भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

३६० चरकसंहिता [ अ० ५ अरुचि, हिचकी, हृदय-रोग, अर्श नाना प्रकार की शिरोवेदना, पाण्डु-रोग, कफ का उत्क्लेश [ जी मचलाना ], त्रिदोषजन्य प्रवाहिका, पार्श्व-शूल, हृदयशूल, बस्तिशूल को नष्ट करता है। [ मधु-शुक्त बनाने के लिये मधु के बर्त्तन मे जम्बीर (नीम्बू) का रस और पिप्पली-मूल की कल्क डाल कर सन्धान कर देना चाहिये । ] ॥ ८६-६०- ॥ नागरार्धपलं पिष्ट्वा द्वे पले लुञ्चितस्य च ॥ ६१ ॥ तिलस्यैकं गुडपलं क्षीरेणोष्णेन वा पिबेत् । वातगुल्ममुदावर्त्तं योनिशूलं च नाशयेत् ॥ ६२ ॥ पिबेदेरण्डतैलं१ वा वारुणीमण्डमिश्रितम् । तदेव तैलं पयसा वातगुल्मी पिबेन्नरः ॥ ६३ ॥ श्लेष्मण्यनुबले पूर्वं हितं पित्तानुगे परम् । ( ११ ) नागरादि योग—सोठ आधा पल ( ३ कर्ष ), साफ किये तिल २ पल, गुड़ एक पल इनको कूट कर मात्रा मे गरम दूध से पीना चाहिये । यह वात-गुल्म, उदावर्त्त और योनिरोग को नष्ट करता है। अथवा एरण्ड तैल को वारुणी-मण्ड मे मिलाकर पीवे । इससे वातगुल्म का आराम होता है। जब कफ का अनुबन्ध हो तो पूर्वयोग और पित्त का अनुबन्ध हो तो पिछला योग बरते ॥ ६१-६३ ॥ साधयेत् शुद्धशुष्कस्य२ लशुनस्य चतुष्पलम् ॥ ६४ ॥ क्षीरे जलाष्टगुणिते क्षीरशेषं च ना पिबेत् । वातगुल्ममुदावर्त्त गृध्रसी विषमज्वरम् ॥ ६५ ॥ हृद्रोग विद्रधिं शोथ सावयत्याशु तत्पयः । इति लशुनक्षीरम् । ( १२ ) लशुन-क्षीर—सूखे और छिलके उतार कर साफकिये लशुन की गिरिया ४ पल लेकर इनको जल मिश्रित आठ गुने दूध ( ३२ पल ) मे सिद्ध करे, केवल दूध रह जाने पर इसको पीवे । इससे वातगुल्म, उदावर्त्त गृध्रसी, विषम ज्वर, हृदय रोग, विद्रधि और शोथ शीघ्र शान्त होते है। [ यद्यपि दूध और लशुन विरोधी है, परन्तु तो भी रोग की महत्ता के कारण तथा आर्ष शास्त्र के प्रयोगवश उपयोग करना चाहिये । ] ॥ ६४-६५ ॥ तैलं प्रसन्ना गोमूत्रमारनालं यवाग्रजम् ॥ ६६ ॥ १, 'पिबेदैरण्डक तैल' इति वा । २, 'सिद्धशुष्कस्य' इति च पाठः ॥

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६१ गुल्मं जठरमानाहं पीतमेकत्र साधयेत् । इति तैलपञ्चकम् । ( १३ ) तैल-पञ्चक—एरण्ड तैल, प्रसन्ना, गोमूत्र, काजी और यवक्षार इनको उचित मात्रा में पीने से गुल्म, जठर और आनाह रोग नष्ट होते हैं । पञ्चमूलीकषायेण सक्षीरेण शिलाजतु ॥ ९७ ॥ पिबेत्तस्य प्रयोगेण वातगुल्मात्प्रमुच्यते । इति शिलाजतुप्रयोगः । ( १४ ) शिलाजतु-प्रयोग—पञ्चमूल क्वाथ में दूध मिलाकर इसके साथ शिलाजतुका प्रयोग करने से वातगुल्म नष्ट होता है। [ यहा पर बृहत्पञ्चमूल लेना चाहिये । ] ॥ ९७ ॥ वाट्यं यूषेण पिप्पल्या मूलकानां रसेन वा ॥ ९८ ॥ भुक्त्वा स्निग्धमुदावर्ताद्वातगुल्माद्विमुच्यते । शूलानाहविबन्धार्त्तं स्वेदयेद्वातगुल्मिनम् ॥ ९९ ॥ स्वेदैः स्वेदविधावुक्तैर्नाडीप्रस्तरसङ्करैः । ( १५ ) स्नेहयुक्त जौ के अन्न को मूंग आदि के यूष के साथ, अथवा पिप्पली प्रधान यूष के साथ, अथवा मूली के रस के साथ खाने से उदावर्त्त और वातगुल्म रोग शान्त होते हैं । ( १६ ) वातगुल्म में यदि शूल, आनाह और विबन्ध हो तो स्वेदाध्यायमे कहे नाड़ी-स्वेद, प्रस्तर-स्वेद और संकर स्वेद देने चाहिये ॥ ९८-९९ ॥ बस्तिकर्म परं विद्याद् गुल्मघ्नं तद्धि मारुतम् ॥ १०० ॥ स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति । तस्मादभीक्ष्णशो गुल्मी निरूहैः सानुवासनैः ॥ १०१ ॥ प्रयुज्यमानैः शाम्यन्ति वातपित्तकफात्मकाः । गुल्मघ्ना विविधा दृष्टाः सिद्धाः सिद्धिषु वस्तयः ॥ १०२ ॥ इति बस्तिक्रिया । गुल्म को नष्ट करने के लिये बस्तिकर्म अतिशय उत्कृष्ट है । चूंकि यह कर्म पक्वाशय में वायु का शमन करके गुल्म को नष्ट करता है । इसलिये बारबार निरूह और अनुवासन बस्तियों के प्रयोग से वात-पित्त-कफजन्य गुल्म शान्त हो जाते हैं । सिद्धिस्थान में फलप्रद गुल्मनाशक बस्तियों का उपदेश किया है ॥ १००-१०२ ॥ गुल्मघ्नानि च तैलानि वक्ष्यन्ते वातरोगिके । तानि मारुतगुल्मेषु पानाभ्यङ्गाऽनुवासनैः ॥ १०३ ॥

३६२ चरकसंहिता [ अ० ५

प्रयुक्तान्याशु सिध्यन्ति तैल ह्यनिलजित् परम् । वात-व्याधि चिकित्सा मे गुल्मनाशक तैलो को कहेगे । यह तैल वातगुल्मों मे पान अभ्यग और अनुवासन के रूप मे प्रयोग करने से फलदायक होते है । क्योंकि वात के शमन के लिये तैल श्रेष्ठ औषध है ॥ १०३-॥ नीलिनीचूर्णसंयुक्तं पूर्वोक्तं घृतमेव च ॥ १०४ ॥ समलाय प्रदेयं स्याच्छोधनं वातगुल्मिने । नीलिनीत्रिवृतादन्तीपथ्याकम्पिल्लकैः सह ॥ १०५ ॥ शोधनार्थं घृतं देयं सबिडक्षारनागरम् । नीलिनी त्रिफला रास्त्रा बला कटुकरोहिणीम् ॥ १०६ ॥ पचेद्विडङ्गं व्याघ्रीं च पलिकानि जलाढके । तेन पादावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १०७॥ दघ्नः प्रस्थेन संयोज्य सुधाक्षीरपलेन च । ततो घृतपलं दद्याद् यवागूमण्डसंश्रितम् ॥ १०८ ॥ जीर्णे सम्यग्विरिक्तं च भोजयेद् रसभोजनम् । गुल्मकुष्ठोदरव्यङ्गशोफपाण्ड्वामयज्वरान् ॥ १०९ ॥ श्वित्रं प्लीहानमुन्मादं घृतमेतद् व्यपोहति । इति नीलिन्याद्यं घृतम् । (१७) वातगुल्म रोगी के पेट मे मल हो तो शोधन के लिये पूर्व कथित त्र्यूषणादि-घृत मे नीलिनी का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । (१८) नीलि- न्याद्य घृत—नीलिनीमूल, निशोथ, दन्तीमूल, हरड, कमीला इनसे साधित घी मे [ घृत की अपेक्षा चौगुना पानी मिला कर ] बिड नमक, यवक्षार और सोठ मिला कर विरेचन के लिये देना चाहिये । अथवा त्र्यूषणादि घृत मे इनका चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । (१६) नीलिन्याद्य घृत (२)—गाय का घी १ प्रस्थ, नीलिनी मूल, त्रिफला, रास्ना, खरैटी, कुटकी, वायविडंग, कटेरी इनको एक एक पल लेकर १ आढक पानी मे पकाना चाहिये । चतुर्थांश शेष रहने पर घी और दही १ प्रस्थ, सेहुण्ड का दूध १ पल मिला कर घी पकाना चाहिये । इस घी की एक पल मात्रा (आज कल १ तोला) को यवागू के मण्ड मे मिला कर देवे । इसके जीर्ण हो जाने पर और रोगी को विरेचन हो जाने पर मास रस का भोजन देवे । इस घी से गुल्म, कुष्ठ, उदर-रोग, व्यङ्ग, शोफ, पाण्डु रोग, ज्वर, श्वित्र, प्लीहा और उन्माद रोग नष्ट होते हैं ॥१०४-१०६॥ कुक्कुटाश्च मयूराश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकाः ॥ ११० ॥ शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ।

