भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 616 में से

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२८८ चरकसंहिता [अ० ३ है। (३) पित्त कफ प्रधान हीनवात ज्वर में—वमन, शीत लगना, बार बार दाह, प्यास, मूर्च्छा, अस्थियों में वेदना होती है। (४) वातप्रधान, हीनपित्त- कफ ज्वर में—सन्धियों में तथा अस्थियों में और शिर में वेदना, प्रलाप, भारी होना, भ्रम, प्यास, कण्ठ और मुख का सूखना होता है। (५) पित्तप्रधान हीन कफ-वात ज्वर मे--मल और मूत्र में रक्तिमा (रक्त का सा लाल वर्ण ), जलन, पसीना, प्यास, निर्बलता, मूर्च्छा होती है। (६) कफ प्रधान हीन पित्तवात में— आलस्य, अरुचि, हृल्लास (जी मचलाना), जलन, वमन, बेचैनी, चक्कर आना, तन्द्रा और कास होता है। (७) कफप्रधान पित्त मध्य, वात हीन सन्निपात मे— प्रतिश्याय, वमन, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि मन्दाग्नि होती है। (८) पित्तप्रधान, मध्य कफ और हीन वात में—मूत्र और आख का हल्दी के समान पीला वर्ण, जलन, प्यास, भ्रम, अरुचि होती है। (६) वात प्रधान, मध्य कफ और हीन पित्त में—शिर में वेदना, कम्पन, श्वास का तेज चलना, प्रलाप, वमन और अरुचि होती है। (१०) कफप्रधान, वात मध्य और हीन पित्त में—शीत का लगना, भारीपन, तन्द्रा, प्रलाप, अस्थियों और शिर में अति वेदना होती है। (११) वात प्रधान, पित्त मध्य और कफ हीन सन्निपात मे—श्वास, कास, प्रतिश्याय, (जुकाम), मुख का सूखना और पसलियों में अति वेदना होती है। (१२) पित्त प्रधान, वात मध्य हीन कफ मे—जोड़ों में फूटन की सी पीड़ा, मन्दाग्नि, प्यास, दाह, अरुचि और चक्कर आता है। [ भालूकि तंत्र से सन्नि- पात ज्वरों के लक्षण तथा नाम भिन्न २ दिये हैं। जैसे—वात पित्ताधिक सन्नि- पात 'विभु' पित्त श्लेष्माधिक सन्निपात फल्गु, कफवाताधिक सन्निपात मकरी, वाताधिक सन्निपात 'विस्फारक', पित्ताधिक सन्निपात 'शीघ्रकारी और कफाधिक सन्निपात 'उल्बण' कहाता है । कुछ आचार्य इन लक्षण। क प्रकृतिसम अवाय के लक्षण होने से इस पाठ को अनाषे मानते हैं। अन्य स्थानों मे यह पाठ नहीं है ]॥ ६०-१०२॥ सन्निपातज्वरस्योर्ध्वमतो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १०३ ॥ क्षणे दाहः क्षणे शीत मस्थिसन्धिशिरोरुजा । सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ॥ १०४ ॥ सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शूकरिवावृत । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०५ ॥ परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ १०६ ॥

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