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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

२८६ चरकसंहिता [ अ० ३ हेतुभिर्लक्षणैश्चोक्तः पूर्वमष्टविधो ज्वरः ॥ ८४ ॥ समासेनोपदिष्टस्य व्यासतः शृणु लक्षणम् । शिरोरुक् पर्वाणां भेदो दाहो रोम्णां प्रहर्षणम् ॥ ८५ ॥ कण्ठास्यशोषो वमथुस्तृष्णा मूर्च्छा भ्रमोऽरुचिः १ । स्वप्ननाशोऽतिवाग्जृम्भा वातपित्तज्वराकृतिः ॥ ८६ ॥ शीतको गौरव तन्द्रा स्तैमित्यं पर्वणा च रुक् । शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् ॥ ८७ ॥ संतापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृति । मुहुर्दाहो मुहुः शीतं स्वेदस्तम्भो मुहुर्मुहुः ॥ ८८ ॥ मोहः कासोऽरुचिस्तृष्णा श्लेष्मपित्तप्रवर्तनम् । लिप्ततिक्तास्यता तन्द्रा श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ॥ ८९ ॥ इत्येते द्वन्द्वजाः प्रोक्ताः सन्निपातज उच्यते । प्रथम निदानस्थान में हेतु और लक्षणों सहित आठ प्रकार ज्वर कहा है । वहाँ पर संक्षेप मे कहा था, अब उसको विस्तार मे कहते हैं— ( १ ) वात पित्त ज्वर के लक्षण—सिर में दर्द, पोरुओं में फूटने की सी पीड़ा, जलन, लोमहर्ष, गले और मुख का शुष्क होना, वमन, पिपासा, मूर्च्छा, भ्रम, अरुचि, निद्रानाश, अधिक बोलना और जभाई का आना ये वातपित्त ज्वर के लक्षण हैं । [ यहाँ पर द्वन्द्वज ज्वरों के ही लक्षण कहे हैं । वात, पित्त, कफजन्य ज्वरों के लक्षणों को विस्तार से निदानस्थान में कह दिया है ] । ( २ ) वात कफ ज्वर के लक्षण—शीतक (शीत लगना या शीत पित्त), भारीपन, तन्द्रा, स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित के समान अनुभव), पोरुओं में दर्द, शिर का जकड़ा होना, प्रतिश्याय, कास पसीने का न आना, सन्ताप और ज्वर का मध्यम वेग होना ये वात कफ ज्वर के लक्षण हैं । ( ३ ) कफ-पित्त ज्वर के लक्षण—बार बार दाह (गरमी), बार बार शीत (सर्दी) लगना, बार बार पसीना आना वा न आना, मोह (मूर्च्छा), कास, अरुचि, प्यास, वमन या मल के द्वारा कफ और पित्त की प्रवृत्ति, मुख का कफ से भरा होना तथा कडुवा होना और तन्द्रा ये कफ-पित्त ज्वर के लक्षण हैं । अब सन्निपातजन्य ज्वरों को कहा जाता है ॥ ८४-८६ ॥ सन्निपातज्वरस्योर्ध्वं त्रयोदशविधस्य हि ॥ ६० ॥ प्राक्सूत्रितस्य वक्ष्यामि लक्षणं वै पृथक् पृथक् । १ 'ऽरति' इति च पाठः ।

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २८७

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २८७ भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् ॥ ९१ ॥ वातपित्तोल्बणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे । शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासा दाहरुग्व्यथाः ॥ ९२ ॥ वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिङ्गं पित्तावरे विदुः । छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना ॥ ९३ ॥ मन्दवाते व्यवस्यन्ते लिङ्गं पित्तकफोल्बणे । सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः ॥ ९४ ॥ वातोल्बणे स्याद्द्व्यनुगे तृष्णा कण्ठास्यशोषता । रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृड्बलसंक्षयः ॥ ९५ ॥ मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्ते गरीयसि । आलस्यारुचिहृल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः ॥ ९६ ॥ कफोल्बणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् । प्रतिश्या छर्दिरालस्यं तन्द्राऽरुच्यग्निमार्दवम् ॥ ९७ ॥ हीनवाते पित्तमध्ये चिह्नं श्लेष्माधिके मतम् । हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाहस्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः ॥ ९८ ॥ हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके मतम् । शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापश्च्छर्द्यरोचकौ ॥ ९९ ॥ हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् । शीतको गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोतिरुक् ॥ १०० ॥ हीनपित्ते वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः । श्वासकासप्रतिश्याया मुखशोषोऽतिपार्श्वरुकू ॥ १०१ ॥ कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् । पर्वभेदोऽग्निमान्द्य च तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०२ ॥ कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके विदुः । प्रथम सूत्ररूप में कहे तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर के लक्षण पृथक् पृथक् कहूँगा। (१) वात-पित्त प्रधान और मन्दकफ ज्वर के लक्षण—भ्रम, प्यास, दाह, भारीपन, शिर में अधिक वेदना होती है । ( २ ) वात-कफ प्रधान और हीनपित्त ज्वर में—शीत लगना, खासी, अरुचि, तन्द्रा, प्यास, दाह, पीड़ा, व्यथा होती, १. 'वमिदाहतृषाभ्रमैः' इति च पाठः । २. 'ऽग्निदौर्बल्यं' इति च पाठः ।

२८८ चरकसंहिता [अ० ३ है। (३) पित्त कफ प्रधान हीनवात ज्वर में—वमन, शीत लगना, बार बार दाह, प्यास, मूर्च्छा, अस्थियों में वेदना होती है। (४) वातप्रधान, हीनपित्त- कफ ज्वर में—सन्धियों में तथा अस्थियों में और शिर में वेदना, प्रलाप, भारी होना, भ्रम, प्यास, कण्ठ और मुख का सूखना होता है। (५) पित्तप्रधान हीन कफ-वात ज्वर मे--मल और मूत्र में रक्तिमा (रक्त का सा लाल वर्ण ), जलन, पसीना, प्यास, निर्बलता, मूर्च्छा होती है। (६) कफ प्रधान हीन पित्तवात में— आलस्य, अरुचि, हृल्लास (जी मचलाना), जलन, वमन, बेचैनी, चक्कर आना, तन्द्रा और कास होता है। (७) कफप्रधान पित्त मध्य, वात हीन सन्निपात मे— प्रतिश्याय, वमन, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि मन्दाग्नि होती है। (८) पित्तप्रधान, मध्य कफ और हीन वात में—मूत्र और आख का हल्दी के समान पीला वर्ण, जलन, प्यास, भ्रम, अरुचि होती है। (६) वात प्रधान, मध्य कफ और हीन पित्त में—शिर में वेदना, कम्पन, श्वास का तेज चलना, प्रलाप, वमन और अरुचि होती है। (१०) कफप्रधान, वात मध्य और हीन पित्त में—शीत का लगना, भारीपन, तन्द्रा, प्रलाप, अस्थियों और शिर में अति वेदना होती है। (११) वात प्रधान, पित्त मध्य और कफ हीन सन्निपात मे—श्वास, कास, प्रतिश्याय, (जुकाम), मुख का सूखना और पसलियों में अति वेदना होती है। (१२) पित्त प्रधान, वात मध्य हीन कफ मे—जोड़ों में फूटन की सी पीड़ा, मन्दाग्नि, प्यास, दाह, अरुचि और चक्कर आता है। [ भालूकि तंत्र से सन्नि- पात ज्वरों के लक्षण तथा नाम भिन्न २ दिये हैं। जैसे—वात पित्ताधिक सन्नि- पात 'विभु' पित्त श्लेष्माधिक सन्निपात फल्गु, कफवाताधिक सन्निपात मकरी, वाताधिक सन्निपात 'विस्फारक', पित्ताधिक सन्निपात 'शीघ्रकारी और कफाधिक सन्निपात 'उल्बण' कहाता है । कुछ आचार्य इन लक्षण। क प्रकृतिसम अवाय के लक्षण होने से इस पाठ को अनाषे मानते हैं। अन्य स्थानों मे यह पाठ नहीं है ]॥ ६०-१०२॥ सन्निपातज्वरस्योर्ध्वमतो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १०३ ॥ क्षणे दाहः क्षणे शीत मस्थिसन्धिशिरोरुजा । सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ॥ १०४ ॥ सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शूकरिवावृत । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०५ ॥ परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ १०६ ॥

