चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४५६ चरकसंहिता [ अ० ६ ( सुगन्धित द्रव्य ) इनसे सिद्ध घृत उन्माद रोग मे हितकारी है, ये दो योग हैं । अथवा हीग, सौवर्चल, त्रिकटु द्वारा पुरातन घृत को सिद्ध करके पिलावे उन्माद रोगी को घी की उत्तम मात्रा ( जो कि २४ घण्टे अर्थात् दिन-रात मे जीर्ण हो ) पिला कर पानी रहित गढे या घर मे बन्द कर देवे१ ॥६४-६५॥ उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवर्षस्थितं घृतम् ॥ ६६ ॥ लाक्षारसनिभं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम् । मेध्यं विरेचनेऽपथ्यं प्रपुराणमतः परम् ॥ ६७ ॥ त्रिदोषघ्नं पवित्रत्वाद्विशेषाद् ग्रहमोक्षणम् । गुणकर्माधिकं स्थानादास्वादात्कटुतिक्तकम् ॥ ६८ ॥ नासाध्यं नाम तस्यास्ति यत्स्याद्वर्षशतस्थितम्२ । दृष्टं स्पृष्टमथाघ्रातं तद्धि सर्वग्रहापहम् । अपस्मारग्रहोन्मादवतां शस्तं विशेषतः ॥ ६६ ॥ ( ७ ) पुरातन घृत—जो घी दस साल पुराना हो जाये, जिसमे कि तीव्र गन्ध आने लगे, जिसका रग लाख के समान लाल हो जाये, वह शीतवीर्य होता है, उसका नाम पुराना घृत है । दस वर्ष के पीछे घृत अति पुरातन हो जाता है इसको 'प्र-पुराण' कहते हैं । वह त्रिदोषनाशक पवित्र होने से खासकर ग्रह रोगो को नष्ट करता है, पीने से अधिक गुणशाली है, स्वाद मे कटु-तिक्त रस है, कान, आख के रोगो को नष्ट करता, विषनाशक और पवित्र करने वाला है । और बारह साल पुराने घृत से कोई भी रोग असाध्य नही है । इसके देखने, छूने ओर सूघने से वीसर्प और ग्रह-रोग नष्ट होते है । वह अपस्मार, विष, उन्माद और वायु रोगों मे अमृत के समान प्रशस्त है ॥६६-६६॥ एतैरौषधवर्गैर्वा विधेयत्वं न गच्छति । अञ्जनोत्सादनालेपान्नावनादींश्च योजयेत् ॥ ७० ॥ शिरीषो मधुकं हिङ्गु लशुनं तगरं वचा । कुष्ठं च बस्तमूत्रेण पिष्टं स्यान्नावनाञ्जनम् ॥ ७१ ॥ इति नस्याञ्जनम् । १उत्तम मात्रा का लक्षण—दिन रात्रि भर मे बिना दोष उत्पन्न किये जो जीर्ण हो सके वह मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद ग्रह, अपस्मार को नाश करती है । एक दिन रात मे जीर्ण होने वाली स्नेह की उत्तमा मात्रा, पूरे दिन मे जीर्ण होने वाली मध्यमा और आधे दिन मे जीर्ण होनेवाली ह्रस्वमात्रा कहाती है । २. 'यत्स्याद् द्वादशवार्षिकम्' इति च पाठः ।