चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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३३४ चरकसंहिता [ अ० ४
( ३ ) जिस पुरुष की अग्नि मन्द हो और उसको अम्ल-सात्म्य अर्थात् खट्टे
पदार्थ अनुकूल पडते हो तो इसका अनार या आवले से खट्टा बना कर पूर्वोक्त
तर्पण दे । [ मधु, खर्जूर दाख, फालसा ओर चीनी का शरबत वा चसार
के साथ खीलो के सत्तूओ के साथ मन्थ वा अनार का शरबत देना
चाहिये ] ॥३३-३५॥
शालिषष्टिकनीवारकोरदूषप्रशांतिकाः ।
श्यामाकश्च प्रियङ्गुश्च भोजनं रक्तपित्तिनाम् ॥ ३६ ॥
मुद्गा मसूराश्चणकाः समकुष्ठाढकीफलाः ।
प्रशस्ताः सूपयूपार्थे कल्पिता रक्तपित्तिनाम् ॥ ३७ ॥
पटोलनिम्बवेत्राग्रलक्षवेत्सपल्लवाः ।
किराततिक्तकं शाकं गण्डीरः सकठिल्लकः ॥ ३८ ॥
कोविदारस्य पुष्पाणि काश्मर्याश्चाथ शाल्मलेः ।
अन्नपानविधौ शाक यच्चान्यद्रक्तपित्तनुत् ॥ ३९ ॥
शाकार्थं शाकसात्म्यानां तच्छस्त रक्तपित्तिनाम् ।
स्विन्नं वा सर्पिषा भृष्टं यूषवद्वा विपाचितम् ॥ ४० ॥
पारावतान्कपोतांश्च लावान् रक्ताक्षवर्तकान् ।
शशान्कपिज्जलानेणान् हरिणान्कालपुच्छकान् ॥ ४१ ॥
रक्तपित्ते हितान्विद्याद्रसांस्तेषा प्रयोजयेत् ।
ईषदम्लाननम्लान् वा घृतभृष्टान् सशर्करान् ॥ ४२ ॥
कफानुगे यूषशाक दद्याद्वातानुगे रसम् ।
रक्तपित्ती का भोजन-( १ ) रक्तपित्त के रोगी को भोजन के लिये शालि
(हेमन्त धान्य ), साठी, नीवार, कारदूष ( कोदो ), प्रशातिका, श्यामाक, प्रियंगु
(कगनी) इनका भोजन करावे ।
( २ ) मूग, मसूर, चना, मोठ, आढकी ( अरहर ) इन दालो का सूप
तथा यूष रक्तपित्त रोगी को दे ।
( ३ ) परवल, नीम, बेत का अग्रभाग, पिलखन के पत्ते, वेतस के पत्ते,
चिरायता, गण्डीर ( दो प्रकार का है स्थलजन्य और जलजन्य, इसमे जलजन्य
रामठ शाक ), कठिल्लक ( पुनर्नवा ), कोविदार ( कचनार ) के फूल, गम्भारी
के फूल और सिम्बल के फूल तथा अन्नपान विधि मे जो रक्तपित्त नाशक शाक
कहे है, उनका भी उपयोग करे । जिन पुरुषो को शाक सात्म्य ( अनुकूल ) है
उनको इनका शाक देवे ।