भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 616 में से

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पृष्ठ 308

२६४ चरकसंहिता [अ० ३ का बलवान् होना, मल वा दोषों का बाहर न निकलना, मुख से लार बहना, जी मचलाना, भूख का न लगना, मुख का स्वाद बदल जाना (विरसता), गात्रो मे जडता, सुप्तता और भारीपन, बार बार थोडा २ मूत्र का आना, कच्चे मल का आना और ग्लानि ये आमज्वर के लक्षण है ॥ १३३-१३५ ॥ ज्वरवेगोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ १३६ ॥ पच्यमान ज्वर के लक्षण—ज्वर का अधिक बढना, प्यास, प्रलाप, सास का जोर से चलना, चक्कर आना, मल की प्रवृत्ति, उत्क्लेश (वमन की अभिरुचि), ये पच्यमान ज्वर के लक्षण है ॥ १३६ ॥ क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्तिरष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ १३७॥ निराम ज्वर—भूख का लगना, शरीर मे हल्कापन, ज्वर का घट जाना, मल-मूत्र स्वेद का बाहर निकलना, तथा आठवे दिन तक दोष का रहना ये निराम ज्वर के लक्षण है । [ साधारणत आठवे दिन मे दोषो का परिपाक हो जाता है। परन्तु कई बार दोष आठ दिन से पूर्व भी पच जाते है और कई बार इससे भी अधिक देर मे पचते है । इसलिये लक्षणा को देख कर पक्व दोष की परीक्षा करे । जब ज्वर आप से आप कम हो जावे, देह हलका हो, मल विचलित हो, तब दोषो का पाक हुआ जाने ] ॥ १३७ ॥ नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् । क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥ १३८ ॥ नवज्वर मे अपथ्य—दिन मे साना, स्नान करना, मालिश, मैथुन, क्रोध, प्रवात (वायु का सीधा आना ), व्यायाम और कषाय रसवाले (कषाय स्तम्भक होने से) सेवन नही करने चाहिये । [ कषाय शब्द से कपाय रस वाले क्वाथ तथा अन्य कषाय कल्पना का भी निषेध है । परन्तु इस अवस्था मे साधन कषाय न देकर, पाचक, मधुर कषाय दे सकते है। सोल्ह गुण जल मे चतुर्थ भाग शेष करने से 'कषाय' बनता है। यह कषाय तरुण ज्वर मे न देना चाहिये ] ॥ १३८ ॥ ज्वरे लङ्घनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् । क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ १३६ ॥ लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले । विज्वरत्वं लघुत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते ॥ १४० ॥