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६३ हितमुष्णं द्रवं स्निग्धं भोजनं वातगुल्मिनाम् ॥ १११ ॥ समण्डवारुणीपानं पक्वं वा धान्यकैर्जलम् । मन्देऽग्नौ वर्धते गुल्मो दीप्ते चाग्नौ प्रशाम्यति ॥ ११२ ॥ तस्मान्ना नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घनम् १ । सर्वत्र गुल्मे प्रथमं स्नेहस्वेदोपपादिते ॥ ११३ ॥ या क्रिया क्रियते सिद्धिं सा याति न विरूक्षिते । वातगुल्म में पथ्य—मुर्गा, मोर, तीतर, कौंच, वत्तक, ( बटेर ), शालि चावल, मदिरा, घी ये सब वस्तुयें वातगुल्म में औषध है। वातगुल्म के रोगी के लिये उष्ण द्रव और स्निग्ध भोजन हितकारी है। अथवा मण्डयुक्त वारुणी का पीना या धनेने से ( षडङ्गपानीय विधि से ) पकाये जल का उपयोग उत्तम है। अग्नि के मन्द होने पर गुल्म बढ़ता है, अग्नि के बढ़ जाने पर गुल्म शान्त हो जाता है। इसलिये पुरुष को चाहिये कि न तो बहुत तृप्त होकर ( पेट भरकर ) भोजन करे और न लङ्घन ही करे। मात्रा में थोडा खावे । सब गुल्म में प्रथम स्नेहन और स्वेदन करने पर फिर जो भी क्रिया की जाती है, वह अवश्य सफल होती है। रूक्ष ( वात-प्रकोप की ) अवस्था में की हुई क्रिया फलवती नहीं होती ॥११०-११३॥ भिषगात्ययिकं बुद्ध्वा पित्तगुल्ममुपाचरेत् ॥ ११४ ॥ वैरेचनिकसिद्धेन पयसा सर्पिषाऽपि वा । वैद्य को चाहिये कि पित्तगुल्म को घातक समझकर शीघ्र उपचार करे। इसके लिये विरेचक वस्तुओं से सिद्ध हुए दूध या घी का प्रयोग करे ॥११४-॥ रोहिणीकटुकानिम्बमधुकं त्रिफलात्वचः ॥ ११५ ॥ कार्षिका त्रायमाणा च पटोलत्रिवृतोः पले । द्विपलं च मसूराणां साध्यमष्टगुणेऽम्भसि ॥ ११६ ॥ शृताच्छेषं घृतसमं सर्पिषश्च चतुष्पलम् । पिबेत्सन्मूर्च्छितं तेन गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः ॥ ११७ ॥ ज्वरस्तृष्णा च शूलं च भ्रमो मूर्च्छाऽरुचिस्तथा । इति रोहिण्याद्यं घृतम् ॥ (१) रोहिण्याद्य घृत—कुटकी, नीम की छाल, मुलहठी, हरड़, बहेड़ा, आंवला की बकली, त्रायमाणा प्रत्येक १ कर्ष, पटोल और निशोथ एक-एक पल, मसूर २ पल इनको घी से आठ गुणे जल में पकावे। अष्टमांश ( ४ पल ) १ 'तस्मादन्नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घितम्' इति च पाठः ।

३६४ चरकसंहिता [अ० ५ शेष रहने पर छान ले । इसको चार पल घी के साथ रोगी को दे । इससे पैत्तिक गुल्म शान्त होता है, और ज्वर, प्यास, शूल, श्रम, मूर्च्छा और अरुचि नष्ट होती है । [आजकल २ पल क्वाथ और २ पल घी वरते ।] ॥११५-११७॥ जले दशगुणे साध्यं त्रायमाणाचतुष्पलम् ॥ ११८॥ पञ्चभागस्थितं पूतं कल्कैः संयोज्य कार्षिकैः । रोहिणी कटुका मुस्ता त्रायमाणा दुरालभा ॥ ११९ ॥ कल्कैस्तामलकीवीराजीवन्तीचन्दनोत्पलैः । रसस्यामलकाना च क्षीरस्य च घृतस्य च ॥ १२०॥ पलानि पृथगष्टाष्टौ दत्त्वा सम्यग्विपाचयेत् । पित्तरक्तभवं गुल्मं विसर्पं पैत्तिक ज्वरम् ॥ १२१ ॥ हृद्रोग कामला कुष्ठ हन्यादेतद् घृतोत्तमम् । इति त्रायमाणाद्य घृतम् । ( २ ) त्रायमाणाद्यघृत—त्रायमाणा ४ पल, पानी दस गुना ( चालीस पल ) लेकर पकाना चाहिये । पञ्चमांश ( ८ पल ) रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे कुटकी, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा, तामलकी ( भूई आंवला ), वीरा ( क्षीरकाकोली, शतावरी या शालिपर्णी ), जीवन्ती, चन्दन, नीला कमल प्रत्येक एक एक कर्ष लेकर इनका कल्क, आवले का रस ८ पल, दूध ८ पल, घी ८ पल लेकर सब से घृत सिद्ध करे । यह घृत पित्त-रक्तजन्य गुल्म, वीसर्प, पित्तजन्य ज्वर, हृदय रोग, कामला और कुष्ठ को नष्ट करता है ॥ ११८-१२१ ॥ रसेनामलकेक्षूणां घृतप्रस्थं १ विपाचयेत् ॥ १२२ ॥ पथ्यापादं पिबेत्सर्पिस्तत्सिद्धं पित्तगुल्मनुत् । इत्यामलकाद्यं घृतम् । ( ३ ) आमलकाद्यघृत—आवले का रस या क्वाथ ८ प्रस्थ, गन्ने का रस ८ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, और हरड का कल्क १ शराव ( ८ पल ) लेकर घृत पकाना चाहिये । यह घी पित्त गुल्म को नष्ट करता है ॥ १२२- ॥ द्राक्षा मधूकं खर्जूरं विदारी सशतावरीम् ॥ १२३ ॥ परूषकाणि त्रिफला साधयेत्पलसंमिताम् । जलाढके पादशेष रसमामलकस्य च ॥ १२४ ॥ घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् । साधयेत्तद् घृत सिद्धं शर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ १२५ ॥ १ 'घृतपादं' इति च पाठः ।

अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५

अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५ प्रयोगात्पित्तगुल्मघ्नं सर्वपित्तविकारनुत् । इति द्राक्षाद्यं घृतम् । (४) द्राक्षाद्यघृत—मुनक्का, महुवा, पिण्डखर्जूर, विदारीकन्द, शतावरी, फालसा, त्रिफला, इनको एक-एक पल लेकर २ आढक जल मे क्वाथ करे । (२ प्रस्थ) रहने पर छान ले । इसमे आवले का रस दो प्रस्थ, ईख का रस २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, ओर घी २ प्रस्थ मिलावे । कल्क‌ार्थ हरड़ ८ पल ले । इनके द्वारा घृत पकावे । शीतल होने पर इसमे चतुर्थांश शर्करा और मधु (मिलित) मिलाकर प्रयोग करे । यह पित्त गुल्म ओर पैत्तिक रोगो को नष्ट करता है १ ॥ १२३-१२५- ॥ वृषं समूलमापोथ्य पचेदष्टगुणे जले ॥ १२६ ॥ शेषेऽष्टभागे तस्यैव पुष्पकल्कं प्रदापयेत् । तेन सिद्धं घृतं शीतं सक्षौद्रं पित्तगुल्मनुत् ॥ १२७ ॥ रक्तपित्तज्वरश्वासकासहृद्रोगनाशनम् । इति वासाघृतम् । (५) वासाघृत—जड समेत वासा (अडूसा) को लेकर इसको कुचल कर आठ गुणे पानी म क्वाथ करे । जब अष्टमाश रह जाये तब छान कर वासा के फूलो का कल्क मिला कर घी सिद्ध करे । घी के ठण्डा होने पर मधु मिलावे यह घृ पित्त-गुल्म, रक्त पित्त, ज्वर, श्वास, कास और हृदय-रोग का नष्ट करता है। [यह वासा-घृत रक्तपित्त के वासा-घृत से पृथक् है। इसलिये उसे चतुर्गुण पानी मे सिद्ध किया है। अष्टागसग्रहकार दोनो का एक ही माना है ] ॥ १२६-१२७ ॥ द्विपलं त्रायमाणाया जलद्विप्रस्थसाधितम् ॥ १२८ ॥ अष्टभागस्थितं पूतं कोष्ण क्षीरसमं पिबेत् । पिबेदुपरि तस्योष्णं क्षीरमेव यथाबलम् ॥ १२६ ॥ तेन निर्हृतदोषस्य गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः । (६) त्रायमाणा का दो पल लेकर ४ प्रस्थ (६४ पल) पानी मे पकावे, अष्टमाश रहने पर इसको छान कर कोसा होने पर इसमे समान मात्रा दूध को मिलावे, इसको पीकर ऊपर से शक्ति-अनुसार गरम दूध पीवे । इससे विरेचन होने पर पैत्तिक गुल्म शान्त हो जाता है । [अष्टागसग्रह मे त्रायमाणा से ही दूध को सिद्ध करके प्रयोग करना लिखा है ] ॥ १२८-१२६- ॥ १. महुवे के स्थान पर मधुक पाठ मे मुलहठी अर्थ होगा ।

३६६ चरकसंहिता [ अ० ५

द्राक्षाभयारस गुल्मे पैत्तिके सगुडं पिवेत् ॥ १३० ॥ लिह्यात्कम्पिल्लकं वाऽपि विरेकार्थं मधुद्रवम् । (७) पित्त-गुल्म मे विरेचन के लिये द्राक्षा और हरड के क्वाथ में गुड मिलाकर अथवा कमीले को मधु मे मिलाकर चाटे ॥ १३० ॥ दाहप्रशमनोऽभ्यङ्गः सर्पिषा पित्तगुल्मिनाम् ॥ १३१ ॥ चन्दनाद्येन तैलेन तैलेन मधुकस्य वा । (८) पित्त-गुल्म म अभ्यंग के लिये घी ( शतधौत या सहस्रधौत ), चन्दनाद्य तैल, या मुल्हठी के क्वाथ ओर कल्क से सिद्ध तैल का उपयोग करे । इससे दाह की शान्त होती है ॥ १३१ ॥ ये च पित्तज्वरार्ताना सतिक्ताः क्षीरवस्तयः ॥ १३२ ॥ हितास्ते पित्तगुल्मिभ्यो वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु । पित्त-गुल्म मे बस्तिया—पित्तज्वर के रागियों के लिये तिक्त द्रव्यो से सिद्ध दूध की जो बस्तिया कही है, ओर जिन बस्तियों को सिद्धि-स्थान मे आगे कहेंगे उनका पित्त-गुल्म मे प्रयाग करे ॥ १३२ ॥ शालयो जाङ्गल मास गव्याज्ये पयसी घृतम् ॥ १३३ ॥ खर्जूररामलकं द्राक्षा दाडिम सपरूषकम् । आहारार्थे प्रयोक्तव्य पानार्थं सलिलं शृतम् ॥ १३४ ॥ बलाविदारिगन्धाद्यैः पित्तगुल्मचिकित्सितम् । आहार के लिये शालि वान्य, जागल मास, गाय और बकरी के घी और दूध, खजूर, आवला, द्राक्षा, अनारदाना, फालसा, इनको भोजन के लिये दे और पीने के लिये बला और विदारीगन्वादि स्वल्प पञ्चमूल से षडंग पानीय विधि द्वारा साधित जल पीने के लिये देवे, यह पित्तगुल्म की चिकित्सा है ॥ १३३-१३४ ॥ आमान्वये पित्तगुल्मे सामे वा कफवातके ॥ १३५ ॥ यवागूभिः खडैर्यूषैः संधुक्ष्योऽग्निर्बिलङ्घिते । शमप्रकोपौ दोषाणा सर्वेषामग्निसंश्रितौ ॥ १३६ ॥ तस्मादग्नि सदा रक्षेन्निदानानि च वर्जयेत् । पित्तगुल्म मे यदि आम का अनुबन्ध हो, या आमयुक्त कफ अथवा आमयुक्त वायु का ससर्ग हो तो प्रथम लघन कराके यवागुओ द्वारा और खड यूषो से अग्नि का प्रदीपन करे । सब दोषो का शमन और प्रकोप अग्नि के ऊपर ही निर्भर करता है । इसलिये सदा अग्नि की रक्षा करनी चाहिये और निदाना ( कारणों) का परित्याग करना चाहिये ॥ १३५-१३६- ॥

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७ वमनार्हाय वमनं प्रदद्यात्कफगुल्मिने ॥ १३७ ॥ स्निग्धस्विन्नशरीराय ल्मे शैथिल्यमागते । परिवेष्ट्य प्रदीप्तांस्तु बल्वजानथवा कुशान् ॥ १३८ ॥ भिषक्कुम्भे समावाप्य गुल्मं घटमुखे क्षिपेत् । सगृहीतो यदा गुल्मस्तदा घटमथोद्धरेत् ॥ १३६ ॥ वस्त्रान्तरं ततः कृत्वा भिन्द्याद् गुल्मं प्रमाणवित् । विमार्गार्जं यदा पश्येद्यथालाभं प्रपीडयेत् ॥ १४० ॥ मृद्नीयाद् गुल्ममेवैकं न त्वत्र हृदयं स्पृशेत् । कफ-गुल्म की चिकित्सा— ( १ ) कफ-गुल्म का रोगी यदि वमन के योग्य हो तो उसको वमन देवे । स्नेहन और स्वेदन क्रिया से गुल्म को शिथिल बना कर इसको वस्त्र से लपेट देवे । फिर एक घड़े ( घटीयन्त्र) में जलते हुए बल्वज ( तृणविशेष ) और कुशाओं को डाल देवे और घड़े के मुख को गुल्म पर लगा देवे, उससे गुल्म घड़े के मुख की ओर खींचा जाकर पकड़ा जाता है [ वायु के निकल जाने से शून्य स्थान बनने से यन्त्र गुल्म को खींच लेता है, यन्त्र में से वायु निकालने के लिये जलती घास यन्त्र में रक्खी जाती है । आग के बुझने पर परन्तु गरम रहने पर यन्त्र को लगावे ] । जिस समय गुल्म पकड़ा जाये, उस समय घटीयन्त्र को उतार ले । इस गुल्म को वस्त्र से दाबकर प्रमाण का समझने वाला वैद्य चीर देवे, अब विमार्ग, अजपद और आदर्श इनमें से जो भी मिले उस से इसको दबावे जिससे दोष निकल जाय, गुल्म का ही मर्दन पीड़न करे । हृदय पर किसी प्रकार का आघात ( रक्तक्षय से या भय से ) नहीं आने देवे । [ आज कल यह कार्य कपिंग से किया जाता है । घास के स्थान पर स्पिरिट का उपयोग किया जाता है 'विमार्ग' चमारों का यन्त्र है । इसमें वे चमडे को सीधा काटते हैं । इसको राफडी कहते हैं । 'अजपद' बकरी के पैर के समान लकडी का बना यन्त्र होता है । ] ॥ १३७-१४०-॥ तिलैरण्डातसीबीजसर्षपैः परिलिप्य च ॥ १४१ ॥ श्लेष्मगुल्ममयःपात्रैः सुखोष्णैः स्वेदयेद्भिषक् । ( २ ) कफज गुल्म पर तिल, एरण्डबीज, अलसी, सरसो इन का लेप करके सुहाते हुए गरम लोहे के पात्रों से सेक करे ॥ १४१ ॥ सव्योषक्षारलवणं दशमूलीशृतं घृतम् ॥ १४२ ॥ कफगुल्मं जयत्याशु सहिङ्गुबिडदाडिमम् । इति दशमूलीघृतम् ।

