चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ चरकसंहिता [ अ० ५ स्वेदो विदाहो व्रणवच्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥ १३ ॥ पित्त-गुल्म का कारण—कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, विदाहि, रूक्ष भोजनो से, क्रोध, अति मद्य, सूर्य और अग्नि के सेवन से, आमाभिघात (विदग्धाजीर्ण) से और दूषित रक्त से पित्त-गुल्म उत्पन्न होता है। पित्त-गुल्म के लक्षण—ज्वर, प्यास का लगना, शरीर का लाल वर्ण, भोजन के जीर्ण होने के समय तीव्र शूल, पसीना, विदाह, व्रण के समान गुल्म मे हाथ के स्पर्श का सहन न करना ये पैत्तिक गुल्म के लक्षण हैं ॥ १२-१३ ॥ शीत गुरु स्निग्धमचेष्टनं च सम्पूरणं प्रस्वपनं दिवा च । गुल्मस्य हेतुः कफसंभवस्य, सर्वैस्तु दुष्टै र्निचयात्मकस्य ॥ १४ ॥ स्तैमित्यशीतज्वरगात्रसाद्धल्लासकासारुचिगौरवाणि । शैत्यं रुगल्पा कठिनोन्नतत्वं गुल्मस्य रूपाणि कफात्मकस्य ॥ १५ ॥ कफ-गुल्म का कारण—शीतल, गुरु, स्निग्ध खानपान, चेष्टा या श्रम न करना, तृप्तिपूर्वक आहार, दिन मे सोना कफ गुल्म के कारण है। तीनो दोषों को दूषित करने वाले आहार विहार सान्निपातिक गुल्म को उत्पन्न करते है । कफ-गुल्म के लक्षण—स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित की भांति अनुभव ), शीत ज्वर, अंगो मे पीडा या भारीपन, वमन की इच्छा, जी मच- लना, कास, अरुचि, भारीपन, शीत प्रतीति, थोडा थोडा दर्द, गुल्म का कठिन तथा ऊपर को उठा होना ये कफजन्य गुल्म के लक्षण हैं ॥१४-१५॥ निमित्तलिङ्गान्युपलभ्य गुल्मे द्विदोषजे दोषबलाबलं च । व्यामिश्रलिङ्गानपरांस्तु गुल्मांस्त्रीनादिशेदौषधकल्पनार्थम् ॥ १६ ॥ द्विदोषजन्य गुल्म मे निदान, लक्षण ओर दोषों के बलाबल को देख कर शेष तीन द्विदोषजन्य ( वातपित्तज, पित्तकफज, वातकफज ) गुल्मों को औषध- क्रिया (चिकित्सा कार्य) मे जानना चाहिये ॥ १६ ॥ महारुजं दाहपरीतमुश्मवद्घनोन्नतं शीघ्रविदाहि दारुणम् । मनःशरीराग्निबलापहारिणं त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १७ ॥ सन्निपातजन्य गुल्म के लक्षण—अतिशय वेदनायुक्त, दाह से युक्त, पत्थर की भांति कठोर और उठा हुआ, शीघ्र विदाह को प्राप्त होने वाला (शीघ्रपाकी ), मन, शरीर और अग्नि के बल को हरने वाला त्रिदोषजन्य गुल्म है, यह असाध्य है ॥१७॥ ऋतावुनाहारतया भयेन विरूक्षणैर्वेगविनिग्रहैश्च । संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः स्त्रियं रक्तभवोऽभ्युपैति ॥ १८ ॥