अ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम्‌ २८६

अ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम्‌ २८६ शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा। स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शनमल्पशः ॥ १०७॥ कृशत्वं नातिगात्राणां प्रततं कण्ठकूजनम्‌। कोठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम्‌ ॥ १०८ ॥ मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च। चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ॥ १०९॥ इसके आगे सन्निपात ज्वर के लक्षण कहते है। जैसे—( १३) क्षण मे दाह, क्षण मे शीत, अस्थि, सन्धि और शिर मे वेदना, नेत्रो से पानी आना, आखो का मैला या लाल वर्ण और कुटिल¹ होना, कानो मे आवाज होना, कानों मे पीडा होना, गला शूक (गेहूँ आदि की बाल) की भाति काटो से घिरा रहता है, तन्द्रा, मोह, प्रलाप, कास, श्वास, अरुचि, भ्रम, जिह्वा का जले हुए के समान काला, पीला, स्पर्श मे खुरदरा, शरीर का अति शिथिल होना, कफ मिश्रित रक्त पित्त का थूकना, शिर का लोठन (इधर उधर चलाना, हिलाना डुलाना), प्यास, निद्रा का न आना, हृदय मे तीव्र पीडा, पसीना मूत्र तथा मल का देर मे आना और थोडा आना (प्राय. अवरोध रहना), शरीर मे अधिक निर्बलता का न आना, निरन्तर गले से कराहने का स्वर, कोठ तथा श्याम-रक्त वर्ण के मण्डलो का देह पर दिखाई देना, मूकता, स्रोतो का (मुख आदि का) पक जाना, उदर का भारी प्रतीत होना तथा दोषो का देर मे परि- पक्व होना ये सन्निपात ज्वर के लक्षण² है ॥ १०४–१०६ ॥ १ निर्भुग्न का ‘कुटिल, विस्तारित तथा अन्दर को घुसा रहना’ यह अर्थ आचार्यों ने किया है। २ सुश्रुत मे अभिन्यास-ज्वर के लक्षण इस प्रकार दिये है। जैसे— नात्युष्णशीतोऽल्पसञ्ज्ञो भ्रान्तप्रेक्षी हतप्रभ । खरजिह्व शुष्ककण्ठ स्वेदविण्मूत्रवर्जित ॥ साश्रुनिर्भुग्ननयनो भक्तद्वेषी हतस्वरः। श्वसन्निपतित शेते प्रलापापद्रवान्वित ॥ अभिन्यास तु त प्राहुर्हंतौजसमथापरे। सन्निपातज्वर कृच्छ्रमसाध्यमथवा परे ॥ न बहुत उष्ण, न बहुत शीत, थोड़ी चेतना हो, भौंचका सा देखे, कान्ति नष्ट हो, जिह्वा खरदरी हो, गला सूखा, पसीना, पाखाना और मूत्र न होता हो, आँसू आवे, आँखे टेढी हों जांय, भाजन से द्वेष हो, स्वर मारा जाय, सांस

२६० चरकसंहिता [ अ० ३ दोषे विबद्धे नष्टेऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः । सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्त्वतोऽन्यथा ॥ ११०॥ सन्निपात ज्वर की साध्य-असाध्यता—यदि दोष (वातादि और मल) शरीर के अन्दर ही रुक जाये, अग्नि मन्द हो, सन्निपात ज्वर के सम्पूर्ण लक्षण दिखाई देते हो तो सन्निपात ज्वर असाध्य है । यदि सम्पूर्ण लक्षण दिखाई न दे, दोष बाहर आते हो, अग्नि भी प्रबल हो तो रोग कष्टसाध्य होता है ॥११०॥ निदाने त्रिविधा प्रोक्ता या पृथग्ज्वराकृतिः । संसर्गसन्निपाताना तथा चोक्तं स्वलक्षणम् ॥ १११ ॥ ज्वरनिदान-स्थान मे वर्णित पृथक् पृथक् दोषो से उत्पन्न होने वाले ज्वरो के तीन प्रकार के लक्षण, द्वन्द्वज ज्वरो तथा सन्निपातज ज्वरो के लक्षण मिला कर सात प्रकार के ज्वर कह दिये है ॥ १११ ॥ आगन्तुरष्टमो यस्तु स निर्दिष्टश्चतुर्विधः । अभिघाताभिषङ्गाभ्यामभिचाराभिशापतः ॥ ११२ ॥ आठवाँ आगन्तुज ज्वर चार प्रकार का है । जैसे—अभिघातजन्य, अभि- षग्जन्य, अभिचारजन्य और अभिशापजन्य ॥ ११२ ॥ शस्त्रलोष्टकशाकाष्ठमुष्ट्यरत्नितलद्विजैः । तद्विधैश्च हते गात्रे ज्वरः स्यादभिघातजः ॥ ११३ ॥ तत्राभिघातजे वायुः प्रायो रक्तं प्रदूषयन् । सव्यथाशोफवैवर्ण्यं करोति सरुजं ज्वरम् ॥ ११४ ॥ इनमे अभिघातजन्य ज्वर—शस्त्र, ढेला, कशा, लकडी, मुक्का, अरत्नि, हाथ पैर के तले, दाँत तथा अन्य इसी प्रकार के कारणो से देह या अगो पर चोट लगने से उत्पन्न होता है । अभिघातजन्य ज्वर मे प्रायः करके वायु रक्त को दूषित कर पीडा, सूजन, विवर्णता (रग परिवर्त्तन), वेदना तथा ज्वर उत्पन्न करता है ॥ ११३-११४ ॥ कामशोकभयक्रोधैरभिषक्तस्य यो ज्वरः । सोऽभिषङ्गज्वरो ज्ञेयो यश्च भूताभिषङ्गजः ॥ ११५ ॥ कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः । भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ ११६ ॥ भूताधिकारे व्याख्यातं तदष्टविधलक्षणम् । धौंकनी के तुल्य हो, गिर पडे, सो जाय, बके, उसे अभिन्यास ज्वर कहते है । यह सन्निपात-ज्वर असाध्य है ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१

