भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

अ० १ ] शारीरस्थानम् २१ समय होता है । ये अथवा जो यहा पर कालजन्य रोग नहीं कहे, इन सब रोगों में निदान आदि जन्य काल को जान कर बल और काल के आने से पूर्व ही चिकित्सा करनी चाहिये । ज्वर चढने के समय से पूर्व ही चिकित्सा करनी उचित है ॥ ११३-११४ ॥ कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्तजा । रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः, स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥ ११५ ॥ काल परिणाम से बुढापा, मृत्यु, मरणरूपी स्वाभाविक रोग होते हैं । इनकी कोई चिकित्सा नहीं, क्योंकि स्वभाव का कोई उपाय नहीं है ॥ ११५ ॥ निर्दिष्टं दैवशब्देन कर्म यत्पूर्वदैहिकम् । हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ ११६ ॥ न हि कर्म महत्किंचित्फलं यस्य न भुज्यते । क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः, प्रशमं यान्ति तत्क्षयात् ॥ ११७ ॥ पूर्व शरीर में किये कर्म को 'दैव' शब्द से कहा जाता है । यह कर्म भी काल वश से रोगों का कारण होता है । ऐसा कोई भी छोटा या बड़ा कर्म नहीं है, जिसका कि फल नही भोगना पड़ता । सब कर्मों का फल भोगना ही होता है । कर्मजन्य रोगो मे चिकित्सा सफल नहीं होती । ये रोग चिकित्सा क्रिया को नष्ट करने वाले हैं । वे रोगो के कारण रूप कर्मों के क्षय होने पर ही शान्त हो जाते है ॥ ११५-११७ ॥ अत्युग्रशब्दश्रवणाच्छ्रवणात्सर्वशो न च । शब्दाना चातिहीनाना भवन्ति श्रवणाज्जडाः ॥ ११८ ॥ परुषोद्वीषणाशस्ताप्रियव्यसनसूचकैः । शब्दैः श्रवणसंयोगो मिथ्यायोग स उच्यते ॥ ११९ ॥ असंस्पर्शोऽतिमस्पर्शो हीनसंस्पर्श एव च । स्पृश्याना सग्रहेणोक्तः स्पर्शनेन्द्रियबाधक ॥ १२० ॥ यो भूतविषवातानामकालेनागतश्च यः। स्नेहशीतोष्णसस्पर्शो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२१ ॥ रूपाणां भास्वता दृष्टिविनश्यति हि दर्शनात् । दर्शनाच्चातिसूक्ष्माणां सर्वशश्चाप्यदर्शनात् ॥ १२२ ॥ दृष्टभैरवबीभत्सदूरातिश्लिष्टदर्शनात् । तामसानां च रूपाणां मिथ्यासयोग उच्यते ॥ १२३ ॥ अत्यादानमनादानमोकसात्म्यादिभिश्च यत् ।