चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६२ चरकसंहिता [ अ० १० स्थिति मे आ जाना, ये उन्माद से मुक्त (प्रायः सब रोगो से मुक्त) व्यक्ति के लक्षण हैं ॥ १०४ ॥ तत्र श्लोकः—उन्मादानां समुत्थानां लक्षणं सचिकित्सितम् । निजागन्तुनिमित्तानामुक्तवान् भिषगुत्तमः ॥ १०५ ॥ उपसहार—निज और आगन्तुज उन्मादो के कारण, लक्षण, चिकित्सा को वैद्यो मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने इस अध्याय मे कह दिया ॥ १०५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने उन्मादचिकित्सितं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥ दशमोऽध्यायः । अथातोऽपस्मारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे अपस्मार-रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते है, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ स्मृतेरपगमं प्राहुरपस्मारं भिषग्विदः । तमःप्रवेशं बीभत्सचेष्टं धीसत्त्वसंप्लवात् ॥ ३ ॥ वैद्यो मे ज्ञानी अथवा भेषज को जानने वाले विद्वान् स्मृति के नष्ट होने को ही अपस्मार कहते है¹ । इसमे बुद्धि और सत्त्व (मन) के विभ्रंश होने से अन्धकार मे घुसने के समान प्रतीति अर्थात् ज्ञान का अभाव या मोह और शरीर की चेष्टाये बीभत्स हो जाती हैं ॥ ३ ॥ विभ्रान्तबहुदोषाणामहिताशुचिभोजिनाम् । रजस्तमोभ्यां विहते सत्त्वे दोषावृते हृदि ॥ ४ ॥ चिन्ताकामभयक्रोधशोकोद्वेगादिभिस्तथा । मनस्यभिहते नृणामपस्मारः प्रवर्त्तते ॥ ५ ॥ १ सुश्रुत मे अपस्मार-सज्ञा की व्याख्या इस प्रकार की है । स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपस्तत्परिवर्जने । अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽय व्याधिरन्तकृत् ॥ सुश्रुते ॥ अपगतः स्मारः स्मरणं अनुभूतार्थविज्ञानं यस्मिन् रोगे सोऽपस्मार । जिस रोग मे स्मृति अर्थात् अनुभूत पदार्थ का ज्ञान नष्ट हों जाता है वह 'अपस्मार' कहलाता है । यह रोग रोगी का मृत्युकारक होता है ।