चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ चरकसंहिता [ अ० १ रसानां विषमादानमल्पादान च दूषणम् ॥ १२४ ॥ अतिमृद्वतितीक्ष्णानां गन्धानामुपसेवनम् । असेवनं सर्वशश्च घ्राणेन्द्रियविनाशनम् ॥ १२५ ॥ पूतिभूतविषद्दिष्टा गन्धा ये चाप्यनार्तवाः । तैर्गन्धैर्घ्राणसंयोगो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२६ ॥ अति उग्र शब्दों का सुनना यह शब्द का अतियोग है, शब्द का बिल्कुल न सुनना या बहुत धीमे शब्दों को सुनना हीनयोग और कठोर, भीषण, अशुभ, अप्रिय, विपत्तिसूचक शब्दों का सुनना मिथ्यायोग है । स्पृश्य वस्तुओं का बिल्कुल स्पर्श न करना असस्पर्श, थोड़ा स्पर्श करना हीनसस्पर्श, अधिक स्पर्श करना अतिसस्पर्श, निन्दित द्रव्य विष आदि का स्पर्श वा बिना क्रम से उष्ण, शीत स्पर्श करना, स्पर्शक्रिया का मिथ्यायोग है । यह स्पर्शन इन्द्रियो के नाशक हैं । चमकीले पदार्थों को देखने से दृष्टि नष्ट हो जाती है, इसी प्रकार अतिसूक्ष्म पदाथो को देखने वा रूप को बिल्कुल न देखना भी अयोग है । इससे भी दृष्टि नष्ट हो जाती है । अप्रतिकर, भयंकर, घृणाजनक, दूर के, वा मिले पदार्थों और तामस रूपो को देखना यह रूपो का मिथ्यायोग है । रसों का अति सेवन अतियोग, सर्वथा सेवन न करना या थोड़ा सेवन करना 'अयोग' ओकसात्म्य आदि से विषम ( राशि दोष को छोड़ कर शेष आहार विधि में कहे विशेष अथ्यों को ) सेवन करना मिथ्यायोग है । अति मृदु या अल्प गन्ध वाले पदाथो का सेवन अयोग, अति तीक्ष्ण पदाथो को सूंघना अतियोग, घ्राणेन्द्रिय के नाशक पूति ( दुर्गंध ) आदि गन्धों का तथा जो ऋतु काल के गन्ध नहीं है, उन गन्धों का सूंघना मिथ्यायोग है ॥११८-१२६॥ इत्यसात्म्येन्द्रियसंयोगस्त्रिविधो दोषकोपनः । असात्म्यमिति तद्विद्याद्यन्न याति सहात्मताम् ॥ १२७ ॥ जो आत्मा के अनुकूल नही होता उसे 'असात्म्य' जाने । यह असात्म्य तीन प्रकार का है । और अर्थों का आत्मा के साथ सयोग तीन प्रकार का है । अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग । इन से दोष कुपित होते हैं ॥ १२७ ॥ मिथ्यातिहीनयोगेभ्यो यो व्याधिरुपजायते । शब्दादीना स विज्ञेयो व्याधिरैन्द्रियको बुधैः ॥ १२८ ॥ शब्द आदि इन्द्रियों से ग्राह्य विषयों के मिथ्यायोग, अयोग और अतियोग से जो व्याधि उत्पन्न होती है, उनको विद्वान् 'ऐन्द्रियक' ( इन्द्रियों से उत्पन्न