भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५६ गुल्म, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, गुदाशूल, योनिशूल, ग्रहणी, अर्शारोग, प्लीहा, पाण्डु रोग, अरुचि, छाती मे रुकावट ( कफावरोध- ), कास, हिचकी, श्वास और गलग्रह मे उपयोगी है। [ चिकित्सा-कलिका मे पिप्पली मूल और विड नमक का भी मिश्रेन किया है। अन्त. प्रयोगो मे अजमोदा से यमानिका ( अजवायन ) लेनी चाहिये । बाह्य प्रयोग मे अजमोदा से अजमोद लेनी चाहिये । ] ॥ ७६-८३ ॥ भावित मातुलुङ्गस्य चूर्णमेतद्रसेन वा ॥ ८४ ॥ बहुशो गुड़िकाः कार्याः कार्मुकाः स्युस्ततोऽधिकम् । इति हिग्वादिचूर्णं गुटिका च । मातुलुङ्गरसो हिगु दाडिमं विडसैन्धवे ॥ ८५ ॥ सुरामण्डेन पातव्य वातगुल्मरुजापहम् । ( ८ ) हिग्वादि गुटिका—इस हिग्वादि चूर्ण का बिजौरे के रस से [ सात बार या जब तक चूर्ण खट्टा न हो जाय तब तक ] भावना देकर गोलिया बनावे । य गोलिया चूर्ण से आवक काम करती है । ( ९ ) वात-गुल्म की पीड़ा को शान्त करने के लिये बिजोर का रस, हींग, अनारदाना और बिड नमक इनको सुरा मण्ड के साथ पीवे ॥ ८४-८५ ॥ शटीपुष्करहिग्वम्लवेतसक्षारचित्रकान् ॥ ८६ ॥ धान्याकं च यवानीं च विडङ्गं सैन्धवं वचाम् । सचव्यपिप्पलीमूलमजगन्धा सदाडिमाम् ॥ ८७ ॥ अजाजीं चाजमोदां च चूर्ण कृत्वा प्रयोजयेत् । रसेन मातुलुङ्गस्य मधुयुक्तेन वा पुनः ॥ ८८ ॥ भावत गुाडका कृत्वा सुपिष्टा कोलसंमिताम् । गुल्मं प्लीहानमानाहं श्वासं कासमरोचकम् ॥ ८६ ॥ हिक्कां हृद्रोगमर्शांसि विविधा शिरसो रुजाम् । पाण्ड्वामयं कफोल्क्लेशं सर्वजां च प्रवाहिकाम् ॥ ९० ॥ पार्श्वहृद्बस्तिशूलं च गुटिकैषा व्यपोहति । ( १० ) शट्यादि वटी—कचूर, पुष्करमूल, हींग, अम्लवेतस, चीता, यवाखार, धनिया, अजवायन, वायविडंग, सेन्धा नमक, वच, चविका, पिप्पली- मूल, अजगन्धा, अनारदाना, जीरा, अजमोदा [ वन-यमानी ], इनके चूर्ण को बिजौरे के रस की अथवा मधु-शुक्त की भावना देकर बेर के समान आकार की गोलिया बना लेनी चाहियें। यह गुल्म, प्लीहा, आनाह, श्वास, कास,