चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३५२ चरकसंहिता [ अ० ५ रक्तपित्तातिवृद्धत्वात् क्रियामनुपलभ्य च । यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्र तत्र भिषग्जितम् ॥ ३९ ॥ तृष्णा, अरुचि, ज्वर, दाह, स्वेद और अग्निमन्दता होनेपर गुल्म-रोगियो मे ( विदाह के पूर्वरूप होने पर ही ) रक्तमोक्षण करे । रक्तमोक्षण से जड के कट जाने पर विदाह नही होता, गुल्म नष्ट हो जाते है । चूंकि रक्त ही विदग्ध होता हे, जब कारण ( रक्त ) ही नही रहेगा तो रोग भी नही रहेगा । रक्त मोक्षण के कारण सुरझाये रोगी को जागल पशु-पक्षियो के मास-रस से तर्पण करे । इसको सान्त्वना दे । शेष रोग की शान्ति के लिये बार-बार घी का सेवन करावे । रक्त ओर पित्त अति प्रवृत्ति होने से अथवा चिकित्सा के न करने से यदि गुल्म मे विदाह हो जाय तो शस्त्र-कर्म करे, यही औषध है ॥ ३६-३६ ॥ गुरुः कठिनसंस्थानो गूढमासोत्तराश्रयः । अविवर्णः स्थिरः स्निग्धो ह्यपक्को गुल्म उच्यते ॥ ४० ॥ अपक्व गुल्म के लक्षण—गुरु, कठोर आकृति वाला, गम्भीर, मास मे छिपा, त्वचा के समान वर्ण का स्थिर, स्निग्ध ( चिकना ) होता है ॥ ४० ॥ दाहशूलार्ति १संक्षोभस्वप्ननाशारतिज्वरैः । विदह्यमान जानीयाद् गुल्म तमुपनाहयेत् २ ॥ ४१ ॥ विदह्यमान गुल्म के लक्षण—दाह, शूल, पीड़ा, सक्षोभ ( कीड़ियो के चलने का सा अनुभव ), नीद का न आना, बेचैनी, ज्वर का होना, ये गुल्म के पकते समय के लक्षण है । इस अवस्था मे उपनाह पुल्टिस आदि बाधनी चाहिये ॥ ४१ ॥ विदाहलक्षणे गुल्मे बहिस्त्वङ्गे समुन्नते । श्यावे सरक्तपर्यन्ते सस्पर्शे बस्तिसन्निभे ॥ ४२ ॥ निपीड़ितोन्नते स्तब्धे सुप्ते तत्पार्श्वपीड़नात् । तत्रैव पिण्डिते शूने संपक गुल्ममादिशेत् ॥ ४३ ॥ तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ । वैद्याना कृतयोगानां व्यधशोधनरोपणे ॥ ४४ ॥ पक्व गुल्म के लक्षण—गुल्म मे पक्वव्रण के लक्षण, दर्द का न होना, झुर्रियो का आ जाना, खाज आदि, गुल्म मास को छोड़कर त्वचा मे पृष्ठवर्ती हो जाये, उभरा हो, बीच मे से श्यामवर्ण, किनारो से लाल, स्पर्श मे बस्ति के समान ( एक ओर से दबाने पर तरंग दूसरी ओर अनुभव होती हो ), दबाने से दब जाये, परन्तु दबाव हटाने पर फिर उठ जाये, सुप्त ( बढे नही ), पार्श्व १ 'शूलानि' इति च पाठः । २ 'समुपना-' इति च पाठः ।