चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ चरकसंहिता [ अ० ३ हेतुभिर्लक्षणैश्चोक्तः पूर्वमष्टविधो ज्वरः ॥ ८४ ॥ समासेनोपदिष्टस्य व्यासतः शृणु लक्षणम् । शिरोरुक् पर्वाणां भेदो दाहो रोम्णां प्रहर्षणम् ॥ ८५ ॥ कण्ठास्यशोषो वमथुस्तृष्णा मूर्च्छा भ्रमोऽरुचिः १ । स्वप्ननाशोऽतिवाग्जृम्भा वातपित्तज्वराकृतिः ॥ ८६ ॥ शीतको गौरव तन्द्रा स्तैमित्यं पर्वणा च रुक् । शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् ॥ ८७ ॥ संतापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृति । मुहुर्दाहो मुहुः शीतं स्वेदस्तम्भो मुहुर्मुहुः ॥ ८८ ॥ मोहः कासोऽरुचिस्तृष्णा श्लेष्मपित्तप्रवर्तनम् । लिप्ततिक्तास्यता तन्द्रा श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ॥ ८९ ॥ इत्येते द्वन्द्वजाः प्रोक्ताः सन्निपातज उच्यते । प्रथम निदानस्थान में हेतु और लक्षणों सहित आठ प्रकार ज्वर कहा है । वहाँ पर संक्षेप मे कहा था, अब उसको विस्तार मे कहते हैं— ( १ ) वात पित्त ज्वर के लक्षण—सिर में दर्द, पोरुओं में फूटने की सी पीड़ा, जलन, लोमहर्ष, गले और मुख का शुष्क होना, वमन, पिपासा, मूर्च्छा, भ्रम, अरुचि, निद्रानाश, अधिक बोलना और जभाई का आना ये वातपित्त ज्वर के लक्षण हैं । [ यहाँ पर द्वन्द्वज ज्वरों के ही लक्षण कहे हैं । वात, पित्त, कफजन्य ज्वरों के लक्षणों को विस्तार से निदानस्थान में कह दिया है ] । ( २ ) वात कफ ज्वर के लक्षण—शीतक (शीत लगना या शीत पित्त), भारीपन, तन्द्रा, स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित के समान अनुभव), पोरुओं में दर्द, शिर का जकड़ा होना, प्रतिश्याय, कास पसीने का न आना, सन्ताप और ज्वर का मध्यम वेग होना ये वात कफ ज्वर के लक्षण हैं । ( ३ ) कफ-पित्त ज्वर के लक्षण—बार बार दाह (गरमी), बार बार शीत (सर्दी) लगना, बार बार पसीना आना वा न आना, मोह (मूर्च्छा), कास, अरुचि, प्यास, वमन या मल के द्वारा कफ और पित्त की प्रवृत्ति, मुख का कफ से भरा होना तथा कडुवा होना और तन्द्रा ये कफ-पित्त ज्वर के लक्षण हैं । अब सन्निपातजन्य ज्वरों को कहा जाता है ॥ ८४-८६ ॥ सन्निपातज्वरस्योर्ध्वं त्रयोदशविधस्य हि ॥ ६० ॥ प्राक्सूत्रितस्य वक्ष्यामि लक्षणं वै पृथक् पृथक् । १ 'ऽरति' इति च पाठः ।