चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५१ कुर्याद्विरेच्यः स भवेत्स्नेहैरेवानुलोमिकैः ॥ ३१ ॥ गुल्मो यद्यनिलादीनां कृते सम्यग्भिषग्जिते । न प्रशाम्यति रक्तस्य सोऽवसेकात् प्रशाम्यति¹ ॥ ३२ ॥ वातगुल्म रोगी म यदि पित्त बढ़कर सन्ताप को उत्पन्न कर दे, तो अनुलोमन प्रभाव वाले स्नेहो द्वारा विरेचन करना चाहिये । [ इसके लिये एरण्ड का तेल देना चाहिये । ] । वात आदि दोषो की चिकित्सा भली प्रकार करने पर भी यदि गुल्म शान्त न हो तो यह समझ कर कि रक्त दूषित है, रक्त अथात् रक्तमोक्षण करे उससे वह शान्त हो जाता है ॥ ३१-३२ ॥ स्निग्धोष्णेनोदिते गुल्मे पैत्तिके स्रंसनं हितम् । रूक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम् ॥ ३३ ॥ पित्ते वा पित्तगुल्मे वा ज्ञात्वा पक्वाशयस्थितम् । कालविन्निर्हरेत्सद्यः सतिक्तैः क्षीरबस्तिभिः ॥ ३४ ॥ पयसा वा सुखोष्णेन सतिक्तेन विरेचयेत् । भिषगग्निवलापेक्षी सर्पिषा तैल्वकेन वा ॥ ३५ ॥ स्निग्ध, उष्ण कारणो से उत्पन्न पैत्तिक गुल्म मे स्रंसन ( मृदु विरेचन ) हितकारी है । रूक्ष और उष्ण कारणो से उत्पन्न गुल्म मे घी का पान औषध उत्तम है । [ स्रंसन के लिये—कमीले के चूर्ण को मधु के साथ, अगूर का रस और हरड़ का गुड के साथ पीना चाहिये । रूक्ष-उष्ण से उत्पन्न गुल्म के लिये—तिक्तक घृत, वासा घृत, पञ्चतृण मूल से साधित घृत या दूध देना चाहिये । ] पित्त गुल्म या पित्त यदि पक्वाशय मे स्थित हो तो समय का जानने वाला वैद्य तिक्त द्रव्यो से साधित दूध की बस्तियो से इसको शान्त करे अथवा अग्नि के बल को देखकर तिक्त द्रव्यो से युक्त गरम दूध पिलाकर अथवा तैल्वक घृत से विरेचन देवे । [ तैल्वक घृत का वर्णन उदर-रोग मे करेंगे । ] ॥ ३३-३५ ॥ तृष्णाज्वरपरीदाहशूलस्वेदाग्निमार्दवे । गुल्मिनामरुचौ चापि रक्तमेवावसेचयेत् ॥ ३६ ॥ छिन्नमूला विदह्यन्ते न गुल्मा यान्ति च क्षयम् । रक्तं हि व्यम्लतां याति तच्च नास्ति न चास्ति रुक् ॥ ३७ ॥ हृतदोषं परिम्लानं जाङ्गलैस्तर्पितं रसैः । समाश्वस्तं सशेषार्ति सर्पिरभ्यासयेत् पुनः² ॥ ३८ ॥ १ 'रक्तेन संस्रुतेनोपशाम्यति' इति च पाठ. । २ 'सर्पिषा पुनराचरेत्' इति च पाठः ।