भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 616 में से

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पृष्ठ 365

३५० चरकसंहिता [ अ० ५ को स्वेद देना चाहिये । स्नेहन के पीछे दिया स्वेद स्रोतो को नरम बना कर, तीव्र वायु को शान्त करके मल, वायु की रुकावट को तोड कर गुल्म को शान्त करता है । विशेषकर नाभि से ऊपर के गुल्म मे स्नेहपान हितकारी है । पक्वाशय के गुल्म मे बस्ति उत्तम है, जठराश्रित गुल्म मे स्नेहपान और बस्ति दाना उत्तम है ॥ २०-२४ ॥ दीप्तेऽग्नौ वातिके गुल्मे विबन्धेऽनिलवर्चसोः । बृंहणान्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥ पुनः पुनः स्नेहपानं निरूहाः सानुवासनाः । प्रयोज्या वातगुल्मेषु कफपित्तानुरक्षिणा ॥ २६ ॥ वातिक गुल्म मे यदि अग्नि दीप्त हो और मल और वायु का विबन्ध हो तो पुष्टिदायक स्निग्ध और उष्ण खानपान प्रयोग करने चाहिये । वात-गुल्म मे कफ और पित्त की रक्षा करते हुए बार बार स्नेहपान और निरूह तथा अनु- वासन देना चाहिये ॥ २५-२६ ॥ कफे वाते जितप्राये पित्तं शोणितमेव वा । यदि कुप्यति वा तस्य क्रियमाणे चिकित्सिते ॥ २७ ॥ यथोलबणस्य दोषस्य तत्र कार्ये भिषग्जितम् । आदावन्ते च मध्ये च मारुतं परिरक्षता ॥ २८ ॥ कफ-वात के प्राय जीत चुकने पर चिकित्सा करते हुए यदि कदाचित् पित्त या रक्त कुपित हो जाये, तो प्रवृद्ध दोष के अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये, परन्तु आदि, अन्त और मध्य सब समयो मे वायु की रक्षा करनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ वातगुल्मे कफो वृद्धो हत्वाऽग्निमरुचि यदि । हृल्लास गौरवं तन्द्रां जनयेदुल्लिखेत्तु तम् ॥ २९ ॥ वात-गुल्म मे यदि कफ बढ़ कर अग्नि को नष्ट करके अरुचि, जी मचलाना, भारीपन, तन्द्रा आदि को उत्पन्न कर दे तो वमन द्वारा कफ को बाहर निकाल देना चाहिये ॥ २९ ॥ शूलानाहविबन्धेषु गुल्मे वातकफोल्बणे । वर्त्तयो गुलिकाश्चूर्णं कफवातहरं हितम् ॥ ३० ॥ वात-कफ गुल्म मे शूल, आनाह और विबन्ध होने पर कफ-वात नाशक वर्त्तियो, गोलियो और चूर्णो का प्रयोग करे । वे बडी हितकारी हैं ॥ ३० ॥ पित्तं वा यदि संवृद्धं संतापं वातगुल्मिनः ।