चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० चरकसंहिता [ अ० ५ अरुचि, हिचकी, हृदय-रोग, अर्श नाना प्रकार की शिरोवेदना, पाण्डु-रोग, कफ का उत्क्लेश [ जी मचलाना ], त्रिदोषजन्य प्रवाहिका, पार्श्व-शूल, हृदयशूल, बस्तिशूल को नष्ट करता है। [ मधु-शुक्त बनाने के लिये मधु के बर्त्तन मे जम्बीर (नीम्बू) का रस और पिप्पली-मूल की कल्क डाल कर सन्धान कर देना चाहिये । ] ॥ ८६-६०- ॥ नागरार्धपलं पिष्ट्वा द्वे पले लुञ्चितस्य च ॥ ६१ ॥ तिलस्यैकं गुडपलं क्षीरेणोष्णेन वा पिबेत् । वातगुल्ममुदावर्त्तं योनिशूलं च नाशयेत् ॥ ६२ ॥ पिबेदेरण्डतैलं१ वा वारुणीमण्डमिश्रितम् । तदेव तैलं पयसा वातगुल्मी पिबेन्नरः ॥ ६३ ॥ श्लेष्मण्यनुबले पूर्वं हितं पित्तानुगे परम् । ( ११ ) नागरादि योग—सोठ आधा पल ( ३ कर्ष ), साफ किये तिल २ पल, गुड़ एक पल इनको कूट कर मात्रा मे गरम दूध से पीना चाहिये । यह वात-गुल्म, उदावर्त्त और योनिरोग को नष्ट करता है। अथवा एरण्ड तैल को वारुणी-मण्ड मे मिलाकर पीवे । इससे वातगुल्म का आराम होता है। जब कफ का अनुबन्ध हो तो पूर्वयोग और पित्त का अनुबन्ध हो तो पिछला योग बरते ॥ ६१-६३ ॥ साधयेत् शुद्धशुष्कस्य२ लशुनस्य चतुष्पलम् ॥ ६४ ॥ क्षीरे जलाष्टगुणिते क्षीरशेषं च ना पिबेत् । वातगुल्ममुदावर्त्त गृध्रसी विषमज्वरम् ॥ ६५ ॥ हृद्रोग विद्रधिं शोथ सावयत्याशु तत्पयः । इति लशुनक्षीरम् । ( १२ ) लशुन-क्षीर—सूखे और छिलके उतार कर साफकिये लशुन की गिरिया ४ पल लेकर इनको जल मिश्रित आठ गुने दूध ( ३२ पल ) मे सिद्ध करे, केवल दूध रह जाने पर इसको पीवे । इससे वातगुल्म, उदावर्त्त गृध्रसी, विषम ज्वर, हृदय रोग, विद्रधि और शोथ शीघ्र शान्त होते है। [ यद्यपि दूध और लशुन विरोधी है, परन्तु तो भी रोग की महत्ता के कारण तथा आर्ष शास्त्र के प्रयोगवश उपयोग करना चाहिये । ] ॥ ६४-६५ ॥ तैलं प्रसन्ना गोमूत्रमारनालं यवाग्रजम् ॥ ६६ ॥ १, 'पिबेदैरण्डक तैल' इति वा । २, 'सिद्धशुष्कस्य' इति च पाठः ॥