भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४६१ दैवव्यपाश्रय चिकित्सा—पूजा, बलि कर्म, उपहार कर्म, मन्त्र, अजनविधि, शान्ति कर्म, यज्ञ, होम, जप, मगलकर्म, वेदोक्त नियम, प्रायश्चित्त आदि सेवन करे ॥ ९४-९७ ॥ भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम् । पूजयन् प्रयतो नित्य जयत्युन्मादजं भयम् ॥ ९८ ॥ रुद्रस्य प्रमथा नाम गणा लोके चरन्ति ये । तेषा पूजा च कुर्वाण उन्मादेभ्यो विमुच्यते ॥ ९९ ॥ बलिभिर्मङ्गलैर्होमैरौषध्यगदधारणैः । सत्याचारतपोज्ञानप्रदाननियमव्रतैः ॥ १०० ॥ देवगुह्यकविप्राणां गुरूणां पूजनेन च । आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा ॥ १०१ ॥ नित्य प्रति भूतों ( प्राणियो ) के अधिपति, जगत् के ईश्वर-महेश्वर का पूजन करने से उन्माद का भय नही रहता । रुद्र के 'प्रमथ' नामक जो गण लोक मे विचरते हैं, उनकी प्रतिदिन पूजा करने से आगन्तुज उन्माद से मनुष्य मुक्त हो जाता है । बलि कर्म से, मागलिक कार्यों से, होम से, ओषधियां और अगदो के धारण करने से, सत्य आचार से, तप से, ज्ञान से, दान से, नियम, व्रत के पालन से, देवता, गाय, ('गुह्यक', पाठ हो तो यक्ष), ब्राह्मण, गुरु-जनों के पूजन से, सिद्ध फलदायक मन्त्र तथा ओषधियां से आगन्तुज-उन्माद शान्त होता है ॥ ९८-१०१ ॥ यच्चोपदेक्ष्यते किंचिदपस्मारचिकित्सिते । उन्मादे तच्च कर्तव्यं सामान्याद्धेतुदूष्ययोः ॥ १०२ ॥ निवृत्तामिषमद्यो यो हिताशी प्रयतः शुचिः । निजागन्तुभिरुन्मादैः सत्त्ववान् न स युज्यते ॥१०३॥ उन्माद और अपस्मार रोग मे हेतु और दूष्य की समानता है । इसलिये अपस्मार चिकित्सा मे जो कुछ विशेष कहेगे वह सब इस उन्माद मे भी वर- तना चाहिये । मांस और मद्य के सेवन से पृथक्, पथ्यभोजी, अन्दर और बाहर से पवित्र तथा सत्त्वगुण से युक्त और जो जितेन्द्रिय व्यक्ति होता है, वह निज और आगन्तुज दोनो प्रकार के उन्मादों से मुक्त रहता है॥१०२-१०३॥ प्रसादश्चेन्द्रियार्थानां बुद्ध्यात्ममनसां तथा । धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम् ॥ १०४ ॥ उन्माद से छूटने के लक्षण—इन्द्रियों तथा इनके विषयो मे निर्मलता, बुद्धि, आत्मा और मन की प्रसन्नता, वात आदि धातुओ का अपनी स्वाभाविक