३६८ चरकसंहिता [ अ० ५ ( ३ ) दशमूली घृत—दशमूली के क्वाथ से और त्रिकटु, यवक्षार, सैन्धा नमक, हींग, बिड नमक, और अनारदाना इनके कल्क से साधित घी के प्रयोग से कफगुल्म शान्त होता है । कोई २ वैद्य दशमूल का कल्क भी डालते हे । [ श्री गगाधर सेन ने अनार का छिलका डालना लिखा है । ] ॥ १४२- ॥ भल्लातकाना द्विपलं पञ्चमूलं पलोन्मितम् ॥ १४३ ॥ साध्यं विदारिगन्धाद्यमापोथ्य सलिलाढके । पादशेषे रसे तस्मिन् पिप्पली नागरं वचाम् ॥ १४४ ॥ विडङ्ग सैन्धवं हिङ्गु यावशूकं बिड यटीम् । चित्रक मधुकं रास्त्रा पिष्ट्वा कर्षसम भिषक् ॥ १४५ ॥ प्रस्थ च पयसः कृत्वा घृतप्रस्थ विपाचयेत् । एतद्भल्लातकघृत कफगुल्महर परम् ॥ १४६ ॥ प्लीहापाण्ड्वामयश्वासग्रहणीरोगकासनुत् । इतिभल्लातकाद्यं घृतम् । ( ४ ) भल्लातकाद्यघृत—भिलावा १ पल, विदारीगन्धादि स्वल्प पचमूल ( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी गोखरू, कटेरी, बडी कटेरी ), एक पल, पानी दो आढक, हींग, यवक्षार बिड नमक, कचूर, चीता, मुलहठी, रास्त्रा प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनका कल्क बनाये, घी २ प्रस्थ मिलाकर घृत-पाक करे । यह भल्ला- तक घृत कफ-गुल्म नाशक, प्लीहा, पाण्डुरोग, श्वासरोग, ग्रहणी राग, और का · को नष्ट करता है । [ मात्रा २ मासे से ४ मासा । ] ॥ १४३-१४६ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ॥ १४७ ॥ पलिकैः सयवक्षारैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् । क्षारप्रस्थेन १ तत्सर्पिर्हन्ति गुल्म कफात्मकम् ॥ १४८ ॥ ग्रहणीपाण्डुरोगघ्न प्लीहकासज्वरापहम् । इति पञ्चकोलघृतम् । ( ५ ) पञ्चकाल घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक, सोठ ओर यवक्षार प्रत्येक एक पल, घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ इनसे यथाविवि घृत पाक करे । यह घृत कफ-गुल्म ग्रहणी रोग, पाण्डु रोग, प्लीहा, कास, और ज्वर को नष्ट करता ह । [ इसका 'क्षीरषट्पल घृत' भी कहते हे । ] ॥१४७-१४८॥ त्रिवृता त्रिफला दन्ती दशमूलं पलोन्मितम् ॥ १४६ ॥ जले चतुर्गुणे पक्त्वा चतुर्भांगस्थितं रसम् । १ 'क्षीरप्रस्थ च' इति वा पाठः ।

अ० ५ ] २४ चिकित्सितस्थानम् ३६६

अ० ५ ] २४ चिकित्सितस्थानम् ३६६

सर्पिरैरण्डजं तैल क्षीरं चैकत्र साधयेत् ॥ १५०॥ स सिद्धो मिश्रकस्नेहः सक्षौद्रः कफगुल्मनुत् । कफवातविबन्धेषु कुष्ठप्लीहोदरेषु च ॥ १५१ ॥ प्रयोज्यो मिश्रकः स्नेहो योनिशूलेषु चाधिकम् । इति मिश्रकः स्नेहः । ( ६ ) मिश्रक स्नेह—निशोथ, त्रिफला, दन्तीमूल दशमूल प्रत्येक वस्तु एक-एक पल, इनको चार गुणे जल ( ६० पल ) मे पका कर चतुर्थांश ( १५ पल ) शेष रखे । इसमे क्वाथ के समान ( १५ पल ) प्रत्येक घी, ऐरण्ड तैल, दूध मिलाकर सिद्ध करना चाहिये । इस स्नेह को मधु के साथ मिलाकर प्रयोग करे । कफ-गुल्म, कफ-वातजन्य विबन्ध, कुष्ठरोग, प्लीहारोग, उदररोग और योनिरोगो मे विशेष रूप से इसका प्रयोग करे । [ श्री चक्रपाणि दूध को क्वाथ के समान लेने को कहते है, तथा घी ओर एरण्ड तैल को इस मिलित द्रवाश से चतुर्थांश लेने का आदेश करते है। अष्टाङ्ग-सग्रह मे क्वाथ के लिये सोलह गुणा जल लेकर सोलहवा भाग शेष रखने का वचन है । ] ॥१४६-१५१॥ यदुक्तं वातगुल्मघ्नं स्रंसनं नीलिनीघृतम् ॥ १५२ ॥ द्विगुण तद्विरेकार्थं प्रयोज्य कफगुल्मिनाम् । ( ७ ) वात-गुल्म मे जा नीलिनी घृत विरेचन के लिये कहा है, उसी को दुगुनी मात्रा मे कफ-गुल्म मे विरेचन के लिये बरते ॥१५२॥ सुधाक्षीरद्रवे चूर्ण त्रिवृतायाः सुभावितम् ॥ १५३ ॥ कार्षिकं मधुसर्पिर्भ्यां लीढ्वा साधु विरिच्यते । ( ८ ) निसात के चूर्ण को सेहुण्ड के दूध मे भली प्रकार भावना देकर एक कर्ष मात्रा [ आजकल ४ से ६ रत्ती ] मधु और घी के साथ खाना चाहिये । इससे भली प्रकार विरेचन होता है ॥१५३॥ जलद्रोणे विपक्तव्या विंशतिः पञ्च चाभयाः ॥ १५४॥ दन्त्याः पलानि तावन्ति चित्रकस्य तथैव च । अष्टभागस्थितं तं च रस पूतमधिक्षिपेत् ॥ १५५ ॥ दन्ती समं गुडं पूतं क्षिपेत्तत्राभयाश्च ताः । तैलार्धकुडवं चैव त्रिवृतायाश्चतुष्पलम् ॥ १५६ ॥ चूर्णितं पलमेकं च पिप्पलीविश्वभेषजम् । तत्साध्यं लेहवच्छीते तस्मिंस्तैलसमं मधु ॥ १५७ ॥