अभिषङ्गजन्य ज्वर—काम शोक, भय क्रोध तथा भूतो के संसर्ग से
आक्रान्त होने पर जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसको अभिषङ्गज ज्वर कहते हैं।
काम शोक और भय से वायु, क्रोध से पित्त, और भूता के आक्रमण से तीनो
दोष कुपित होते है। भूतजन्य ज्वर मे भूता के सामान्य लक्षण रहते है। आठ
प्रकार के भूतो के लक्षण भूताधिकार (उन्माद चिकित्सा) मे कहेगे ॥११५-११६॥
विषवृक्षानिलस्पर्शात्तथाऽन्यैर्विषसंभवै ॥ ११७ ॥
अभिषक्तस्य चाप्याहुर्ज्वरमेकेऽभिषङ्गजम् ।
चिकित्सया विषघ्न्यैव प्रशमं लभते नरः ॥ ११८ ॥
कुछ आचार्यो का कहना है कि विषैले वृक्षो की वायु का स्पर्श तथा
अन्य इसी प्रकार विषयुक्त कारणो से उत्पन्न ज्वर अभिषङ्गजन्य ज्वर है।
इस प्रकार का ज्वर विषनाशक चिकित्सा से शान्त होता है। [विष से उत्पन्न
ज्वर मे मुख पर काली झांई, दाह, अतीसार और दिल का रुकना, भोजन मे
अनिच्छा, कपकपी, मूर्छा ओर बल की हानि होती है सु०।] ॥ ११७-११८ ॥
अभिचाराभिशापाभ्यां सिद्धानां यः प्रवर्तते ।
सन्निपातज्वरो घोरः स विज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ११९ ॥
सन्निपातज्वरस्योक्तं लिङ्गं यत्तस्य तत्स्मृतम् ।
चित्तेन्द्रियशरीराणामार्तयोऽन्याश्च नैकशः ॥ १२० ॥
सिद्ध पुरुषो के अभिचार (हिंसा के लिये किये होम आदि से) या अनि-
शाप द्वारा जो सन्निपात ज्वर उत्पन्न होता है, वह अतिशय कष्टसाध्य होता है।
सन्निपात ज्वर के लक्षण ही इस ज्वर के लक्षण होते है। चित्त, इन्द्रिय और
शरीर की अन्य पीडाये रोगी को दुःख देती हैं १ ॥ ११९-१२० ॥
प्रयोगं त्वभिचारस्य दृष्ट्वा शापस्य चैव हि ।
स्वयं श्रुत्वाऽनुमानेन लक्ष्यते प्रशमेन वा ॥ १२१ ॥
१ वृद्ध वाग्भट मे निम्न लक्षण कहे ह—
तत्राभिचारिकैर्मन्त्रैर्हूयमानस्य तप्यते ।
पूर्वं चेतस्ततो देह. ततो विस्फोटतृड्भ्रमे ।
सदाहमूर्च्छाग्रस्तस्य प्रत्यहं वर्धते ज्वर ॥
आभिचारिक मन्त्रो से हवन करने से पहले, चित्त और फिर देह तपता हे।
अनन्तर देह पर फुसिये, प्यास और भ्रम होता है, दाह और मूर्छा ग्रसती है
और दिनों दिन ज्वर बढता है।

२८२ चरकसंहिता [ अ० ३ विविद्यादभिचारस्य शापस्य च तदात्मके। यथाक्रमप्रयोगेण लक्षणं स्यात्पृथग्विधम् ॥ १२२ ॥ अन्य अनेक ज्वरों के लक्षण-अभिचार और अभिशाप ज्वर की परीक्षा स्वयं अभिचार के प्रयोग को देखकर, अथवा अभिशाप को सुनकर ( रोगी के मुख से या स्वयं ), अनुमान द्वारा अथवा इनकी चिकित्सा से शमन होने पर करनी चाहिये। अभिचार और अभिशाप के नाना रूप होने से कर्मों के प्रयोग के अनुसार ही इनके लक्षण भी नाना प्रकार के हो जाते हैं ॥ १२१-१२२ ॥ ध्याननिःश्वासबहुलं लिङ्गं कामज्वरे स्मृतम् । शोकजे बाष्पबहुलं त्रासप्रायं भयज्वरे ॥ १२३ ॥ क्रोधजे बहुसंरम्भं भूतावेशे त्वमानुषम् । मूर्च्छामोहमदग्लानिभूयिष्ठं विषसम्भवे ॥ १२४ ॥ केषाञ्चिदेषां लिङ्गानां सन्तापो जायते पुरः । पश्चात्तुल्यं तु केषांचिदेषु कामज्वरादिषु ॥ १२५ ॥ कामादिजानामुद्दिष्टं ज्वराणां यद्विशेषणम् । कामादिजानां रोगाणामन्येषामपि तत्स्मृतम् ॥ १२६ ॥ ते पूर्वं केवलाः पश्चान्निजैर्व्यामिश्रलक्षणाः । हेत्वौषधविशिष्टाश्च भवन्त्यागन्तवो ज्वराः ॥ १२७ ॥ कामजन्य ज्वर में—ध्यान ( एक ही चिन्ता ) निःश्वास का जोर २ से बाहर आना । शोकजन्य ज्वर में—आंखों में आँसू आना, [ और बकना, सु० ] भयजन्य ज्वर में डर लगना ( और बकना, सु० ) होता है । [ चित्त का गिरना आलस्य, अर्धनिद्रा, दिल में दर्द शरीर का दुखना । सु० ] क्रोधजन्य ज्वर में ज्वर की तीव्रता तथा अन्य लक्षण प्रबल रहते हैं, ( रोगी कांपता भी है ) । भूता- विष्ट ज्वर में अमानुषीय ( मनुष्य की शक्ति से बाहर के ) कार्य करता है । विषजन्य ज्वर में मूर्च्छा, मोह, मद और ग्लानि होती है । कामजन्य आदि ज्वरों में कभी कभी सन्ताप इन लक्षणों से पूर्व हो जाता है, कभी पीछे और कभी साथ साथ में होता है । यहां पर कामादि से उत्पन्न ज्वरों के जो विशेष लक्षण कहे हैं, वे लक्षण कामादि से उत्पन्न अन्य रोगों ( उन्माद आदि ) में भी होते हैं । आगन्तुज ज्वर प्रथम स्वतन्त्र रहता है, पीछे से वातादि दोषों के साथ सम्ब- न्धित हो जाता है । इन ज्वरों में कारण तथा चिकित्सा अन्य ज्वरों से भिन्न रहती है ॥ १२३-१२७ ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३ १मनस्यभिहते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् । ज्वरः प्राप्नोति वाताद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ १२८ ॥ काम आदि द्वारा मन के आक्रान्त होने पर उत्पन्न ज्वर प्रथम अधिक बलवान् नहीं होता । परन्तु जब शरीर के वातादि दोषों में मिल जाता है, तब अधिक बलवान् हो जाता है ॥ १२८ ॥ संसृष्टाः सन्निपतिताः पृथग्वा कुपिता मलाः । रसाख्यं धातुमन्वेत्य पक्ति स्थानान्निरस्य च ॥ १२९ ॥ स्वेन तेनोष्मणा चैव कृत्वा देहोष्मणो बलम् । स्रोतांसि रुद्ध्वा सम्प्राप्ताः केवलं देहमुल्बणाः ॥ १३० ॥ सन्तापमधिकं देहे जनयन्ति नरस्तदा । भवत्यत्युष्णसर्वाङ्गो ज्वरितस्तेन चोच्यते ॥ १३१ ॥ स्रोतसां संनिरुद्धत्वात्स्वेदं ना नाधिगच्छति । स्वस्थानात्प्रच्युते चाग्नौ प्रायस्तरुणे ज्वरे ॥ १३२ ॥ ज्वर—पृथक् पृथक्, द्वन्द्व रूप में या सन्निपात रूप में कुपित वातादि दोष रस नामक धातु का सहारा लेकर अग्नि को उसके असली स्थान से (आमा- शय से) निकाल कर, अपनी गरमी से देह की गरमी को बढ़ाकर, स्रोतों को बन्द करके, देह में फैलकर शरीर में अधिक (मात्रा से अधिक) सन्ताप उत्पन्न कर देते हैं । उससे मनुष्य का ज्वर उत्पन्न हो जाता है । उसके सब अंग गरम हो जाते हैं, इस अवस्था का 'ज्वर' कहते हैं । स्रोतों के रुक जाने से और अग्नि के अपना स्थान छोड़ देने के कारण तरुण (नूतन) ज्वर में पसीना नहीं आता ॥ १२९-१३२ ॥ अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च। हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चाऽऽलस्यमेव च ॥ १३३ ॥ ज्वरोऽविसर्गी बलवान दोषाणामप्रवर्तनम् । लालाप्रसेको हृल्लासो क्षुन्नाशो विरस मुखम् ॥ १३४ ॥ स्तब्धमुग्रगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता । न निङ्गीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्याऽऽमस्य लक्षणम् ॥ १३५ ॥ आमज्वर के लक्षण—अरुचि, अविपाक, पेट में भारीपन, हृदय (आमा- शय) का साफ न होना, तन्द्रा, आलस्य, निरन्तर ज्वर का बना रहना, ज्वर १ मनस्यभिद्रुते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् । ज्वर प्राप्नोति कामाद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ इति गंगाधरसम्मतः पाठः ।

