चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९ (१२) पित्तजन्य उन्माद मे तिक्त वस्तुओ से तथा जीवनीय-गण की ओषधियो से सिद्ध घृत का पान, तथा मिश्रक स्नेह (यमक) का प्रयोग करे । इसी प्रकार से शीतल, मधुर, लघु खान-पान देने चाहिये ॥८२-८३॥ शङ्खे केशान्तसन्धौ वा मोक्षयेऽज्ञो भिषक् सिराम् । उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च ॥ ८४ ॥ (१३) शस्त्र कर्म को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि उन्माद, अपस्मार आर विषम-ज्वर म, शख प्रदेश, कान, ललाट क मध्य मे ओर केशो के अन्तिम भाग के सन्धि स्थान मे स्थित सिरा का वेधन करे १ ॥ ८४ ॥ घृतमासविदृप्तं वा निवाते स्थापयेत्सुखम् । त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रंशं संज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ॥ ८५ ॥ (१४) अथवा रोगी को कल्याणक घृत आदि ओर मास से तृप्त कराके सामने की वायु से रहित घर म आराम के साथ रखे । इस प्रकार करने से बुद्धि और स्मृति के भ्रश को छोड़ कर रोगी सज्ञा (चेतना) को प्राप्त कर लेता है और उन्माद रोग से मुक्त हा जाता है ॥ ८५ ॥ आश्वासयेत्सुहृद्द्वा तं वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः । ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा ॥ ८६ ॥ (१५) मित्र लोग धर्म, अर्थयुक्त वचनो से आश्वासन देवे, इष्ट वस्तु के नाश को कहे, आश्चर्यकारक वस्तुओ को दिखावे ॥ ८६ ॥ बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्रोत्तानमातपे । कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तलोहतैलजलैः स्पृशेत् ॥ ॥ ८७ ॥ कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्धं विजने गृहे । रुन्ध्याच्चेतो हि विभ्रान्तं व्रजत्यस्य यथा शमम् ॥ ८८ ॥ (१६) शरीर पर सरसो का तैल लगाकर, हाथ, पाव बाध कर पीठ के भार धूप मे लेटावे । कौच या गरम लोहे, गरम तैल या गरम जल से स्पर्श करे । कशा (कोडो) से पीटे, बाधे, एकान्त घर मे बन्द रखे । इस प्रकार करने से रोगी का विक्षिप्त चित्त शान्त हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥ सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम् । त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा ॥ ८९ ॥ अथवा राजपुरुषा बहिर्नीत्वा सुसंयतम् । त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया ॥ ९० ॥ १ सुश्रुते—शखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपागललाटेषु चोन्मादे ।