भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४१ सजीवक सर्षभक ससर्पिः पयः प्रयोज्यं सितया शृतं वा ॥ ८४ ॥ शतावरीगोक्षुरकैः शृतं वा शृत पयो वाऽप्यथ पर्णिनीभिः । रक्तं हिनस्त्याशु विशेषतस्तु यन्मूत्रमार्गात्सरुजं प्रयाति ॥ ८५ ॥ विशेषतो विट्पथसंग्रवृत्ते पयो हितं मोचरसेन सिद्धम् । वटावरोहैर्वटशुङ्गकैर्वा ह्रीवेरनीलोत्पलनागरैर्वा ॥ ८६ ॥ कषाययोगान्वयसा पुरा वा पीत्वा तु चाद्यात्पयसैव शालीन् । कषाययोगैरथवा विपक्वमेतैः पिबेत्सपिरतिस्रुते च१ ॥ ८७ ॥ उपरोक्त इन कषाय योगों से अग्नि के दीप्त होने पर और कफ के क्षीण हो जाने पर भी जो रक्तपित्त शान्त नहीं होता, उसमें वायु की प्रबलता समझें । इसके लिये—( १६ ) प्रथम बकरी का दूध दे अथवा गाय के दूध को पाच गुणे पानी मे पका कर अथवा स्वल्प पञ्चमूल ( विदारी गन्वादि गण ) से साधित गाय का दूध शर्करा ओर मधु के साथ दे । ( १७ ) द्राक्षा, सोंठ, बला- मूल और गोखरू इन मे से किसी एक से सिद्ध गाय के दूध का अथवा जीवक, ऋषभक और घी इनका उबाले दूध मे प्रक्षेप डाल कर मधु मिला कर दे । ( १८ ) शतावरी और गोखरू से साधित या मुद्गपर्णी, माषपर्णी, पृश्नि- पर्णी और शालपर्णी इन चारों से सावित दूध को देने से रक्तपित्त नष्ट होता है, खास कर मूत्र मार्ग से पीडा के साथ बहने वाला रक्तपित्त नष्ट होता है । (१६) गुदा मार्ग से बहने वाले रक्त के लिये—मोचरस द्वारा सिद्ध दूध देवे । ( २० ) या बरगद अङ्कुर या वटजटा से अथवा गन्धबाला, नीला कमल और सोंठ से सिद्ध दूध देना चाहिये । ( २१ ) पहिले कहे वासक आदि कषायों को दूध के साथ पीकर पीछे से दूध चावल खावे । ( २२ ) अथवा इन क्वाथों से घृत सिद्ध करके रक्त स्राव मे पीवे ॥ ८२-८७ ॥ वासा सशाखा सपलाशमूला कृत्वा कषायं कुसुमानि चास्य । प्रदाय कल्क विपचेद् घृत तत्सक्षौद्रमाश्वेव निहन्ति रक्तम् ॥ ८८ ॥ इति वासाघृतम् । पलाशवृन्तस्य रसेन सिद्धं तस्यैव कल्केन मधुद्रवं हि । लिह्याद् घृत वत्सककल्कसिद्ध तद्वत्समङ्गोत्पललोध्रसिद्धम् ॥ ८९ ॥ स्यात् त्रायमाणाविविरेष एव सोदुम्बरे चैव पटोलपत्रे । सर्पींषि पित्तज्वरनाशनानि सर्वाणि शस्तानि च रक्तपित्ते ॥ ९० ॥ घृतपाक—( १ ) वासा घृत—शाखा, मूल, फल और पत्तो समेत वासा १ 'रतिस्रवेच्च' इति च पाठ ।