२६४ चरकसंहिता [अ० ३ का बलवान् होना, मल वा दोषों का बाहर न निकलना, मुख से लार बहना, जी मचलाना, भूख का न लगना, मुख का स्वाद बदल जाना (विरसता), गात्रो मे जडता, सुप्तता और भारीपन, बार बार थोडा २ मूत्र का आना, कच्चे मल का आना और ग्लानि ये आमज्वर के लक्षण है ॥ १३३-१३५ ॥ ज्वरवेगोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ १३६ ॥ पच्यमान ज्वर के लक्षण—ज्वर का अधिक बढना, प्यास, प्रलाप, सास का जोर से चलना, चक्कर आना, मल की प्रवृत्ति, उत्क्लेश (वमन की अभिरुचि), ये पच्यमान ज्वर के लक्षण है ॥ १३६ ॥ क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्तिरष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ १३७॥ निराम ज्वर—भूख का लगना, शरीर मे हल्कापन, ज्वर का घट जाना, मल-मूत्र स्वेद का बाहर निकलना, तथा आठवे दिन तक दोष का रहना ये निराम ज्वर के लक्षण है । [ साधारणत आठवे दिन मे दोषो का परिपाक हो जाता है। परन्तु कई बार दोष आठ दिन से पूर्व भी पच जाते है और कई बार इससे भी अधिक देर मे पचते है । इसलिये लक्षणा को देख कर पक्व दोष की परीक्षा करे । जब ज्वर आप से आप कम हो जावे, देह हलका हो, मल विचलित हो, तब दोषो का पाक हुआ जाने ] ॥ १३७ ॥ नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् । क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥ १३८ ॥ नवज्वर मे अपथ्य—दिन मे साना, स्नान करना, मालिश, मैथुन, क्रोध, प्रवात (वायु का सीधा आना ), व्यायाम और कषाय रसवाले (कषाय स्तम्भक होने से) सेवन नही करने चाहिये । [ कषाय शब्द से कपाय रस वाले क्वाथ तथा अन्य कषाय कल्पना का भी निषेध है । परन्तु इस अवस्था मे साधन कषाय न देकर, पाचक, मधुर कषाय दे सकते है। सोल्ह गुण जल मे चतुर्थ भाग शेष करने से 'कषाय' बनता है। यह कषाय तरुण ज्वर मे न देना चाहिये ] ॥ १३८ ॥ ज्वरे लङ्घनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् । क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ १३६ ॥ लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले । विज्वरत्वं लघुत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते ॥ १४० ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५ प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत् । बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ १४१ ॥ ज्वर मे लङ्घन—आम से मिलकर दोष अग्नि को मन्द कर देते है, इसलिये ज्वर मे लङ्घन ( उपवास या लघु-भोजन ) करना चाहिये । सब अवस्थाओ मे अग्नि को बढाना चाहिये । इस समय का लङ्घन अमृत के समान गुणकारी होता है । परन्तु क्षयजन्य, वातजन्य, भयजन्य, क्रोधजन्य, कामजन्य, शोकजन्य, श्रमजन्य ज्वरो मे लङ्घन नहीं कराना चाहिये¹ । लङ्घन ( उपवास ) से दोषों का क्षय होने पर जाठराग्नि प्रबल हो जाती है, बुखार उतर जाता है, शरीर हल्का हो जाता है, भूख लगने लगती है² । लङ्घन तब तक ही कराना चाहिये जिससे कि प्राण या बल ( शक्ति ) का ह्रास न होने पाये । क्योकि आरोग्य बल पर ही निर्भर करता है और यह सब चिकित्सा आरोग्य के लिये ही हैं ॥ १३६–१४१ ॥ लङ्घनं स्वेदनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रसः । पाचनान्यविपक्कानां दोषाणां तरुणे ज्वरे ॥ १४२ ॥ तृष्यते सलिलं चोष्णं दद्याद्वातकफज्वरे । मद्योत्थे पैत्तिके वाऽथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ १४३ ॥ दीपनं पाचनं चैव ज्वरघ्नमुभयं हि तत् । स्रोतसां शोधनं बल्यं रुचिस्वेदकरं शिवम् ॥ १४४ ॥ दोषो के पाचन—लङ्घन, स्वेदन ( पसीना लाना ), समय पर यवागू, तिक्त रस ये वस्तुएँ तरुण ज्वर मे आम दोषो को पकाती हे । वात-कफजन्य ज्वर मे प्यास लगने पर उष्ण जल देना चाहिये । मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे तिक्त वस्तुओ से साधित शीतल जल देना चाहिये । यह दोनो प्रकार का पानी अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, स्रोतो का शोधक, बलकारक, रुचिकारक, पसीना लाने वाला और कल्याणकारक है ॥ १४२–१४४ ॥ १ लङ्घन से अभिप्राय शरीर का हल्का करने वाले कर्म और द्रव्यो से है । जब दोष आमाशय मे हो और उत्क्लेश ( उवकाई ) हो तो वमन करना उत्तम है । जब तक रोगी के दोष घनीभूत बने रहे तब तक रोगी अनशन करे, उसके बाद भोजन करे ! २ लङ्घन की पहिचान —वात, मूत्र, मल हो, गात्र हल्का हो, डकार हो, हृदय और कण्ठ शुद्ध हो, आलस्य न हो, पसीना हो, भूख, प्यास एक साथ लगे, चित्त प्रसन्न हो तो जाने लङ्घन ठीक हुआ है ।

