भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 616 में से

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पृष्ठ 310

२६६ चरकसंहिता [अ० ३ मुस्तपर्पटकौशीरचन्दनोदीच्यनागरैः । शृतशीतं जलं दद्यात्पिपासाज्वरशान्तये ॥ १४५ ॥ षडग पानीय—मोथा, पित्तपापडा, खस, लाल चन्दन, नेत्रबाला और सोंठ इनको एक एक कर्ष लेकर दो प्रस्थ पानी मे उबाले । एक प्रस्थ रहने पर छानकर ठण्डा करके देना चाहिये । इससे प्यास और ज्वर की शान्ति होती है । [कई स्थान मे सोंठ के स्थान पर 'पद्माख' डालना लिखा है ] ॥१४५॥ कफप्रधानानुत्क्लिष्टान्दोषानामाशयस्थितान् । बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वम्यानां वमनैर्हरेत् ॥ १४६ ॥ अनुपस्थितदोषाणां वमनं तरुणे ज्वरे । हृद्रोगं श्वासमानाहं मोहं १ च जनयेद् भृशम् ॥ १४७ ॥ सर्वदेहानुगाः सामा धातुस्था ॰दुःखनिर्हराः । दोषाः फलेभ्य आमेभ्यः स्वरसा इव सात्ययाः ॥ १४८ ॥ वमितं लङ्घितं काले यवागूभिरुपाचरेत् । यथा स्वौषधसिद्धाभिर्मण्डपूर्वाभिरादितः ॥ १४९ ॥ यावज्ज्वरमृदूभावात्षडहं वा विचक्षणः । तस्याग्निर्दीप्यते ताभिः समिद्भिरिव पावकः ॥ १५० ॥ ताश्च भेषजसंयोगाल्लघुत्वाच्चाग्निदीपनाः । वातमूत्रपुरीषाणां दोषाणां ॰चानुलोमनाः ॥ १५१ ॥ स्वेदनाय द्रवोष्णत्वाद् द्रवत्वात्तृट्प्रशान्तये । आहारभावात्प्राणाय सरत्वाल्लाघवाय च ॥ १५२ ॥ ज्वरघ्न्यो ज्वरसात्म्यत्वात्तस्मात्पेयाभिरादितः । ज्वरानुपचरेद्धीमानृते मद्यसमुत्थितात् ॥ १५३ ॥ साम ज्वरो मे उपचार—आमाशय मे स्थित कफप्रधान दोष यदि ज्वर का कारण हो, इन दोषो का उत्क्लेश अर्थात् बाहर निकलने की ओर प्रवृत्ति हो, परन्तु बाहर न निकले और रोगी वमन कराने के योग्य हो तो उचित काल मे वमन करा के दोषो को बाहर कर देना चाहिये । [ उत्क्लेश का लक्षण—मुख मे बहुत पानी या डकार आकर भी अन्न बहुत कष्ट देकर भी न निकले, हृदय पीडित हो उसे 'उत्क्लेश' कहते है ] यह वमन प्रात काल देना चाहिये । यदि तरुण ज्वर मे दोष बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति न रखते हो, तो रोगी को १ 'कास' इति च पाठ । २ 'असुनिर्हराः' इति च पाठ. । ३ 'विबन्धस्यानुलोमिका' इति च पाठ. ।

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