३७० चरकसंहिता [ अ० ५ क्षिपेच्चूर्णपलं चैकं त्वगेलापत्रकेशरात् । ततो लेहपलं लीढ्वा जग्ध्वा चैकां हरीतकीम् ॥ १५८ ॥ सुखं विरिच्यते स्निग्धो दोषप्रस्थमनामयः । गुल्मं श्वयथुमर्शांसि पाण्डुरोगमरोचकम् ॥ १५६ ॥ हृद्रोगं ग्रहणीदोषं कामलां विषमज्वरम् । कुष्ठं प्लीहानमानाहमेषा हन्त्युपयोजिता ॥ १६० ॥ निरत्ययः क्रमश्चास्या द्रवो मांसरसौदनः । इति दन्तीहरीतकी । (८) दन्ती-हरीतकी—२५ हरडो को एक पोटली मे ढीला बाघकर, दन्तीमूल २५ पल लेकर दो द्रोण पानी मे पकावे । जब अष्टमाश (४ प्रस्थ) शेष रह जाय तब छान लेवे इसमे २५ पल गुड मिलाकर छान ले । इसमे अब हरड़ो को छोड़ दे फिर हरड़ो को निकाल कर गुठली निकाल दे । इन हरडो को ४ पल तिल तैल मे भून कर गुड मिश्रित क्वाथ मे मिला दे। इसमे निशोथ का चूर्ण ४ पल, पिप्पली और सोठ एक पल मिलाकर मन्द २ आच पर पकावे । जब लेह तय्यार हो जाय तब नीचे उतार कर तैल के समान शहद (४ पल), दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेसर का मिलित चूर्ण १ पल मिलावे । इसमे से एक पल अवलेह चाट कर और एक हरड को खाने से सुखपूर्वक विरेचन होता है । नीरोग और स्निग्ध पुरुष मे एक प्रस्थ दोष बाहर आता है । गुल्म, सूजन, अर्श, पाण्डुरोग, अरुचि, हृदयरोग, ग्रहणी- रोग, कामल', विषम ज्वर, कुष्ठ, प्लीहा, आनाह इससे नष्ट होते है । इसका सेवन निर्दोष है । इसका पथ्य मास रस और भात है । मास रस इतना हो जिससे भात पतला बन जाये । [ यहा पर प्रस्थ १३।। पल का समझे । वमन, विरेचन और शोणित-मोक्षण मे १३३ पल का एक प्रस्थ बतलाया गया है ] ॥ १५४-१६० ॥ सिद्धाः सिद्धिषु वक्ष्यन्ते निरूहाः कफगुल्मिनाम् ॥ १६१ ॥ अरिष्टयोगाः सिद्धाश्च ग्रहण्यार्शश्चिकित्सिते । यच्चूर्णं गुटिका याश्च विहिता वातगुल्मिनाम् ॥ १६२ ॥ द्विगुणक्षारहिङ्ग्वम्लवेतसास्ताः कफे मताः । य एव ग्रहणीदोषे क्षारास्ते कफगुल्मिनाम् ॥ १६३ ॥ सिद्धा निरत्ययाः शस्ता दाहस्त्वन्ते प्रशस्यते । कफ गुल्म मे प्रयोग करने योग्य निरूह बस्तियो का सिद्धि-स्थान मे कहेगे ।

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७१

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७१ फलप्रद अरिष्ट प्रयोगो का ग्रहणी तथा अर्शरोग की चिकित्सा मे कहेगे । जो चूर्ण ओर गुटिकाये वातगुल्म मे कही है, उनमे यवक्षार, हीग और अम्लवेतस की मात्रा को दुगुना करके (शेष चूर्ण को उसी परिमाण मे ) कफ-गुल्म मे प्रयोग करे । ग्रहणी राग मे जो क्षार कहे है, उनको कफ-गुल्म मे प्रयोग करे, ये क्षार निर्दोष ओर प्रशस्त है । जब किसी भी चिकित्सा से लाभ न हो तभी अन्त मे दाहकर्म करे ॥ १६१-१६३ ॥ प्रपुराणानि धान्यानि जाङ्गला मृगपक्षिणः ॥ १६४ ॥ कौलत्थो मुद्गयूपश्च पिप्पल्या नागरस्य च । शुष्कमूलकयूपश्च बिल्वस्य वरुणस्य च ॥ १६५ ॥ चिरबिल्वाङ्कुराणां च यवान्याश्चित्रकस्य च । बीजपूरकहिङ्ग्वम्लवेतसक्षारदाडिमैः ॥ १६६ ॥ तक्रेण तैलसर्पिर्भ्यां व्यञ्जनान्युपकल्पयेत् । पञ्चमूलीशृतं तोयं पुराणं वारुणीरसम् ॥ १६७ ॥ कफगुल्मी पिबेत्काले जीर्णं माध्वीकमेव वा । यवानीचूर्णितं तक्रं बिडेन लवणीकृतम् ॥ १६८ ॥ पिबेत्सद्दीपनं वातमूत्रवर्चोऽनुलोमनम् । आहार—तीन चार वर्ष पुराने धान्य, जागल पशु-पक्षिया का मास, कुलथी, मूग का यूप, पिप्पली का यूप, सोंठ का यूप, सूखी मूली का यूष, बेलगिरी, वरुण, करज के अकूर, अजवायन और चित्रक का यूष कफ-गुल्म मे उत्तम है। बिजौरा, हींग, अम्लवेतस, क्षार, अनारदाना, छाछ, तैल और घी इनके साथ व्यजन ( सूप शाक आदि ) बनावे । कफ-गुल्म रोगी को प्यास लगने पर स्वल्प पञ्चमूल से सिद्ध किया पानी या पुरातन वारुणी ( ताड़ वा खजूर का मद्य ) अथवा पुरातन माध्वीक ( मधु, महुवे, अगूर के रस से बना मद्य ) पीने के लिये दे । तक्र मे अजवायन का चूर्ण और बिड नमक मिलाकर पीवे । यह तक्र अग्निदीपक, वायु, मल, मूत्र का अनुलोमन करती है ॥ १६४-१६८ ॥ संचितः क्रमशो गुल्मो महावास्तुपरिग्रहः ॥ १६९ ॥ कृतमूलः सिरानद्धो यदा कूर्म इवोन्नतः । दौर्बल्यारुचिहृल्लासकासवम्यरतिज्वरैः ॥ १७० ॥ तृष्णातन्द्राप्रतिश्यायैर्यंयुज्यते न स सिध्यति । गृहीत्वा सज्वरश्वासं वम्यतीसारपीडितम् ॥ १७१ ॥ हृन्नाभिहस्तपादेषु शोफः कर्षति गुल्मिनम् ।

असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर

३७२ चरकसंहिता [ अ० ५ असाध्यता—जो गुल्म धीरे-धीरे बढ़ कर बड़े भारी स्थान को घेर लेता है, जिसने जड़ पकड़ ली हो, सिराओ से व्याप्त, कछुुए के समान ऊपर को उठा हुआ, दुर्बलता, अरुचि, जी मचलाना, कास, वमन, बेचैनी, ज्वर, प्यास, तन्द्रा, प्रतिश्याय से युक्त होता है, वह गुल्म असाध्य हे । ज्वर, श्वास, वमन और अतीसार से पीड़ित गुल्म रोगी के हृदय, नाभि ओर हाथ पाव मे शोथ हो जाय ता रोगी की मृत्यु हा जाती है। यह शोथ उसका पीडित करता है ॥ १६६-१७१ ॥ रोधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे ॥ १७२ ॥ स्निग्धस्विन्नशरीराय दद्यात्स्नेहविरेचनम् । रक्त-गुल्म की चिकित्सा—( १ ) गर्भकाल अथोत् दस मास व्यतीत हो जाने पर गर्भवती के शरीर का स्नेहन और स्वेदन करके [ घृत आदि को ] स्निग्ध विरेचन दे । जैसे—एरण्ड तैल ॥ १७२ ॥ पलाशक्षारपात्रे१ द्वे द्वे पात्रे तैलसर्पिषोः ॥ १७३ ॥ गुल्मशैथिल्यजननीं पक्त्वा मात्रां प्रयोजयेत् । ( २ ) पलाश-क्षार यमक—तिल तैल २ पात्र ( २ आढक ), घी २ पात्र, पलाश क्षारादक [ ढाक की भस्म को ६ गुने पानी मे २१ वार परिस्रुत करके तय्यार किया क्षारादक ] चार आढक लेकर स्नेह पाक करे । जब झाग उठ जाये और आकृति फटे दूध के समान हो जाये तब स्नेहपाक समझे । इस यमक की मात्रा रागिणी का पिलावे इससे गुल्म शिथिल हो जाता है । [ मात्रा ३ मासा ] ॥ १७३- ॥ प्रभिद्येत न यद्येवं दद्याद्योनिविशोधनम् ॥ १७४ ॥ क्षारेण युक्तं पललं सुधाक्षीरेण वा पुनः । आभ्यां वा भावितन्दद्याद्योनौ कटुकमत्स्यकान् ॥ १७५ ॥ वराहमत्स्यपित्ताभ्यां लक्तकान् वा सुभावितान् । अधोहरैश्चोर्ध्वहरैर्भावितान् वा समाक्षिकैः२ ॥ १७६ ॥ किण्वं वा सगुडक्षारं दद्याद्योनिविशोधनम् । रक्तपित्तहरं क्षारं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १७७ ॥ लशुनं मदिरा तीक्ष्णा मत्स्यांश्चास्यै प्रदापयेत् । बस्ति सक्षीरगोमूत्रं सक्षारं दाशमूलिकम् ॥ १७८ ॥ १ 'पादे' इति च पाठ. । २ 'समाक्षिकान्' इत च पाठ ॥

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३७३ अदृश्यमाने रुधिरे दद्याद् गुल्मप्रभेदनम् । प्रवर्त्तमाने रुधिरे दद्यान्मांसरसौदनम् ॥ १७९ ॥ घृततैलेन चाभ्यङ्ग पानार्थं तरुणीं सुराम् । रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु रक्तपित्तहराः क्रियाः ॥ १८० ॥ कार्या वातरुगार्ता याः सर्वा वातहराः पुनः । घृततैलावसेकाश्च तित्तिरींश्चरणायुधान् ॥ १८१ ॥ सुरा समण्डा पूर्वा च पानमम्लस्य सर्पिषः ॥ १८२ ॥ प्रयोजयेदुत्तर वा जीवनीयेन सर्पिषा । अतिप्रवृत्ते रुधिरे सतिकेनानुवासनम् ॥ १८३ ॥ ( ३ ) यदि इस प्रकार से गुल्म का भेदन न हो तो योनि-शोधन करावे । इसके लिये ( १ ) क्षार से युक्त तिल-कल्क या सेहुण्ड के दूध से युक्त तिल- कल्क अथवा क्षार और सेहुण्ड के दूध से भावित कटु मछलियो ( शफरी मछली ) को योनि मे रखे । [ यहा पर तिल-कल्क न लेकर मास ( छुछुन्दरी या मूषक ) का प्रयोग करना अच्छा है । श्रीगगाधर की भी यही मान्यता है, क्षार मे पलाशक्षार या यवक्षार बरते । ] ( २ ) पिचुओ ( फाया ), को सूअर या मछली के पित्तो से अच्छी प्रकार भावना देकर अथवा मधु-युक्त विरेचन द्रव्यो या मधु-मिश्रित वमन-द्रव्या से पिचुओ को भावित करके योनि मे रखे । ( ३ ) योनि के शोधन के लिये किण्व ( सुरा-बीज ) को गुड और पलाश- क्षार मे मिला कर योनि मे रखे । रक्तपित्तनाशक क्षार ( नीलोत्पल क्षार ) मधु और घी के साथ चटावे । ( ४ ) अन्नपान मे—लहसुन, तीक्ष्ण मदिरा, मछलिया देवे । दूध, गोमूत्र और क्षार से युक्त दशमूल क्वाथ की उत्तर बस्ति देवे । ( ५ ) यदि योनि से रक्त स्रावित न हो तो गुल्म को फाडने की चिकित्सा करे । यदि रक्त योनि से बहता हो ता मास रस और चावल दे, घी और तैल की मालिश करे, पीने के लिये सुरा दे । रक्त के अधिक बहने पर रक्तपित्त नाशक क्रिया करे । वातव्याधि हा ता वातनाशक चिकित्सा करे । घी और तैल का परिषेक, तीतर, मुर्गे के मास-रस का भोजन, सुरा, मण्ड- युक्त सुरा, अम्ल रस द्रव्यो से युक्त घी का पान करावे । रक्त के अधिक बहने पर जीवनीय गण से साधित घृत की उत्तर बस्ति देवे । तिक्त घृत से

३७४ चरकसंहिता [ अ० ५ अनुवासन दे, अथवा तिक्त द्रव्यों से युक्त जीवनीय घृत से अनुवासन करावे ॥ १७४-१८३ ॥ तत्र श्लोकाः—स्नेहः स्वेदः सर्पिश्शूर्णानि बृंहणं गुडिकाः । वमनविरेकौ मोक्षः क्षतजस्य च वातगुल्मवताम् ॥ १८४ ॥ सर्पिः सतिक्तसिद्ध क्षीर प्रस्रंसनं निरूहाश्च । रक्तस्य चावसेचनमाश्वामनसमनयोगाः ॥ १८५ ॥ उपनाहनं सशस्त्र पक्वस्याभ्यन्तरप्रभिन्नस्य । संशोधनसंशमने पित्तप्रभवस्य गुल्मस्य ॥ १८३ ॥ स्नेहः स्वेदो भेदो लङ्घनमूल्लेखनं विरेकश्च । सर्पिर्बस्तिर्गुडिकाश्चूर्णमरिष्टाश्च सक्षाराः ॥ १८७ ॥ गुल्मस्यान्ते दाहः कफजस्याग्रेऽपनीतरक्तस्य । गुल्मस्य रौधिरस्य क्रियाक्रमः स्त्रीभवस्योक्तः ॥ १८८ ॥ पथ्यान्नपानसेवाहेतूनां वर्जनं यथास्वं च । नित्यं चाग्निसमाधिः स्निग्धस्य च सर्वकर्माणि ॥ १८९ ॥ हेतुर्लिङ्गं सिद्धिः क्रियाक्रमः साध्यतानुयोगाश्च । गुल्मचिकित्सितसंग्रह एतावानग्निवेशस्य ॥ १९० ॥ वात-गुल्म मे—स्नेह, स्वेद, घृत, चूर्ण, बृं हण गुटिकाये, वमन, विरेचन, रक्त-मोक्षण करे । पित्त गुल्म मे—तिक्त द्रव्यो से सिद्ध घृत, दूध, विरेचन, निरूह, रक्तमोक्षण, आश्वासन, सशमनीय योग, उपनाहन, पकने पर शस्त्र-क्रिया, अन्तः गुल्म के प्रभिन्न होने पर सशोवन और समशन चिकित्सा करे । कफ- गुल्म मे—स्नेहन, स्वेदन, भेदन, लघन, वमन, विरेचन, घृत, बस्तिया, गुटिका, चूर्ण, अरिष्ट-पान, क्षार-प्रयोग, रक्तभाक्षण और अन्त मे दाह करना यह चिकित्सा-क्रम है । स्त्रियो मे होने वाले रक्त-गुल्म का चिकित्सा-क्रम कह दिया है । पथ्यकारी खान-पान, रोग के अपने कारण का परित्याग, नित्य अग्नि की रक्षा, गुल्म-रागी को स्नेहन देकर पश्चात् सब कायो का करना, गुल्म का हेतु, लक्षण, चिकित्साविधि, साध्यासाध्यता और योग इतना गुल्म की चिकित्सा का सग्रह अग्निवेश ने बतलाया है ॥ १८४-१९० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने गुल्मचिकित्सित नाम पञ्चमोऽध्याय समाप्तः ॥ ५ ॥

अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७५ षष्ठोऽध्यायः अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब प्रमेह की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥१-२॥ निर्मोहमानानुशयो निराशः पुनर्वसुर्ज्ञानतपोविशालः । कालेऽग्निवेशाय सहेतुलिङ्गानुवाच मेहान् शमनं च तेषाम् ॥ ३ ॥ आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि । नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ ४ ॥ निर्मोह, निरभिमानी, तृणारहित, आकाक्षारहित, महाज्ञानी, महातपस्वी पुनर्वसु ने उचित समय पर अग्निवेश का प्रमेह, उसके कारण, लक्षण और चिकित्सा का उपदेश दिया । कफ-प्रमेह का निदान—सुख का जीवन बिताना ( चलना फिरना नही ), आराम तलबी मे लेटे रहना, दही, ग्राम्य, औदक ( जलचर ) जन्तु और आनूप ( जल-प्रधान ) देश के पशु-पक्षिया का मास-रस, दूध, नूतन खान-पान ( नवीन अनाज ओर नूतन मद्य ), गुड से बने पदार्थों का अति सेवन तथा अन्य कफकारक पदार्थ कफ-प्रमेह को उत्पन्न करते है ॥३-४॥ मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतं प्रदूष्य । करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ ५ ॥ क्षीणेपु दोषेष्ववकृष्य बस्तौ धातून्प्रमेहाननिलः करोति । दोषो हि बस्ति समुपत्य मूत्रं संदूष्य मेहाञ्जनयेद्यथास्वम् ॥ ६ ॥ सम्प्राप्ति—( १ ) दूषित कफ-मेद, मास और शारीरिक क्लेद को दूषित करके वस्ति मे पहुच कर प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( २ ) उष्ण द्रव्यों से प्रवृद्ध और कुपित पित्त मेद आदि को दूषित करके पैत्तिक प्रमेहो को उत्पन्न करता है । ( ३ ) कफ-पित्त दोषो के क्षीण होने पर वायु, मज्जा, वसा, ओज ओर लसीका को बस्ति मे लाकर प्रमेह को उत्पन्न करता है । ( ४ ) दूषित दाष बस्ति मे पहुच कर मूत्र को दूषित बनाकर अपने अपने लक्षणो वाले प्रमेहों को उत्पन्न करते है ॥ ५-६ ॥

३७६ चरकसंहिता [अ० ६

साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षट् याप्या, न साध्याः पवनाच्चतुष्काः ।
समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ७ ॥
कफः सपित्तः पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः ।
मज्जारसौजः पिशितं च दूष्यं प्रमेहिणा विंशतिरेव मेहाः ॥ ८ ॥
(१) सम क्रिया होने से कफजन्य दस प्रमेह साध्य है, (२) विषम
क्रिया होने से पित्तजन्य छः प्रमेह याप्य है और (३) महात्यय अर्थात् बहुत
आपत्तिकारक होने से वातजन्य चार प्रमेह असाध्य है ।
(१) समक्रिय—जो ओषधिया दूष्य, मेद, मज्जा, लसीका आदि को शान्त
करते है, वे ही ओषधिया कफ को भी शान्त करती है, इसलिये इनकी क्रिया
समान है। (२) विषमक्रिय—जो ओषधिया कटु, तिक्त आदि मेद, मज्जा
को कम करती है, वे पित्त को बढाती है, और जो मधुर आदि रस पित्त को
शान्त करते है, वे इनको बढाते है, इसलिये विषम क्रिया है। (३)
महात्यय—मज्जा, ओज, लसीका आदि महान् धातुओ का इसमे क्षय होता है ।
स्निग्ध चिकित्सा जो वायु को शमन करती है, इनको बढाती है। रूक्ष चिकित्सा
वायु को बढाती है। इसलिये ये असाध्य है¹।
प्रमेह मे कफ, पित्त और वायु ये तीन दोष है, मेद, रक्त, शुक्र, आप्य
(जलीय भाग) वसा, लसीका, मज्जा, रस, ओज और मास ये दूष्य हे ।
प्रमेहियो के बीस प्रकार के ही प्रमेह होते है ॥ ७–८ ॥
जलोपमं चेक्षुरसोपमं वा घनं घनं चोपरि विप्रसन्नम् ।
शुक्लं सशुक्रं शिशिरं शनैर्वा लालेव वा बालुकया युतं वा ॥ ९ ॥
विद्यात्प्रमेहान्कफजान्दशैतान्
दस प्रकार के कफजन्य प्रमेह—(१) जिसमे मूत्र जल के समान हो
(उदक-मेह), २–गन्ने के रस के समान हो (इक्षुमेह), ३–मूत्र घना हो
(सान्द्रमेह), ४–जिसमे मूत्र नीचे घना और ऊपर स्वच्छ हो (सान्द्रप्रसाद
प्रमेह), ५–मूत्र श्वेत हो (शुक्लमेह), ६–शुक्रमिश्रित मूत्र हो (शुक्रमेह),
७–मूत्र शीतल हो (शीतमेह), ८–मूत्र का वेग धीमा हो (शनैर्मेह), ९–मूत्र
लार के समान हो (लालामेह), १०–मूत्र बालुका के कणों से युक्त हो
(सिकतामेह), इन दस प्रमेहो को कफ से उत्पन्न हुआ जाने ॥ ६-॥
__________________________________________________________________
१ प्रमेह मे दोष ओर दूष्य की समानता का होना ही सुखसाध्यता का
लक्षण है। ज्वर मे ऋतु और दोष की समानता, प्रमेह मे दोष और दूष्य की
समता तथा रक्तगुल्म मे पुरातनता ये सुखसाध्यता के चिह्न कहे जाते है ।

अ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७

अ० ६ ] \hspace{150pt} चिकित्सितस्थानम् \hspace{150pt} ३७७ \hspace{100pt} क्षारोपमं कालमथापि नीलम् । हारिद्रमाञ्जिष्ठमथापि रक्तमेतान्प्रमेहान्षडुशन्ति पैत्तान् ॥ १० ॥ \hspace{20pt} पित्तजन्य छ प्रमेह—( १ ) क्षार के समान 'क्षारमेह', ( २ ) काले वर्ण का मूत्र 'कालमेह', ( ३ ) नीलेवर्ण का मूत्र 'नीलमेह', ( ४ ) हल्दी के समान वर्ण का मूत्र 'हारिद्रमेह', ( ५ ) मजीठ के वर्ण का 'माञ्जिष्ठमेह', ( ६ ) लालवर्ण का 'रक्तमेह', ये छ. पित्तजन्य प्रमेह है ॥ १० ॥ मज्जौजसा वा वसयाऽन्वित वा लसीकया वा सतन विबद्धम् । चतुर्विधं मूत्रयतीह वाताच्छ्लेषेषु धातुष्वपकर्षितेषु ॥ ११ ॥ वर्णं रस स्पर्शमथापि गन्ध यथास्वदोष भजते प्रमेहः । श्यावारुणो वातकृतः सशूलो मज्जादिसाद्गुण्यमुपैत्यसाध्यः ॥ १२ ॥ \hspace{20pt} चार प्रकार के वातिक प्रमेह—( १ ) मजामेह, ( २ ) ओजामेह, ( ३ ) वसामेह ओर ( ४ ) लसीकामेह ( जिसमे लसीका की तारे निकलती है ) ये चार प्रमेह आरम्भक धातुओ ( मज्जा, ओज आदि ) के क्षीण होने पर होते है । अथवा पित्त और कफ की अपेक्षाकृत न्यूनता होने से प्रमेह होते है । \hspace{20pt} प्रमेह मे अपने वात आदि दोषो के अनुसार वर्ण, रस, स्पर्श अथवा गन्ध होता है । असाध्य वातजन्य प्रमेह मे श्याव, अरुण, शूलयुक्त तथा मज्जा, वसा, लसीका या ओज के समान गुण होता है ॥११-१२॥ स्वेदोऽङ्गगन्धः शिथिलाङ्गता तु शय्यासनस्वप्नसुख रतिश्च । हृन्नेत्रजिह्वाश्रवणोपदेहा घनाङ्गता केशनखातिवृद्धिः ॥ १३ ॥ शीतप्रियत्व गलतालुशोषो माधुर्यमास्ये करपाददाहः । भविष्यतो मेहगदस्य रूपं मूत्रेऽभिधावन्ति पिपीलिकाश्च ॥ १४ ॥ \hspace{20pt} पूर्वरूप—पसीना, शरीर से गन्ध का आना, अगा मे शिथिलता, लेटने, बैठने और सोने मे प्रीति, हृदय, नेत्र, जीभ और कान मे मैल का आना, शरीर मे मोटापा, केश, नखो का अधिक बढना, शीत की चाह, गला और तालु का शुष्क होना, मुख मे मधुरता, हाथ और पाव के तलुवे मे जलन, मूत्र पर ( मधुरता से ) चिउटियो का आना, ये प्रमेह के पूर्वरूप है ॥ १३-१४ ॥ स्थूलः प्रमेही बलवानिहैंकः कृशस्तथैकः परिदुर्बलश्च । संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १५ ॥ \hspace{20pt} प्रमेह रोगी दो प्रकार के हैं। जैसे एक स्थूल और बलवान्, दूसरा कृश तथा दुर्बल शरीर का। इनमे से कृश व्यक्ति का बृं हण करना चाहिये और प्रबल दोष ओर अधिक बलवान् पुरुष मे सशोधन करना चाहिये । चिकित्सा