२६६ चरकसंहिता [अ० ३ मुस्तपर्पटकौशीरचन्दनोदीच्यनागरैः । शृतशीतं जलं दद्यात्पिपासाज्वरशान्तये ॥ १४५ ॥ षडग पानीय—मोथा, पित्तपापडा, खस, लाल चन्दन, नेत्रबाला और सोंठ इनको एक एक कर्ष लेकर दो प्रस्थ पानी मे उबाले । एक प्रस्थ रहने पर छानकर ठण्डा करके देना चाहिये । इससे प्यास और ज्वर की शान्ति होती है । [कई स्थान मे सोंठ के स्थान पर 'पद्माख' डालना लिखा है ] ॥१४५॥ कफप्रधानानुत्क्लिष्टान्दोषानामाशयस्थितान् । बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वम्यानां वमनैर्हरेत् ॥ १४६ ॥ अनुपस्थितदोषाणां वमनं तरुणे ज्वरे । हृद्रोगं श्वासमानाहं मोहं १ च जनयेद् भृशम् ॥ १४७ ॥ सर्वदेहानुगाः सामा धातुस्था ॰दुःखनिर्हराः । दोषाः फलेभ्य आमेभ्यः स्वरसा इव सात्ययाः ॥ १४८ ॥ वमितं लङ्घितं काले यवागूभिरुपाचरेत् । यथा स्वौषधसिद्धाभिर्मण्डपूर्वाभिरादितः ॥ १४९ ॥ यावज्ज्वरमृदूभावात्षडहं वा विचक्षणः । तस्याग्निर्दीप्यते ताभिः समिद्भिरिव पावकः ॥ १५० ॥ ताश्च भेषजसंयोगाल्लघुत्वाच्चाग्निदीपनाः । वातमूत्रपुरीषाणां दोषाणां ॰चानुलोमनाः ॥ १५१ ॥ स्वेदनाय द्रवोष्णत्वाद् द्रवत्वात्तृट्प्रशान्तये । आहारभावात्प्राणाय सरत्वाल्लाघवाय च ॥ १५२ ॥ ज्वरघ्न्यो ज्वरसात्म्यत्वात्तस्मात्पेयाभिरादितः । ज्वरानुपचरेद्धीमानृते मद्यसमुत्थितात् ॥ १५३ ॥ साम ज्वरो मे उपचार—आमाशय मे स्थित कफप्रधान दोष यदि ज्वर का कारण हो, इन दोषो का उत्क्लेश अर्थात् बाहर निकलने की ओर प्रवृत्ति हो, परन्तु बाहर न निकले और रोगी वमन कराने के योग्य हो तो उचित काल मे वमन करा के दोषो को बाहर कर देना चाहिये । [ उत्क्लेश का लक्षण—मुख मे बहुत पानी या डकार आकर भी अन्न बहुत कष्ट देकर भी न निकले, हृदय पीडित हो उसे 'उत्क्लेश' कहते है ] यह वमन प्रात काल देना चाहिये । यदि तरुण ज्वर मे दोष बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति न रखते हो, तो रोगी को १ 'कास' इति च पाठ । २ 'असुनिर्हराः' इति च पाठ. । ३ 'विबन्धस्यानुलोमिका' इति च पाठ. ।

अ० ३ चिकित्सितस्थानम् २६७

अ० ३ चिकित्सितस्थानम् २६७ वमन करान से हृदय-रोग, श्वास, आनाह, मोह (मूर्च्छा), आदि उपद्रव हो जाते हैं। सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त, धातुओ मे स्थित साम दोष को निकालना ऐसे ही अति कठिन और खतरे से खाली नहीं जिस प्रकार कच्चे फलो से स्वरस को निकालना कठिन होता है, और कभी कभी इस मे फल का भी नाश हो जाता है। वमन या लङ्घन करने के पश्चात् उचित समय पर (भोजन काल मे औष- धियो से सिद्ध मण्ड और यवागू देनी चाहिये। अधिक द्रव होने से प्रथम मण्ड देना चाहिये, पीछे से यवागू (विलेपी) देनी चाहिये। इस समय पाचक औष- धियो से सिद्ध करके मण्ड देना चाहिये। जब तक ज्वर घटे नहीं अथवा छ दिनो तक मण्ड ओर यवागू का प्रयोग करना चाहिये। इसके प्रयोग से जिस प्रकार समिधाओ से अग्नि बढती है, जाठराग्नि प्रदीप्त होती है। औषधियो का सयोग होने से, लघु होने से, यवागू अग्नि को बढाती है, वायु, मल मूत्र ओर दोषो का अनुलोमन करती है, द्रव ओर उष्ण होने से पसीना लाती है, द्रव होने से प्यास बुझाती है, आहार होने के कारण प्राण बल देती है, खर होने से लघुता उत्पन्न करती है ज्वर मे सात्म्य होने से ज्वरनाशक है। इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि प्रथम पेयाओ द्वारा ज्वर की चिकित्सा करे। यदि ज्वर मद्य मे उत्पन्न हुआ है तो पेया न देवे ॥ १४६-१५३ ॥ मदात्यये मद्यनित्ये ग्रीष्मे पित्तकफाधिके । ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च यवागूर्न हिता ज्वरे ॥ १५४ ॥ निम्न अवस्थाओ मे यवागू नहीं देनी चाहिये—मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे, मदात्यय मे, नित्य मद्यपान करने वाले को, ग्रीष्म ऋतु मे, पित्तकफ प्रधान ज्वर में, ऊर्ध्वग रक्त पित्त मे यवागू हितकर नहीं होती ॥ १५४ ॥ तत्र तर्पणमेवाग्रे प्रयोज्यं लाजसक्तुभिः । ज्वरापहैः फलरसैर्युक्तं समधुशर्करम् ॥ १५५ ॥ द्राक्षादाडिमखर्जूरप्रियालैः सपरूषकैः । तर्पणार्हेषु कर्त्तव्यं तर्पणं ज्वरशान्तये ॥ १५६ ॥ ततः सात्म्यबलापेक्षी भोजयेज्जीर्णतर्पणम् । तनुना मुद्गयूषेण जाङ्गलाना रसेन वा ॥ १५७ ॥ इन उपरोक्त अवस्थाओ मे—लाजा के सत्तूओ को मधु, खाड तथा अनार आदि फलो के रस के साथ देना चाहिये। यवागू के स्थान पर लाजाओ का तर्पण प्रथम देना चाहिये। जो रोगी तर्पण के योग्य हो उनको ज्वर की शान्ति के लिये अगूर, अनार, खजूर, पियाल, फालसा इनके रसो से

२६८ चरकसंहिता [ अ० ३


तर्पण करना चाहिये । तर्पण के जीर्ण होने पर सात्म्य और बल की अपेक्षा से
मृग के यूष या जंगल के पशु पक्षियों के मांस रस के साथ चावल
देना चाहिये ॥ १५५-१५७ ॥
अन्नकालेषु चाप्यस्य विधेयं दन्तधावनम् ।
योऽस्य वक्त्ररसस्तस्माद्विपरीत प्रियं च यत् ॥ १५८ ॥
तदस्य मुखवैशद्यं प्रकाङ्क्षां चान्नपानयोः ।
धत्ते रसविशेषाणामभिज्ञत्वं करोति यत् ॥ १५९ ॥
विशोध्य द्रुमशाखाग्रैरास्यं प्रक्षाल्य चासकृत् ।
मस्त्विक्षुरसमद्याद्यैर्यथाहारमवाप्नुयात् ॥ १६० ॥
पाचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम् ।
अन्न काल में रोगी को दातुन करानी चाहिये । दातुन ऐसी होनी चाहिये
जिसका रस रोगी के मुख के रस से विपरीत हो, और रोगी को प्रिय लगे ।
दातुन करने से मुख स्वच्छ होता है, खान-पान में रुचि होती है, भिन्न भिन्न
रसों का परिज्ञान होता है । दातुन से मुख को साफ करके गरम पानी से मुख
को स्वच्छ करके, मस्तु (दही का पानी), गन्ने का रस, मद्य आदि (मूग के
यूष) के साथ भोजन करना चाहिये । [कुछ विद्वानों की सम्मति में इनका
केवल मुख में धारण करना चाहिये] । छठे दिन के बीत जाने पर लघु अन्न
का भोजन कराके अगले दिन पाचनीय या शमनीय कषाय देना चाहिये ।
[लङ्घन की मर्यादा—दोष के अनुसार ही ज्वर के निमित्त ३, २, या छः रात
लङ्घन करे ।] अपक्व आहार अपक्व दोषों को तथा अपक्व रस को पकाने वाले
कषाय को 'पाचक' कहते हैं । जो दुष्ट दोषों को बाहर नहीं निकालता, प्रकुपित
दोषों को शमन करता है, प्रकृतिस्थ दोषों, धातुओं में परिवर्त्तन नहीं लाता
उसको 'शमनीय' कहते हैं । [प्रथम लङ्घन से दोषों को शान्त करना (पचाना)
चाहिये । छः दिन तक लङ्घन कराने पर भी यदि दोष न पके तो पाचनीय
कषाय देना चाहिये । और जब दोषों का परिपाक हो जाये तो शमनीय कषाय
देना चाहिये] ॥ १५८-१६० ॥
ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ १६१ ॥
स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम् ।
दोषा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ॥ १६२ ॥
न तु कल्पनमुद्दिश्य कषायः प्रतिषिध्यते ।
यः कषायः कषायः स्यात्स वर्ज्यस्तरुणज्वरे ॥ १६३ ॥

