भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४५७ तद्वद् व्योषं हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठाहिङ्गुसर्षपाः । शिरीषबीजं चोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ७२ ॥ इति नस्यमञ्जनम् । (८) यदि उन्माद रोगी उपरोक्त ओषधि समूहों से वश मे न आवे, वह कहा न माने, तब (१) हिंगु, कल्याणक आदि घृतो मे वर्णित ओषधियों से अञ्जन, उत्सादन (उबटन), आलेप और नस्य करे । (२) शिरीष के बीज, मुलहठी, हींग, लहसुन, तगर, वच, कूठ, इन सब को बकरी के मूत्र मे पीस कर इसका नस्य और अञ्जन दे। (३) इसी प्रकार से व्योष (त्रिकटु, सोंठ, मरिच, पिप्पली), हल्दी, दारु-हल्दी, मजीठ, हींग, सरसो, सिरस के बीज इनको बकरी के मूत्र मे पीस कर नस्य और अञ्जन करे यह उन्माद, ग्रह और अपस्मार रोगो को नष्ट करता है ॥७०-७२॥ पिष्ट्वा तुल्यमपामार्गहिङ्गनी१ हिङ्गुपत्रिकाम् । वत्तिः स्यान्मरिचार्धांशा पित्ताभ्या गोशृगालयोः ॥ ७३ ॥ तयाऽञ्जयेदपस्मारभूतोन्मादज्वरार्दितान् । भूतातानमरातांश्च नरार्ताँश्च गोमये ॥ ७४ ॥ मरिचं चाऽऽतपे मास सपित्त स्थितमञ्जनम् । वैकृतं पश्यतः कार्य दोषभूतहतस्मृतेः ॥ ७५ ॥ इत्यञ्जनम् । (४) अपामार्ग (चिरचिटा) के बीज, हींग और हींगुपत्रि प्रत्येक एक एक भाग, काली मिर्च आधा भाग, इनको गाय और गीदड के पित्त के साथ पीस कर वर्ती बनावे । इस वर्त्ती को अपस्मार, उन्माद तथा ज्वर रोगी, भूत और देवताओ से पीडित व्यक्तियो मे तथा नेत्र रोगो मे प्रयोग करे। (५) वात आदि दोष के कारण से अथवा भूतो के कारण से यदि दृष्टि विकृत हो गई हो तो काली मिरच को गाय और शृगाल के पित्त मे एक मास तक व्याप्त करके धूप मे रखे, फिर इसका अञ्जन करे ॥७३-७५॥ सिद्धार्थको वचा हिङ्गुकरञ्जे देवदारु च । मञ्जिष्ठा त्रिफला श्वेता कटभीत्वक् कटुत्रिकम् ॥ ७६ ॥ समांशानि प्रियंगुश्च शिरीषो रजनीद्वयम् । बस्तमूत्रेण पिष्टोऽयमगदः पानमञ्जनम् ॥ ७७ ॥ नस्यमालेपनं चैव स्नानमुद्वर्तनं तथा । १. 'अपामार्ग हिङ्गुल' इति वा पाठः ।