भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८५ दौर्गन्ध्य गात्रविक्षेपो१ ज्वरे मांसस्थिते भवेत् । स्वेदस्तीव्रा पिपासा च प्रलापो वम्य२ भीक्ष्णशः ॥ ७६ ॥ स्वगन्धस्यासहत्वं च मेदःस्थे ग्लान्यरोचकौ । विरेकवमने चोभे सास्थिभेद३ प्रकूजनम्४ ॥ ८० ॥ विक्षेपणं च गात्राणा श्वासश्चास्थिगते ज्वरे । हिक्का५ श्वासस्तथा कासस्तमश्चातिदर्शनम् ॥ ८१ ॥ मर्मच्छेदो बहिः शैत्य दाहोऽन्तश्चैव मज्जगे । शुक्रस्थानगते शुक्रमोक्ष कृत्वा विनाशय च ॥ ८२ ॥ प्राणवात्वग्निसोमैश्च सार्धं गच्छत्यसो विभुः । रसरक्ताश्रितः साध्यो मेदोमासगतश्च यः ॥ ८३ ॥ अस्थिमज्जगत कृच्छ्रः शुक्रस्थो नैव सिध्यति । सातो धातुओ मे आश्रित ज्वर के लक्षण—(१) रस मे ज्वर के आश्रित होने पर भारीपन, दीनता, बेचैनी, शिथिलता, वमन, अरुचि, बाहर ताप, अंगों में पीड़ा और जमाई आती है । (२) रक्त-धातु में आश्रित होने पर रक्तजन्य पिड़काये, प्यास, रक्त मिश्रित थूक का बार बार आना, दाह, राग (लालिमा) चक्कर आना, मद, (मूर्च्छा) और प्रलाप होता है । (३) मास में आश्रित होने पर शरीर के अन्तर जलन, प्यास, ग्लानि, अतिसार, दुर्गन्ध, हाथ पाव का फेकना होता है । (४) मेद में आश्रित हाने पर बहुत पसीना आना, प्यास, प्रलाप, बार बार वमन, अपने ही शरीर की गन्ध का सहन न होना, ग्लानि और अरुचि होती है । (५) अस्थिगत ज्वर में अतीसार, वमन, अस्थियों में पीड़ा, कराहना, हाथ पाव का फेंकना, ज़ोर या तेज़ी से श्वास का चलना होता है । (६) मज्जा धातु में ज्वर के आश्रित होने पर हिचकी, श्वास, कास आँखों के सामने अन्धकार का दिखाई देना, मर्मान्तक पीड़ा, शरीर का ऊपर से ठण्डा परन्तु अन्दर जलन होता है । (७) शुक्र (वीर्य) में आश्रित होने पर शुक्र का स्राव होता है, इस अवस्था में विभु (आत्मा), प्राण, वायु, अग्नि और सोम के साथ चला जाता है, रोगी मर जाता है । इनमे से रस, रक्त, मास और मेद में आश्रित ज्वर साध्य है, अस्थि और मज्जा में आश्रित ज्वर कष्टसाध्य है, शुक्रस्थ ज्वर असाध्य है ॥ ७६-८३ ॥ १. 'ऊष्मान्तर्दाहविक्षेपौ' इति च । २. 'ऽरत्यभी' इति च । ३ 'सास्थि- मेदान्तृक्' इति च । ४. 'कुञ्जनम्' इति च । ५. 'मेह.' इति च पाठः ।