चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४६० चरकसंहिता [ अ० ९ देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत्। तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः॥ ९१॥ (१७) विष का दाढ निकाले हुए सर्प से, दान्त (पले हुए, नम्र) सिंह और हाथी अथवा हाथ मे शस्त्र लिये हुए चोरो या शत्रुओ से उसको डरावे। अथवा राजकर्मचारी इसको बाहर लेजा कर, इसके हाथ पाव बाध कर मारने का भय दिखाये और कहे राजा ने तुम्हारे वध की आज्ञा दी है। क्योकि कषादि के ताडन रूपी शरीर-क्लेश से प्राणो का भय कही अधिक होता है, इस कारण से विक्षिप्त मन शान्त हो जाता है॥ ८६-९१॥ इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते। तस्य तत्सदृशप्राप्तिशान्त्याश्वासः शम नयेत् ॥ ९२ ॥ काम-शोक-भय-क्रोध-हर्षेर्ष्या-लोभ-सम्भवान्। परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत्॥ ९३॥ इष्ट वस्तु के नाश होने से जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो, उस रोगी को उस वस्तु के समान वस्तु की प्राप्ति से, सान्त्वना तथा आश्वासन द्वारा शान्त करे। काम, शोक, मद, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ के कारण त जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो तो परस्पर विरुद्ध द्वन्द्वो से वह शान्त हो जाता है। कामजन्य उन्माद क्रोध से, क्रोधजन्य काम से, भयजन्य और शोकजन्य क्रोध ओर काम से, शान्त हो जाते है ॥ ९२ ६३॥ बुद्ध्वा देशं वयःसात्म्य दोषं कालं बलाबले। चिकित्सितमिदं कुर्यादुन्मादं भूतदोषजे ॥ ९४॥ देवर्षिपितृगन्धर्व्वैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्। वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च॥ ९५॥ सर्पिष्पानादि तस्येह मृदुभैषज्यमाचरेत्। पूजा बल्युपहाराश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा ॥ ९६॥ शान्तिकर्मेष्टिहोमाश्च जपस्वस्त्ययनानि च। वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाऽऽचरेत् ॥ ९७॥ दोषजन्य (निज) और आगन्तुज उन्माद मे देश, वय, सात्म्य, दोष, काल, बल और अबल की परीक्षा करके उपरोक्त चिकित्सा करे। बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि देवग्रह, ऋषिग्रह, पितृग्रह, गन्धर्वग्रह इनसे आक्रान्त उन्माद रोगी मे तीक्ष्ण अञ्जन आदि तथा क्रूर कर्मों का प्रयोग न करे। इनकेलिये घृत आदि कोमल ओषधि का प्रयोग करे १। १ सुश्रुत मे भी कहा है—न च रूक्ष प्रयुञ्जीत प्रयोग देवताग्रहे। ऋ ते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूल न चाचरेत् ॥