यूषैरम्लैरनम्लैर्वा जाङ्गलैर्वा रसैर्हितैः । दशाहं यावदश्नीयाल्लघ्वन्नं ज्वरशान्तये ॥ १६४ ॥ तरुण ज्वर मे ही कषाय का निषेध है । [ सात दिन तक ज्वर तरुण कहाता है, १२ दिन तक मध्यम और इससे आगे पुराना ज्वर कहाता है ] चूंकि कषाय स्तम्भकारक होते है, इसलिये कषाय से दोष जड बन जाते है, पचते नही और विषम ज्वर को उत्पन्न करते है । स्वरस, कल्क, श्रुत, शीत और फाण्ट इस कल्पना का लेकर तरुण ज्वर मे कषाय का निषेध नही है । अपितु जो कषाय कषाय रस वाला है, उसका निषेध तरुण ज्वर मे हे । ज्वर की शान्ति के लिये दसवे दिन अनार, आंवला आदि फलो के रस से खट्टे बनाये या खट्टे किये बिना मूंग आदि का यूष अथवा जांगल पशु-पक्षियो का मास- रस हल्के भोजन के साथ देना चाहिये ॥ १६१–१६४ ॥ अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ १६५ ॥ घृत पान—ज्वर मे जब कफ मन्द हो जाय, वात या पित्त अथवा वात- पित्तप्रधान हो और दोषो का पक्तिपाक हो जाये, उस समय घृत का पान कराना अमृत के समान है ॥ १६५ ॥ निर्दशाहमपि ज्ञात्वा कफोत्तरमलङ्घितम् । न सर्पिः पाययेद्वैद्यः शमनैस्तमुपाचरेत् ॥ १६६ ॥ दस दिन हो जाने पर भी यदि वैद्य को पता लग जाये कि रोगी को लङ्घन नहीं कराया गया तो इसको घृत का पान नही करावे अपितु शमनीय ओषधियो से चिकित्सा करे ॥ १६६ ॥ यावल्लघुत्वादशनं दद्यान्मांसरसेन च । बलं ह्यलं दोषहरं परं तच्च बलप्रदम् ॥ १६७ ॥ जब तक शरीर मे लघुता न आये तब तक मास-रस के साथ लघु आहार देना चाहिये । बल ही दोषो का नष्ट करने मे समर्थ है और मासरस उत्तम बलवर्द्धक है ॥ १६७ ॥ दाहतृष्णापरीतस्य वातपित्तोत्तरं ज्वरम् । बद्धप्रच्युतदोषं वा निरामं पयसा जयेत् ॥ १६८ ॥ दाह और तृष्णा से आक्रान्त, वात-पित्तप्रधान निराम ज्वर मे जब कि दोष रुके हो, परन्तु अपने स्थान से हिल गये हो तो उनको दूध के द्वारा जीतना चाहिये ॥ १६८ ॥

३०० चरकसंहिता [ अ० ३ ~ ~ ~ क्रियाभिराभिः प्रशमं न प्रयाति यदा ज्वरः । अक्षीणबलमांसाग्नेः शमयेत्तं विरेचनैः ॥ १६९ ॥ यदि उपरोक्त क्रियाओ से ज्वर शान्त न हो ओर रोगी का बल और अग्नि क्षीण न हुए हो तो विरेचन द्वारा ज्वर को शान्त करना चाहिये ॥ १६९ ॥ ज्वरक्षीणस्य न हितं वमनं न विरेचनम् । कामं तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ॥ १७० ॥ ज्वर के कारण क्षीण हुए व्यक्ति को वमन या विरेचन देना हितकारी नही है । यदि अभीष्ट हो तो दूध के द्वारा अथवा निरूह बस्तियो द्वारा मल को निकालना चाहिये ॥ १७० ॥ निरूहो बलमग्निं च विज्वरत्वं मुदं रुचिम् । परिपक्वेषु दोषेषु प्रयुक्तः शीघ्रमावहेत् ॥ १७१ ॥ ज्वर मे दोषो के परिपक्व होने पर दिया हुआ निरूह बल ( शक्ति ) और अग्नि को बढाता है, ज्वर को हटाता है, प्रसन्नता उत्पन्न करता है, भोजन मे रुचि उत्पन्न करता है ॥ १७१ ॥ पित्तं वा कफपित्तं वा पित्ताशयगतं हरेत् । स्रसनं, त्रीन्मलान् बस्तिर्हरेत्पक्वाशयस्थितान् ॥ १७२ ॥ स्रसन ( विरेचन ) पित्ताशय ओर ग्रहणी मे स्थित पित्त और कफपित्त का ही निकालता है । परन्तु वस्ति पक्वाशय ( बृहदन्त्र ) मे स्थित वात, पित्त, कफ तीनो मलो को बाहर निकालती है ॥ १७२ ॥ ज्वरे पुराणो संक्षीणे कफपित्ते दृढाग्नये । रूक्षबद्धपुरीषाय प्रदद्यादनुवासनम् ॥ १७३ ॥ पुराने ज्वर मे कफ पित्त के क्षीण होने पर, मल के कठोर तथा रूक्ष होने पर यदि रोगी की अग्नि प्रबल हो तो अनुवासन ( स्निग्ध वस्ति ) देना चाहिये ॥ १७३ ॥ गौरवे शिरसः शूले विबद्धेष्विन्द्रियेषु च । जीर्णज्वरे रुचिकरं कुर्यान्मूर्धविरेचनम् ॥ १७४ ॥ अभ्यङ्गांश्च प्रदेहांश्च सस्नेहान् सावगाहनान् । विभज्य शीतोष्णतया कुर्याज्जीर्णे ज्वरे भिषक् ॥ १७५ ॥ तैराशु हि शमं याति बहिर्मार्गगतो ज्वरः । लभन्ते सुखमङ्गानि बल वर्णश्च वर्धते ॥ १७६ ॥ धूपनाञ्जनयोगैश्च यान्ति जीर्णज्वराः शमम् ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०१

