भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६१ गुल्मं जठरमानाहं पीतमेकत्र साधयेत् । इति तैलपञ्चकम् । ( १३ ) तैल-पञ्चक—एरण्ड तैल, प्रसन्ना, गोमूत्र, काजी और यवक्षार इनको उचित मात्रा में पीने से गुल्म, जठर और आनाह रोग नष्ट होते हैं । पञ्चमूलीकषायेण सक्षीरेण शिलाजतु ॥ ९७ ॥ पिबेत्तस्य प्रयोगेण वातगुल्मात्प्रमुच्यते । इति शिलाजतुप्रयोगः । ( १४ ) शिलाजतु-प्रयोग—पञ्चमूल क्वाथ में दूध मिलाकर इसके साथ शिलाजतुका प्रयोग करने से वातगुल्म नष्ट होता है। [ यहा पर बृहत्पञ्चमूल लेना चाहिये । ] ॥ ९७ ॥ वाट्यं यूषेण पिप्पल्या मूलकानां रसेन वा ॥ ९८ ॥ भुक्त्वा स्निग्धमुदावर्ताद्वातगुल्माद्विमुच्यते । शूलानाहविबन्धार्त्तं स्वेदयेद्वातगुल्मिनम् ॥ ९९ ॥ स्वेदैः स्वेदविधावुक्तैर्नाडीप्रस्तरसङ्करैः । ( १५ ) स्नेहयुक्त जौ के अन्न को मूंग आदि के यूष के साथ, अथवा पिप्पली प्रधान यूष के साथ, अथवा मूली के रस के साथ खाने से उदावर्त्त और वातगुल्म रोग शान्त होते हैं । ( १६ ) वातगुल्म में यदि शूल, आनाह और विबन्ध हो तो स्वेदाध्यायमे कहे नाड़ी-स्वेद, प्रस्तर-स्वेद और संकर स्वेद देने चाहिये ॥ ९८-९९ ॥ बस्तिकर्म परं विद्याद् गुल्मघ्नं तद्धि मारुतम् ॥ १०० ॥ स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति । तस्मादभीक्ष्णशो गुल्मी निरूहैः सानुवासनैः ॥ १०१ ॥ प्रयुज्यमानैः शाम्यन्ति वातपित्तकफात्मकाः । गुल्मघ्ना विविधा दृष्टाः सिद्धाः सिद्धिषु वस्तयः ॥ १०२ ॥ इति बस्तिक्रिया । गुल्म को नष्ट करने के लिये बस्तिकर्म अतिशय उत्कृष्ट है । चूंकि यह कर्म पक्वाशय में वायु का शमन करके गुल्म को नष्ट करता है । इसलिये बारबार निरूह और अनुवासन बस्तियों के प्रयोग से वात-पित्त-कफजन्य गुल्म शान्त हो जाते हैं । सिद्धिस्थान में फलप्रद गुल्मनाशक बस्तियों का उपदेश किया है ॥ १००-१०२ ॥ गुल्मघ्नानि च तैलानि वक्ष्यन्ते वातरोगिके । तानि मारुतगुल्मेषु पानाभ्यङ्गाऽनुवासनैः ॥ १०३ ॥