३७८ चरकसंहिता [ अ० ६ दो प्रकार की है, सशोधन और सशमनी। इनमे जिन पुरुषो की माता-पिता के द्वारा जन्म से प्रमेह होता है वे कृश होते है और जिन को अधिक खाने से वा स्निग्ध भोजन से होता है, वे बलवान् होते है। [ दो प्रकार के प्रमेह होते है (१) सहज, और (२) अपथ्य से उत्पन्न। माता-पिता के बीजदोष से उत्पन्न 'सहज' है, प्रतिकूल आहार से उत्पन्न 'अपथ्यज' होता है। प्रथम प्रकार का प्रमेही कृश, अल्पभोजी और प्यास बहुत अनुभव करता है। दूसरे प्रकार का प्रमेही स्थूल, बहुत खानेवाला, सेज पर पडे रहने वाला, आलसी होता है। [ सुश्रुत।]॥ १५॥ स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय। ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ॥ १६॥ उपचार—(१) स्निग्ध रोगी के मल के सशावन के लिये कल्पस्थान ने वर्णित नाना प्रकार के यागा का प्रयाग करे। इसके लिये वमन और विरेचन का प्रयाग करे। वमन और विरेचन द्वारा मल निकल जाने पर प्रमेह मे सन्तर्पण ही कर। स्नेहन के लिये सरसा, अलसी, इगुदी आदि के तैल हो या प्रियग्वादि गण से सिद्ध घृत आदि से स्नेहन कर ॥ १६ ॥ गुल्मः क्षयो मेहनबस्तिशूलं मूत्रग्रहश्चाप्यपतर्पणेन । प्रमेहिणः स्युः परिबृंहणानि १ कार्याणि तस्य प्रसमीक्ष्य वह्निम् ॥१७॥ संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया सशमनी प्रयोज्या । मन्थाः कषाया यवचूर्णलेहाः प्रमेहशान्त्यै लघवश्च भक्ष्याः ॥ १८ ॥ ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषा रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः । यवौदनं रूक्षमथापि वाट्यं मद्यात्ससक्तूनपि चायपूपान् ॥ १६ ॥ मुद्गादियूषैरथ तिक्तशाकैः पुराणशाल्योदनमाददीत । दन्तीङ्गुदीतैलयुत प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम् ॥ २० ॥ सषष्टिकं स्यात्तृणधान्यमन्न यवप्रधानस्तु भवेत्प्रमेही । यवस्य भक्ष्यान्विविधास्तथाऽद्यात्कफप्रमेही मधुसप्रयुक्तान् ॥२१॥ निशिस्थिताना त्रिफलाकषायैः स्युस्तर्पणाः क्षौद्रयुता यवानाम् । तान्सीधुयुक्तान्पिबेत्प्रमेही प्रायोगिकान्मेहवधार्थमेव ॥ २२॥ (२) प्रमेह-रोगी को अपतर्पण कराने से गुल्म, क्षय, मूत्रेन्द्रिय वा बस्ति मे शूल, मूत्रग्रह (मूत्र का कम आना) हो जाता है। इसके लिये रोगी की अग्नि देखकर बृंहण चिकित्सा करे। १ 'परितर्पणानि' इति च पाठ ।

अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६

अ० ६ ] चिकित्सितस्थानम् ३७६ ( ३ ) जो प्रमेह रोगी सशोधन के योग्य न हो उसके लिये सशमनी चिकित्सा करे । उसको प्रमेह की शान्ति के लिये—मन्थ, कषाय, जौ, चूर्ण, अवलेह और लघु भक्ष्य पदार्थों का सेवन करावे । ( ४ ) विष्किर, प्रतुद पक्षियो का तथा जागल पशु-पक्षियों के मन-मोहक सुस्वादु मास-रसो के साथ, रूक्ष यवान्न, वाट्य ( जौ का मण्ड ), पुराना मद्य, सत्तू, अपूप ( वडे ) मूग आदि का यूष, तिक्त शाक, पुराने शालियो का भात, दन्ती तैल, इङ्गुदी ( हिंगोट ) का तैल, अलसी तथा सरसो के तैल के साथ साठी आदि तृणधान्यो को दे । प्रमेह रोगी का खास कर जौ का भोजन करावे । कफ-प्रमेही को मधु के साथ जौ के नाना प्रकार के पदार्थ खाने क लिये दे । ( ५ ) प्रमेह का रोगी त्रिफला के काथ म जौ का डालकर रात भर रख दे । पीछे स इनको सत्तू बनाकर जल मे आलोड़ित करके मधु मिला कर तर्पण बनावे । इन तर्पणो का सीधु के साथ मिलाकर प्रति दिन पान करे ॥१७–२२॥ ये श्लेष्ममेहे विहिताः कषायास्तैर्भाविताना च पृथग्यवानाम् । सक्तूनपूपान्सगुडान्सधानान्भक्ष्यांस्तथाऽन्यान्यविधान्श्चखादेत् २३ खराश्वगो‍हस्रपृषदूभृताना' तथा यवाना विविधाश्चभक्ष्याः । देयास्तथा वेणुयवा यवाना कल्पेन गोधूममयाश्च भक्ष्याः ॥२४॥ सशोधनोल्लेखनलंधनानि काले प्रयुक्तानि कफप्रमेहान् । जयन्ति पित्तप्रभवान्विरेकाः संतर्पणः सशमनो विधिश्च॥ २५॥ दार्वा सुराह्वां त्रिफला समुस्ता कषायमुत्क्वाथ्य पिबेत्प्रमेही । क्षौद्रेण युक्तामथवा हरिद्रा पिबेद्रसेनामलकीफलानाम् ॥ २६ ॥ ( ६ ) कफप्रमेह मे जो कषाय कहे है, उन कषायो से पृथग् २ रूप मे जौ को भावित करके सत्तू, अपूप, धाना ( भुने जौ ) और अन्य भक्ष्य पदार्थों का बनाकर गुड के साथ खावे । ( ७ ) गदहा, घोडा, गाय, हस, पृषत् ( हरिण ) इनके द्वारा खाये हुए जौ जो उनके मल मे बाहर आवे उनसे नाना प्रकार के भक्ष्य बना कर देवे । इसी प्रकार वेणुयव ( बास के जो, वशफल ) और गेहूँ के बने भक्ष्य पदार्थ सेवन करने के लिये देवे । ( ८ ) उचित समय मे दिये गये सशोधन, उल्लेखन (वमन), लघन कफप्रमेह को नष्ट करते है, सतर्पण, सशमन और विरेचन पित्तजन्य प्रमेहो को जीतते है । १ 'खराश्वगोधेणुकसभृताना' इति च पाठः ।