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०१ शिरोविरेचन—जीर्णज्वर मे देह के गुरु हाने पर, शिरोवेदना मे, इन्द्रिना के अपने विषय मे प्रवृत्त न होने पर शिरोविरेचन देना चाहिये। यह विरेचन रुचि ( विपयो मे प्रीति ) करता है । [ यहा पर वैरेचनिक नस्य से अभिप्राय है। परन्तु यदि शिर मे शून्यता अनुभव हो तो स्नैहिक धूम नस्य, यदि दाह हो तो पित्तनाशक शमनीय धूम का प्रयोग करना चाहिये । ] वैद्य का चाहिये कि जीर्णज्वर मे शीतकारण से उत्पन्न तथा उष्ण कारण से उत्पन्न ज्वर की विवेचना करके अभ्यग, प्रदेह, स्नेहयुक्त अवगाहन देवे । यदि शोत कारण से ज्वर उत्पन्न हो तो उष्ण अभ्यग आदि देने चाहिये । उष्ण कारण से उत्पन्न हो ता शीतल अभ्यग देने चाहिये । इन क्रियाओ से बहिर्माग ( त्वचा एव रक्त धातु ) मे पहुँचा ज्वर शीघ्र शान्त हो जाता है, अगो को सुख मिलता है, रोगी का बल और कान्ति बढती है ॥ १७६ ॥ त्वङ्मात्रशेषा येषा च भवत्यागन्तुरन्वयः ॥ १७७ ॥ इति क्रियाक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः सम्प्रकाशितः । जा ज्वर केवल त्वचा मे ही शेष रह गये हो, या जिन ज्वरो के साथ आगन्तुज अनुबन्ध लगा रहता है, वे जीर्णज्वर धूपन, अजन प्रयाग से शान्त हो जाते हं । यह ज्वरनाशक, फलप्रद चिकित्सा विवि कह दी ॥ १७७ ॥ येषा त्वेष क्रमस्तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ॥ १७८ ॥ रक्तशाल्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह । यवाग्वोदनलाजार्थे ज्वरिताना ज्वरापहाः ॥ १७६ ॥ अम्लाभिलाषी तामेव दाडिमाम्ला सनागराम् । सृष्टविट् पैत्तिको वाऽथ शीता मधुयुता पिबेत् ॥ १८० ॥ लाजपेया सुखजरा पिप्पलीनागरैः शृताम् । पिबेज्ज्वरी ज्वरहरा क्षुद्धानलपामिरादितः ॥ १८१ ॥ पेया वा रक्तशालीना पार्श्वबस्तिशिरोरुजि । श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्या सिद्धा ज्वरहरा पिबेत् ॥ १८२ ॥ ज्वरातिसारी पेया वा पिबेत्साम्ला शृता नरः । पृश्निपर्णीबलाबिल्वनागरोत्पलधान्यकैः ॥ १८३ ॥ शृता विदारीगन्धाद्यैर्दीपनी स्वेदनी नरः । कासी श्वासी च हिक्को च यवागू ज्वरितः पिबेत् ॥ १८४ ॥ विबद्धवर्चाः सयवा पिप्पल्यामलकैः शृताम् । सर्पिष्मती पिबेत्पेया ज्वरी दोषानुलोमनीम् ॥ १८५॥

३०० चरकसंहिता [ अ० ३ कोष्ठे विबद्धे सरुजि पिबेत्पेयां शृता ज्वरी । मृद्वीकापिप्पलीमूलचव्यामलकनागरैः ॥ १८६ ॥ पिबेत्सविल्वां पेया वा ज्वरे सपरिकर्तिके । बलावृक्षाम्लकोलाम्लकल्शीधावनीशृताम् ॥ १८७ ॥ अस्वेदनिद्रस्तृष्णार्तः पिबेत्पेयां सशर्कराम् । नागरामलकैः सिद्धां घृतभृष्टां ज्वरापहाम् ॥ १८८ ॥ जिन द्रव्यों का यह क्रम है, उनको अब सुनो—(१) ज्वर के रोगी के ज्वर को नाश करने के लिये यवागू, ओदन, लाज, प्रयोग करने के लिये पुराने लाल चावल और पुराने साँठी के चावलों का व्यवहार करना चाहिये । (२) जिस ज्वर-रोगी की अग्नि मन्द हो जाये उसको चाहिये कि भूख लगने पर प्रथम ज्वरनाशक, सुख से पचने वाली, पिप्पली और सोंठ से साधित लाजाओं की पेया पीये । जिस रोगी को खट्टे रस की चाह हो, उसको चाहिये कि माठ से साधित लाजा की पेया मे अनार का रस (अनारदाना) मिलाकर पीये । जिस रोगी को मल पतला आता हो अथवा पैत्तिक प्रकृति हो उसको चाहिये कि लाजा की पेया को ठण्डा करके शहद मिलाकर पीये । (३) पार्श्व (पसलियों), बस्ति (मूत्राशय) और शिर मे वेदना होने पर लाल चावलों की पेया को गोखरू और छोटी कटेरी के साथ सिद्ध करके पीये । यह पेया फलदायक तथा ज्वरनाशक है । (४) ज्वर-अतिसार के रोगी को चाहिये कि पृश्निपर्णी (पिठवन), खरैटी, बेलगिरी, सोंठ, नीला कमल (कमलगट्टा) और धनिया इनसे सिद्ध पेया को अनार के रस से खट्टा करके पान करे । (५) ज्वर रोगी को यदि कास, श्वास, हिचकी आती हो तो विदारी- गन्धादि गण से सिद्ध पेया को पिये । यह पेया अग्निदीपक और पसीना लाने वाली है । (विदारीगन्धादि गण मे अभिप्राय स्वल्प पञ्चमूल से है, विदारी- गन्धा, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू) । (६) ज्वर-रोगी को मल रूखा और बधा आता हो तो उसको चाहिये कि जौ, पिप्पली, और आंवलो से सिद्ध पेया मे घी डालकर पान करे । यह पेया दोषो का अनुलोमन करती है । (७) यदि कोष्ठ मे कब्ज हो तथा पेट मे दर्द हो तो मुनक्का, पिप्पलीमूल, चव्य, आंवला और सोंठ से साधित पेया पीवे । (८) ज्वर मे यदि परिकर्त्तिका (मलत्याग के समय कटने के समान पीडा) होती हो तो खरैटी, वृक्षाम्ल (तिन्तडीक, कोकम, समाकदाना), खट्टे

