भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 616 में से

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पृष्ठ 354

३४० चरकसंहिता [ अ० ४ साथ मिलाकर, खाड का योग देकर चावलो के बावन के साथ दे । इन औष- वियो को पृथक् पृथक् या सम्मिलित रूप मे मिलाकर शीत कषाय, क्वाथ, चूर्ण, फाण्ट, स्वरस के रूप मे प्रयोग करे, ये योग रक्तपित्त का शमन करते है ॥ ७३-७७ ॥ मुद्गाः सलाजाः सयवाः सकृष्णाः सोशीरमुस्ताः सह चन्दनेन । बलाजले पर्युषितः कषायो रक्त सपित्त शमयत्युदीर्णः ॥ ७८ ॥ वैडूर्यमुक्तामणिगैरिकाणा मृच्छङ्खहेमामलकोदकानाम् । मधूदकस्येक्षुरसस्य चैव पानाच्छम गच्छति रक्तपित्तम् ॥ ७९ ॥ उशीरपद्मोत्पलचन्दनाना पङ्कस्य लोष्ट्रस्य च यः प्रसादः । सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतो रक्तातिर्यागप्रशमाय देयः ॥ ८० ॥ प्रियङ्गुकाचन्दनलोध्रसारिवामधूकमुस्ताभयधातकीजलम् । समृत्प्रसाद सह षष्टिकाम्बुना सशर्कर रक्तनिबर्हण परम् ॥ ८१ ॥ ( १२ ) मूग, लाजा ( खील ), जौ, पिप्पली, खस, मोथा और चन्दन इनको रात भर बला क्वाथ मे भिगो कर प्रात. पीना चाहिये । यह तीव्र रक्तपित्त का शान्त करता है । बला-क्वाथ षडगपानीय विधि से बनाये । ( १३ ) वैडूर्य ( लहसनिया ), मोती, मणि, स्वर्ण गैरिक, मिट्टी सोरठी, शङ्ख, हेम (नागकेसर), आवला, गन्धबाला इनके चूर्ण को पानी के साथ ( इसमे घोल कर ) लेना चाहिये । अथवा शहद के शरबत को या गन्ने के रस को पीने से रक्तपित्त शान्त होता है । (१४) खस, कमल, नील कमल, लाल चन्दन इनको कूट कर रात मे पानी मे भिगो दे । प्रात. नितार कर इसमे शक्कर और मधु मिला कर दे, इसी प्रकार पके हुए मिट्टी के ढेले को तोड कर पानी मे घोल दे । इस पानी को भी मधु और शर्करा के साथ दे यह याग अति रक्त-स्राव मे उपयोगी है । [ कही २ 'लोध्र' भी पाठ है । परन्तु अष्टाग-सग्रह मे सुनी हुई मिट्टी का पाठ है ] । (१५) प्रियगु, चन्दन, लोध, अनन्तमूल, महुआ, माथा, हरड़ और धाय के फूल इनके जल को पकी हुई मिट्टी के जल के साथ मिला कर साठी चावलो के साथ खाड डाल कर पिलावे, यह रक्तपित्त का नष्ट करता है ॥ ७८-८१ ॥ कषाययोगैर्विविधैर्यथोक्तैर्दीप्तेऽनले श्लेष्मणि निर्जिते च । यद्रक्तपित्तं प्रशमं न याति तत्रानिलः स्यादनु तत्र कार्यम् ॥ ८२ ॥ छाग पयः स्यात्प्रथम प्रयोगे गव्य शृतं पञ्चगुणे जले वा । सशर्करं माक्षिकसंप्रयुक्त विदारिगन्धादिगणैः शृतं वा ॥ ८३ ॥ द्राक्षाशृतं नागरकैः शृतं वा बलाथृतं गोक्षुरकैः शृत वा ।