भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १ ] शारीरस्थानम् २३ हुआ रोग ) कहते हैं। [ रस को छोड़ कर सब असात्म्य विषय अपनी २ इन्द्रिय के रोग उत्पन्न करते हैं। रस सम्पूर्ण शरीर में रोग उत्पन्न करता है, यह ध्यान रखना चाहिये ] ॥ १२८ ॥ वेदनानामसात्म्यानामित्येते हेतवः स्मृताः। सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोग सुदुर्लभः ॥ १२६ ॥ यह विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) अतियोग, अयोग और मिथ्या- य ग शारीरिक एवं मानसिक दानों प्रकार के रोगों के तीन प्रकार के कारण है। असात्म्य दुःखों का कारण है। इन विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) समान योग अकेला ही सुख सञ्ज्ञक आरोग्य का कारण है। ऐसा समयोग दुर्लभ है ॥ १२६ ॥ नेन्द्रियाणि न चैवार्थाः सुखदुःखस्य हेतवः । हेतुस्तु सुखदुःखस्य योगो दृष्टश्चतुर्विध ॥ १३० ॥ न तो इन्द्रिया और न इनके विषय ही सुख दुःख का कारण हैं। जो योग सुख दुःख का कारण होता है वह चार प्रकार का है। इनमें समयोग सुख का कारण है, अतियाग, अयोग और मिथ्यायोग दुःख के कारण है ॥ १३० ॥ सन्तीन्द्रियाणि सन्त्यर्था योगो न च न चास्ति रुक् । न सुख, कारण तस्माद्याग एव चतुर्विध. ॥ १३१ ॥ क्योकि इन्द्रिया भी ह और विषय भी हैं। यदि योग चार प्रकार न हो तो न दुःख हो और न सुख हो । इसलिये अन्वय-व्यतिरेक से यह चार प्रकार का याग ही सुख-दुःख का कारण है ॥ १३१ ॥ नात्मेन्द्रियमनोबुद्धिगोचर कर्म वा विना । सुखदुःखं यथा यच्च बोद्धव्यं तत्तथोच्यते ॥ १३२ ॥ आत्मा, इन्द्रिय, बुद्धि ओर मन के बिना, इन्द्रियों के विषयों के बिना, अदृष्ट के बिना न सुख और न दुःख होता है। आत्मा आदि के होने पर जिस प्रकार से सुख दुःख होते हैं, उनको उसी प्रकार बतलाते है। [ आत्मा मे उपशय ( अनुकूलता ) होने से सुख और आत्मा में अनुपशय ( प्रतिकूलता ) हाने से दुःख होता है। अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग ये अनुपशय के कारण हैं और समयोग उपशय का कारण है ] ॥ १३२ ॥ स्पर्शननेन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च । द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः ॥ १३३ ॥