चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५ प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत् । बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ १४१ ॥ ज्वर मे लङ्घन—आम से मिलकर दोष अग्नि को मन्द कर देते है, इसलिये ज्वर मे लङ्घन ( उपवास या लघु-भोजन ) करना चाहिये । सब अवस्थाओ मे अग्नि को बढाना चाहिये । इस समय का लङ्घन अमृत के समान गुणकारी होता है । परन्तु क्षयजन्य, वातजन्य, भयजन्य, क्रोधजन्य, कामजन्य, शोकजन्य, श्रमजन्य ज्वरो मे लङ्घन नहीं कराना चाहिये¹ । लङ्घन ( उपवास ) से दोषों का क्षय होने पर जाठराग्नि प्रबल हो जाती है, बुखार उतर जाता है, शरीर हल्का हो जाता है, भूख लगने लगती है² । लङ्घन तब तक ही कराना चाहिये जिससे कि प्राण या बल ( शक्ति ) का ह्रास न होने पाये । क्योकि आरोग्य बल पर ही निर्भर करता है और यह सब चिकित्सा आरोग्य के लिये ही हैं ॥ १३६–१४१ ॥ लङ्घनं स्वेदनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रसः । पाचनान्यविपक्कानां दोषाणां तरुणे ज्वरे ॥ १४२ ॥ तृष्यते सलिलं चोष्णं दद्याद्वातकफज्वरे । मद्योत्थे पैत्तिके वाऽथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ १४३ ॥ दीपनं पाचनं चैव ज्वरघ्नमुभयं हि तत् । स्रोतसां शोधनं बल्यं रुचिस्वेदकरं शिवम् ॥ १४४ ॥ दोषो के पाचन—लङ्घन, स्वेदन ( पसीना लाना ), समय पर यवागू, तिक्त रस ये वस्तुएँ तरुण ज्वर मे आम दोषो को पकाती हे । वात-कफजन्य ज्वर मे प्यास लगने पर उष्ण जल देना चाहिये । मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे तिक्त वस्तुओ से साधित शीतल जल देना चाहिये । यह दोनो प्रकार का पानी अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, स्रोतो का शोधक, बलकारक, रुचिकारक, पसीना लाने वाला और कल्याणकारक है ॥ १४२–१४४ ॥ १ लङ्घन से अभिप्राय शरीर का हल्का करने वाले कर्म और द्रव्यो से है । जब दोष आमाशय मे हो और उत्क्लेश ( उवकाई ) हो तो वमन करना उत्तम है । जब तक रोगी के दोष घनीभूत बने रहे तब तक रोगी अनशन करे, उसके बाद भोजन करे ! २ लङ्घन की पहिचान —वात, मूत्र, मल हो, गात्र हल्का हो, डकार हो, हृदय और कण्ठ शुद्ध हो, आलस्य न हो, पसीना हो, भूख, प्यास एक साथ लगे, चित्त प्रसन्न हो तो जाने लङ्घन ठीक हुआ है ।