु के दो धातुओं में स्थिति होने से होता है। इस ज्वर मे एक दिन आक्रमण नहीं होता, फिर अगले दो दिन होता है और फिर एक दिन नहीं होता ॥ ७२-७३- ॥ प्रायशः संनिपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः ॥ ७४ ॥ सन्निपाते तु यो भूयान् स दोषः परकीर्तितः । प्रायः करके ( कहीं कहीं अपवाद भी होता है), सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक, चतुर्थक और सनिपात (त्रिदोष) से उत्पन्न यह पाच प्रकार का ज्वर होता है। संनिपात के समय जो भी दोष प्रबल होता है, उसी के नाम से उस ज्वर को कहते हैं दूसरे दोषों का भी अनुबन्ध थोड़ा बहुत रहता है ॥७४-॥ ऋत्वहोरात्रदोषाणां मनसश्च बलाबलात् ॥ ७५ ॥ कालमर्थवशाच्चैव ज्वरस्तं तं प्रपद्यते । ऋतु, दिन, रात, दोष और मन के बल-अबल के कारण तथा अर्थवश (प्राक्तन कर्म) के कारण उस उस समय में ज्वर होता है। [जैसे-ऋतु के बलाबल से वर्षाकाल से वर्षाकाल में उत्पन्न वातप्रधान सतत ज्वर विरोधी शरद् ऋतु में अन्येद्युष्क रूप में आ जाता है। अहोरात्र वसन्त काल के मध्य दिवसों मे उत्पन्न वातिक चतुर्थक ज्वर पिछले दिनों में बलवान् होकर तृतीयक हो जाता है। मन के बल से ज्वर अन्य रूप में आ जाता है। कहा भी है “विषाद का करना भी रोग को बढ़ाने वाला है”।] ॥ ७५ ॥ गुरुत्वं^२ दैन्यमुद्वेगः सदनं छर्द्यरोचकौ ॥ ७६ ॥ रसस्थिते बहिस्तापः साङ्गमर्दो विजृम्भणम् । रक्तोत्था^३ पिडकास्तृष्णा सरक्तं ष्ठीवनं मुहुः ॥ ७७ ॥ दाहरागभ्रम^४ मदाः प्रलापो रक्तसंस्थिते । अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा ग्लानिः संसृष्टविट्कता^५ ॥ ७८ ॥ १. हारीत संहिता में पित्तजन्य चतुर्थक ज्वर भी माना है। २. ‘शैत्यमु’ इति च पाठः । ३ 'रक्तोष्ठः' इति च पाठः । ४ 'श्रम' इति पाठ. । ५. 'अन्त- र्दाहः सतृण्मोहः सग्लानिः सृष्टविट्कता' इति वा पाठ. ।