चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४७ मे परतन्त्र रहता है। यही वायु जब पित्ताशय मे पित्ताश्रित होकर रहे तब पित्त-गुल्म होता है। पक्वाशय मे स्वतन्त्र रूप से रहने पर वात-गुल्म, कफाशय मे कफ के आश्रित रहने पर कफ-गुल्म होता है ] ॥ ७ ॥ बस्तौ हि नाभ्या हृदि पार्श्वयोर्वा स्थानानि गुल्मस्य भवन्ति पञ्च । पञ्चात्मकस्य प्रभव तु तस्य वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥ ८ ॥ पाँच प्रकार के (वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य सन्निपातिक और रक्त- जन्य) गुल्मों के पाँच स्थान हैं। जैसे—बस्ति, नाभि, हृदय और दोनों पार्श्व । इन पाँचों प्रकार के गुल्मों का निदान, लक्षण और चिकित्सा आगे कहेंगे ॥ ८ ॥ रूक्षान्नपानं विषमातिमात्रं विचेष्टितं वेगविनिग्रहश्च । शोकोऽभिघातोऽतिबलक्षयश्च १ निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ९ ॥ यः स्थानसंस्थानरुजा विकल्पं विड्वातसङ्गं गळवक्त्रशोषम् । श्यावारुणत्वं शिशिरज्वरं च हृत्कुक्षिपार्श्वांसशिरोरुजं च ॥ १० ॥ करोति जीर्णेऽभ्यधिकं प्रकोपं भुक्ते मृदुत्वं समुपैति यश्च । वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्षं कषायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ११ ॥ वात-गुल्म के कारण—रूखा खानपान, अति अधिक विषम चेष्टाओं का करना, मल मूत्र के उपस्थित वेगो का रोकना, शोक, चिन्ता, मल का अतिशय क्षीण होना, भोजन का न करना (उपवास), वात-गुल्म का कारण है। वात-गुल्म के लक्षण—वात-गुल्म का कोई स्थान निश्चित नहीं रहता, कभी ऊपर, कभी उधर, न इसका कोई आकार निश्चित होता है, कभी छोटा और कभी बड़ा, न इसमें वेदना ही निश्चित रहती है, कभी अधिक वेदना होती है और कभी नहीं होती। मल और वायु का अवरोध रहता है, गला और मुख शुष्क हो जाता है। शरीर का रंग काला-लाल हो जाता है, शीत-ज्वर सा प्रतीत होता है। हृदय, कुक्षि, पार्श्व और कन्धा मे दर्द रहती है, भोजन के जीर्ण होने पर बहुत अधिक बढता है, परन्तु भोजन करने पर कम हो जाता है, ये वात गुल्म के लक्षण हैं, इस गुल्म में कषाय, तिक्त और कटु रस लाभ नहीं करते ॥ ९-११ ॥ कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहिरूक्षक्रोधातिमद्यार्कहुताशसेवा । आमाभिघातो रुधिरं च दुष्टं पैत्तस्य गुल्मस्य निमित्तमुक्तम् ॥ १२ ॥ ज्वरः पिपासा वदनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च । १ 'ऽतिबलक्षयश्च' इति च पाठः ।