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् ३०३

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् ३०३ बेर, पृश्निपर्णी, और शालपर्णी इनसे साधित यवागू मे विल्व के चूर्ण का प्रक्षेप डाल कर पीवे । (६) जिस ज्वर मे रोगी का नींद और पसीना न आता हा, तथा प्यास लगती हो उसको सेंठ, आवले से साधित घी मे भूनी पेया को शर्करा डालकर देना चाहिये । यह पेया ज्वरनाशक हे । [ यवागू-पाक की पाक-विधि देश लोक मे प्रसिद्ध व्यवहार से देखनी चाहिये । तीक्ष्ण वीर्य द्रव्या से आधा कर्ष, मृदु द्रव्यो से एक पल लेना, मध्यम वीर्य द्रव्यो का दो कर्ष लेना चाहिये । यह रस- प्रधान द्रव्यो की विधि है । क्वाथ द्रव्य ४ पल, जल २ आढक, चतुर्थांश बचाना चाहिये । ] ॥ १७८-१८८ ॥ मुद्गांन्मसूरांश्चणकान् कुलत्थान् समकुष्ठकान् । यूषार्थे यूषसात्म्याना ज्वरिताना प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥ ज्वर मे जिन पुरुषा का यूष सात्म्य ( अनुकूल ) हो, उनके यूष के लिये मूग, मसूर, चने, कुलत्थी आर मोठ इनका उपयोग करना चाहिये ॥ १८६ ॥ पटोलपत्र सफलं कुलक पापचेलिकाम् । कर्कोटकं कठिल्ल च विद्याच्छाक ज्वरे हितम् ॥१६० ॥ ज्वर रोगी के शाक के लिये परवल के पत्ते, परवल का फल, कुलक ( पर- वल भेद, या करेला ), पापचेलिका ( पाठा ), कर्कोटक ( ककोड़ा ), कठिल्लक ( लाल पुनर्नवा ) देना चाहिये । इनका शाक हितकारी है ॥ १६० ॥ लावान् कपिञ्जलानेणांश्चकोरानुपचक्रकान् । कुरङ्गान कालपुच्छांश्च हरिणान्पृषतान् शशान् ॥ १६१ ॥ कुक्कुटांश्च मयूरांश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकान् । प्रदद्यान्माससात्म्याय ज्वरिताय ज्वरापहान् ॥ १६२ ॥ ईषदम्लाननम्लान्वा रसान् काले विचक्षणः । गुरूष्णत्वान्न शसन्ति ज्वरे केचिच्चिकित्सकाः ॥ १६३ ॥ लंघनेनानिलबलं ज्वरे यद्यधिकं भवेत् । भिषग् मात्रविकल्पज्ञो दद्यात्तानपि कालवित् ॥ १६४ ॥ जिस ज्वर के रोगी को मास रस का सात्म्य ( अनुकूलता ) हो उसके लिये- बटेर, कपिंजल (श्वेत तीतर ), एण ( काला हरिण ), चकार, उपचक्रक ( चकोर का भेद ), कुरग, कालपुच्छ, हरिण और पृषत ( हरिण भेद ) और खरगोश इनके मास से रस बनाकर देना चाहिये । इस मास रस को अनार के रस आदि से खट्टा करके या बिना खट्टा बनाये देना चाहिये । यह मास रस ज्वरनाशक है । कई चिकित्सको की सम्मति हे कि मुर्गा, मोर, तीतर, क्रौंच, बत्तक पक्षियो

३०४ चरकसंहिता [ अ० ३ का मांस गुरु और उष्ण है, इसलिये इनका उपयोग ज्वर मे नही करना चाहिये। परन्तु यदि ज्वर मे उपवास के कारण वायु का बल प्रबल हो जाये तो मात्रा और विकल्पो को जानने वाले वैद्यको चाहिये कि इनका भी प्रयोग करे ॥१६४॥ घर्माम्बु चानुपानार्थं तृषिताय प्रदापयेत् । मद्यं वा मद्यसात्म्याय यथादोषं यथाबलम् ॥ १६५ ॥ गुरूष्णस्निग्धमधुरकषायांश्च नवज्वरे । ज्वर मे प्यास लगने पर उपरोक्त आहार के अनुपान मे गरम पानी देना चाहिये। जिस रोगी को मद्य-सात्म्य हो, उसका दोष और बल के अनुसार मद्य देना चाहिये ॥ १६५ ॥ आहारान् दोषपक्त्यर्थं प्रायशः परिवर्जयेत् ॥ १६६ ॥ अनुपानक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः संप्रकाशितः । नवज्वर (तरुण ज्वर) मे दोषो के पाचन के लिये गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर और कषाय रस वाले भोजनो का प्राय करके त्याग कर देना चाहिये । इस प्रकार से ज्वरनाशक और फलप्रद अनुपान क्रम कह दिया ॥ १६६ ॥ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यन्ते कषाया ज्वरनाशनाः ॥ १६७ ॥ पाक्यं शीतकषायं वा मुस्तपर्पटकं पिबेत् । सनागरं पर्पटकं पिबेद्वा सदुरालभम् ॥ १६८ ॥ किराततिक्तकं मुस्तं गुडूचीं विश्वभेषजम् । पाठामुशीरं सोदीच्यं पिबेद्वा ज्वरशान्तये ॥ १६६ ॥ ज्वरघ्ना दीपनाश्चैते कषाया दोषपाचनाः । तृष्णाऽरुचिप्रशमना मुखवैरस्यनाशनाः ॥ २०० ॥ पटोलं सारिवां मुस्तं पाठां कटुकरोहिणीं । कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥ २०१ ॥ निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ । किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् ॥ २०२ ॥ गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः । कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ॥ २०३ ॥ सन्ततं सततमन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् । वत्सकारग्वधं पाठां षड्ग्रन्थां कटुरोहिणीम् ॥ २०४ ॥ मूर्वां सातिविषां निम्बं पटोलं धन्वयासकम् । वचां मुस्तमुशीराणि मधुकं त्रिफलां बलाम् ॥ २०५ ॥

अ० ३ ] २० चिकित्सास्थानम् ३०५

अ० ३ ] २० चिकित्सास्थानम् ३०५ पाक्यं शीतकषायं वा पिबेज्ज्वरहरं नरः । मधूकमूस्तमृद्वीकाकाश्मर्याणि परूषकम् ॥ २०६ ॥ त्रायमाणामुशीराणि त्रिफला कटुरोहिणीम् । पीत्वा निशिस्थितं जन्तुर्ज्वराच्छीघ्रं विमुच्यते ॥ २०७ ॥ बृहत्यौ वत्सकं मुस्तं देवदारु महौषधम् । कोलपल्ली च योगोऽय सन्निपातज्वरापहः ॥ २०८ ॥ जात्यामलकमुस्तानि तद्वद्धन्वयवासकम् । विबद्धदोषो ज्वरितः कषाय सगुड पिवेत् ॥ २०९ ॥ त्रिफला त्रायमाणा च मृद्वीका कटुरोहिणीम् । पित्तश्लेष्महरस्त्वेषा कषायो ह्यानुलोमिकः ॥ २१० ॥ त्रिवृताशर्करायुक्तः पित्तश्लेष्मज्वरापहः । शटी पुष्करमूलं च व्याघ्री शृङ्गी दुरालभा ॥ २११ ॥ गुडूची नागर पाठा किरात कटुरोहिणी । एष शट्यादिको वर्गः सन्निपातज्वरापहः ॥ २१२ ॥ कासहृद् ग्रहपार्श्वार्त्तिश्वासतन्द्रासु शस्यते । बृहत्यौ पुष्कर भार्गी शटी शृङ्गी दुरालभा ॥ २१३ ॥ वत्सकस्य च बीजानि पटोल कटुरोहिणी । बृहत्यादिर्गणः प्रोक्तः संनिपातज्वरापहः ॥ २१४ ॥ कासादिषु च सर्वेषु दद्यात्सोपद्रवेषु च । कषायाश्च यवाग्वश्च पिपासाज्वरनाशनाः ॥ २१५ ॥ निर्दिष्टा भेषजाध्याये भिषक्तानपि योजयेत् । इसके आगे ज्वरनाशक कषायो का उपदेश करते हे । (१) मोथा, पित्तपापडा, (पित्त ज्वर मे), २—साठ, पित्तपापडा (पित्त प्रधान ज्वर मे) । ३—पित्तपापडा और दुरालभा (मन्दाग्नियुक्त पित्त कफ मे) । ४ चिरा- यता, मोथा, गिलोय और सांठ (शीतप्राय ज्वर मे) । ५-पाठा, उशीर, उदीच्य नेत्रबाला (दाहप्रधान ज्वर मे) । इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वर की शान्ति के लिये रोगी को देना चाहिये । १ ये कषाय ज्वरनाशक, अग्निदीपक, १आचार्य ने कोई भेद नहीं किया है । इसलिये गगाधर सेन तो तीन योग मानते है । प्रथम योग पूर्व के समान, दूसरा योग सोंठ, पित्तपापड़ा और दुरालभा तक । तीसरा योग सात द्रव्यो का पाठा-सप्तक है । जतुकर्ण ने चौथे और पाचवे को एक ही योग माना है। चिरायता आदि को सप्तक माना है ।